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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

सुखदुःखविवेक १०१ इस विषयमें गीताका मत उपर्युक्त विवेचनसे पाठकोंके ध्यानमें आही गया होगा। 'क्षेत्र'का अर्थ बतलाते समय 'सुख' और 'दुःख'की अलग अलग गणना की गई है (गीता १३. ६); बल्कि यहभी कहा गया है, 'सुख' सत्त्वगुणका और 'तृष्णा' रजोगुणका लक्षण है (गीता १४. ६, ७); और सत्त्वगुण तथा रजोगुण दोनों अलग हैं। इससेभी भगवद्गीताका यह मत साफ़ मालूम हो जाता है, कि सुख और दुःख दोनों एक दूसरेके प्रतियोगी हैं; और भिन्न भिन्न दो वृत्तियाँ हैं। अठारहवें अध्यायमें राजस त्यागकी जो न्यूनता दिखलाई है, कि “कोईभी काम यदि दुःखकारक है, तो उसे छोड़ देनेसे त्यागफल नहीं मिलता; किंतु ऐसा त्याग राजस कहलाता है” (गीता १८. ८), वहभी इस सिद्धान्तके विरुद्ध है, कि “सब सुख तृष्णा-क्षयमूलकही हैं।” अब यदि यहमान लें, कि सब सुख तृष्णा-क्षयरूप अथवा दुःखाभावरूप नहीं हैं, और यहभी मान लें, कि सुख-दुःख दोनों स्वतंत्र वस्तुएँ हैं; तोभी - इन दोनों वेदनाओंके परस्पर-विरोधी या प्रतियोगी होनेके कारण - यह दूसरा प्रश्न उपस्थित होता है, कि जिस मनुष्यको दुःखका कुछभी अनुभव नहीं है, उसे सुखका स्वाद मालूम हो सकता है या नहीं ? कई लोगोंका तो यहाँतक कहना है, कि दुःखका अनुभव किये बिना सुखका स्वादही नहीं मालूम हो सकता। इसके विपरीत, स्वर्गके देवताओंके नित्यसुखका उदाहरण देकर कुछ पंडित प्रतिपादन करते हैं, कि सुखका स्वाद मालूम होनेके लिये दुःखके पूर्वानुभवकी कोई आवश्यकता नहीं है। जिस तरह किसीभी खट्टे पदार्थको पहले चखे बिनाही शहद, गुड़, शक्कर, आम, केला इत्यादि पदार्थोंका भिन्न भिन्न प्रकारका मीठापन मालूम हो जाया करता है, उसी तरह सुखकेभी अनेक प्रकार होनेके कारण पूर्व-दुःखानुभवके बिनाही भिन्न भिन्न प्रकारके सुखों (जैसे, रूईदार गद्दीपरसे उठकर परोंकी गद्दीपर बैठना इत्यादि) का सदैव अनुभव करते रहनाभी सर्वथा संभव है। परंतु सांसारिक व्यव- हारोंको देखनेसे मालूम हो जायगा, कि यह वादही निरर्थक है। पुराणोंमें देवताओं- परभी संकट पड़नेके कई उदाहरण हैं; और पुण्यका अंश घटतेही कुछ समयके बाद स्वर्ग-सुखकाभी नाश हो जाया करता है। इसलिये स्वर्गीय सुखका उदाहरण ठीक नहीं है। और, यदि ठीकभी हो, तो स्वर्गीय सुखका उदाहरण हमारे किस काम का ? यदि यह सत्य मान लें, कि “नित्यमेव सुखं स्वर्गे” तो इसीके आगे (मभा. शां. १९०. १४) यहभी कहा है, कि “सुखं दुःखमिहोभयम्” - अर्थात् इस संसारमें सुख और दुःख दोनों मिश्रित हैं। इसीके अनुसार समर्थ श्रीरामदास स्वामीनेभी कहा है, “हे विचारवान् मनुष्य, इस बातको अच्छी तरह सोचकर देख ले, कि इस संसारमें पूर्ण सुखी कौन है ?” इसके सिवा द्रौपदीने सत्यभामाको यह उपदेश दिया है कि :-

