भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 153

१०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है, किंतु सुख और दुःख इंद्रियोंकी दो स्वतंत्र वेदनाएँ हैं, और यह कहना उससे बिलकुलही भिन्न है, कि प्राप्त किसी एक समय सुखोंको भूलकर अधिकाधिक सुख पानेके लिये असंतुष्ट बने रहना । इनमेंसे पहली बात सुखके वास्तविक स्वरूपके विषयमें है; और दूसरी बात यह है, कि प्राप्त सुखसे मनुष्यकी पूरी तृप्ति होती है या नहीं ? विषय-वासना हमेशा अधिकाधिक बढ़तीही जाती है, इसलिये जब प्रतिदिन नये सुख नहीं मिल सकते, तब यही मालूम होता है, कि पूर्वप्राप्त सुखोंकोही बार-बार भोगते रहना चाहिये - और इसीसे मनकी इच्छाका दमन नहीं होता । विटेलियस नामक एक रोमन बादशाह था । कहते हैं, कि बार-बार जिव्हाका सुख पानेके लिये, भोजन करनेपर वह किसी औषधिके द्वारा कै कर डालता था; और प्रतिदिन अनेक बार भोजन किया करता था । परंतु, अंतमें पछतानेवाले ययाति राजाकी कथा इससेभी अधिक शिक्षादायक है । यह राजा शुक्राचार्यके शापसे, बूढ़ा हो गया था; परंतु उन्हींकी कृपासे इसको यह सहूलियतभी मिल गयी थी, कि अपना बुढ़ापा किसीको देकर उसके बदलेमें उसकी जवानी ले लें । तब इसने अपने पुरु नामक बेटेसे उसकी तरुणावस्था मांग ली और सौ दो सौ नहीं, पूरे एक हज़ार वर्षतक लगातार सब प्रकारके विषय-सुखोंका उपभोग किया । अंतमें उसने यही अनुभव किया, कि इस दुनियाके सारे पदार्थ एक मनुष्यकी सुख-वासनाको तृप्त करनेमें असमर्थ हैं । महाभारतके आदिपर्वमें व्यासजीने कहा है, कि तब उसके मुखसे यही उद्गार निकल पड़ा कि :- न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ अर्थात् “ सुखोंके उपभोगसे विषय-वासनाकी तृप्ति तो होतीही नही; किंतु विषय- वासना दिनोंदिन उसी प्रकार बढ़ती जाती है, जैसे अग्निकी ज्वाला हवनपदार्थोंसे बढ़ती जाती है” (महा. आ. ७५ ४९) । यही श्लोक मनुस्मृतिमेंभी पाया जाता है ( मनु. २.९४ ) । तात्पर्य यह है, कि चाहे जितने सुखके साधन उपलब्ध हों, तोभी इंद्रियोंकी इच्छा उत्तरोत्तर बढ़तीही जाती है । इसलिये केवल सुखोपभोगसे सुखकी इच्छा कभी तृप्त नहीं हो सकती; उसको रोकने या दबानेके लिये कुछ अन्य उपाय अवश्यही करना पड़ता है । यह तत्त्व हमारे सभी धर्मशास्त्र-ग्रंथ- कारोंको पूर्णतया मान्य है; और इसलिये उनका प्रथम उपदेश यह है; कि प्रत्येक मनुष्यको अपने कामोपभोगकी मर्यादा बांध लेनी चाहिये । जो लोग कहा करते हैं, कि इस संसारमें परम साध्य केवल विषयोपभोगही है, वे यदि उक्त अनुभूत सिद्धान्तपर थोड़ाभी ध्यान दें, तो उन्हें अपने मतकी निस्सारता तुरंतही मालूम हो जायगी । वैदिक धर्मका यह सिद्धान्त बौद्धधर्ममेंभी पाया जाता है; और ययाति राजाके सदृश, मान्धाता नामक पौराणिक राजानेभी मरते समय कहा है :-