१०२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सुखं सुखेनेह न जातु लभ्यं दुःखेन साध्वी लभते सुखानि । अर्थात् “ सुख सुखसे कभी नहीं मिलता; साध्वी स्त्रीको सुख-प्राप्तिके लिये दुःख या कष्ट सहना पड़ता है" (मभा. वन. २३३. ४)। इससे कहना पड़ेगा, कि यह उपदेश इस संसारके अनुभवके अनुसार सत्य है। देखिये, यदि जामुन किसीके होंठपर धर दिया जाय, तोभी उसको चबानेके लिये पहले मुंह खोलना पड़ता है; और यदि मुंहमें चला जाय, तो उसे खानेका कष्ट सहनाही पड़ता है। सारांश, यह बात सिद्ध है, कि दुःखके बाद सुख पानेवाले मनुष्यके सुखास्वादमें, और हमेशा विषयोपभोगोंमेंही निमग्न रहनेवाले मनुष्यके सुखास्वादमें बहुत भारी अंतर है। इसका कारण यह है, कि हमेशा सुखका उपभोग करते रहनेसे सुखका अनुभव करनेवाली इंद्रियांभी शिथिल-सी होती जाती हैं। कहाभी है कि :- प्रायेण श्रीमंतां लोके भोक्तुं शक्तिर्न विद्यते । काष्ठान्यपि हि जीर्यन्ते दरिद्राणां च सर्वशः ॥ अर्थात् “ श्रीमानोंमें सुस्वादु अन्नका सेवन करनेकोभी शक्ति नहीं रहती; परंतु गरीब लोग काष्ठकोभी पचा जाते हैं" (मभा. शां. २८. २९)। अतएव जब कि हमको इस संसारकेही व्यवहारोंका विचार करना है, तब कहना पड़ता है, कि इस प्रश्नको अधिक हल करते रहनेमें कोई लाभ नहीं, कि बिना दुःख पाये हमेशा सुखका अनुभव किया जा सकता है या नहीं। इस संसारमें यही क्रम सदासे सुन पड़ रहा है, कि “ सुखस्यानंतरं दुःखं दुःखस्यानंतरं सुखम् " (मभा. वन. २६०. ४९; शां. २५. २३.) अर्थात् सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख मिलाही करता है। और महाकवि कालिदासनेभी मेघदूत (मे. १. १४) में वर्णन किया है :- कस्यैकान्तं सुखमुपनतं दुःखमेकान्ततो वा । नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण ॥ “किसीकीभी स्थिति हमेशा सुखमय या हमेशा दुःखमय नहीं होती। सुख-दुःखकी दशा पहियेके समान ऊपर और नीचेकी ओर हमेशा बदलती रहती है।” फिर यह दुःख चाहे हमारे सुखकी मिठासको अधिक बढ़ानेके लिये उत्पन्न हुआ हो या इस प्रकृतिके संसारमें उसका औरभी कुछ उपयोग होता हो; उक्त अनुभव-सिद्ध क्रमके बारेमें मतभेद हो नहीं सकता। यहाँ, यह बात कदाचित् असंभव न होगी, कि कोई मनुष्य हमेशाही विषय-सुखका उपभोग किया करे और उससे उसका जीभी न ऊबे। परंतु इस कर्मभूमि (मृत्युलोक या संसार)में यह बात सर्वथा असंभव है, कि दुःखका बिलकुल नाश हो जाय और हमेशा सुख-ही-सुखका अनुभव मिलता रहे। यदि यह बात सिद्ध है, कि संसार केवल सुखमय नहीं है, किंतु वह सुख- दुःखात्मक है, तो अब तीसरा प्रश्न आप-ही-आप मनमें पैदा होता है, कि संसारमें सुख अधिक है या दुःख ? जो पश्चिमी पंडित आधिभौतिक सुखकोही परम साध्य

सुखदुःखविवेक १०३ मानते हैं, उनमेंसे बहुतेरोंका कहना है, कि यदि संसारमें सुखसे दुःखही अधिक होता, तो (सब नहीं तो) अधिकांश लोग अवश्यही आत्महत्या कर डालते। क्योंकि जब उन्हें मालूम हो जाता, कि संसार दुःखमय है, तो वे फिर उसमें रहनेकी झंझटमें क्यों पड़ते ? बहुधा देखा जाता है, कि मनुष्य अपनी आयु अर्थात् जीवनसे नहीं ऊबता; इसलिये निश्चयपूर्वक यही अनुमान किया जा सकता है, कि इस संसारमें मनुष्यको दुःखकी अपेक्षा सुखही अधिक मिलता है; और इसलिये धर्म-अधर्मका निर्णयभी, सुखकोही सब लोगोंका परम साध्य समझ कर, किया जाना चाहिए। अब यदि उपर्युक्त मतकी अच्छी तरह जांचकी जाय तो मालूम हो जायगा, कि यहाँ आत्महत्याका जो संबंध सांसारिक सुखके साथ जोड़ दिया गया है, वह वस्तुतः सत्य नहीं है। हाँ, यह बात सच है, कि कभी कभी कोई मनुष्य संसारसे त्रस्त होकर आत्महत्या कर डालता है; परंतु सब लोग उसकी गणना 'अपवाद' में अर्थात् पागलोंमें किया करते हैं। इससे यही बोध होता है, कि सर्वसाधारण लोगभी 'आत्महत्या करने या न करने' का संबंध सांसारिक सुखके साथ नहीं जोड़ते किंतु उसे (अर्थात् आत्महत्या करने या न करनेको) एक स्वतंत्र बात समझते हैं। यदि असभ्य और जंगली मनुष्योंके उस 'संसार' या जीवनका विचार किया जावे, जो सुधरे हुए और सभ्य मनुष्योंकी दृष्टिसे अत्यंत कष्टदायक और दुःखमय प्रतीत होता है; तोभी वही अनुमान निष्पन्न होगा, जिसका उल्लेख ऊपरके वाक्यमें किया गया है। प्रसिद्ध सृष्टिशास्त्रज्ञ चार्ल्स डार्विनने अपने प्रवास-ग्रंथमें कुछ ऐसे जंगली लोगोंका वर्णन किया है, जिन्हें उसने दक्षिण-अमेरिकाके अत्यंत दक्षिण प्रांतोंमें देखा था। उस वर्णनमें लिखा है, कि वे असभ्य लोग - स्त्री, पुरुष सब - कड़ाकेके जाड़ेके अपने देशमें बारहों महीने नंगे घूमते रहते हैं; इनके अपने पास अनाजका कुछभी संग्रह न करते रहनेसे इन्हें कभी कभी भूखों रहना पड़ता है; तथापि इनकी संख्या दिनोंदिन बढ़तीही जाती है*। देखिये, ये जंगली मनुष्यभी अपनी जान नहीं देते; परंतु क्या इससे यह अनुमान किया जा सकता है, कि उनका संसार या जीवन सुखमय है ? कदापि नहीं। यह बात सच है, कि वे आत्महत्या नहीं करते; परंतु इसके कारणका यदि सूक्ष्म विचार किया जावे, तो मालूम होगा, कि हर एक मनुष्यको - चाहे वह सभ्य हो या असभ्य - केवल इसी बातमें अत्यंत आनंद मालूम होता है, कि "मैं पशु नहीं हूँ मनुष्य हूँ।" और अन्य सब सुखोंकी अपेक्षा मनुष्य होनेके सुखको वह इतना अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है, कि यह संसार कितनाभी कष्टमय क्यों न हो; तथापि वह उसकी ओर ध्यान नहीं देता; और न वह अपने इस मनुष्यत्वके दुर्लभ सुखको खो देनेके लिये कभी तैयार रहता है। मनुष्यकी बात तो दूर रही, पशु-पक्षीभी आत्महत्या नहीं करते तो क्या इससे कह सकते हैं, कि उनकाभी संसार या जीवन सुखमय है ? तात्पर्य यह है, कि "मनुष्य या पशु-पक्षी आत्महत्या नहीं

  • Darwin's Naturalist's Voyage Round the World - Chap. X.

१०४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करते” इस बातसे यह भ्रामक अनुमान नहीं करना चाहिये, कि उनका जीवन सुखमय है। सच्चा अनुमान यही हो सकता है, कि संसार कैसाभी हो, उससे कुछ अपेक्षा न रखते हुये; सिर्फ़ अचेतन अर्थात् जड़ अवस्थासे सचेतन यानी सजीव अवस्थामें आनेहीसे अनुपम आनंद मिलता है; और उसमेंभी मनुष्यत्वका आनंद तो सबमे श्रेष्ठ है। हमारे शास्त्रकारोंनेभी कहा है :- भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजोविनः । बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृता ॥ ब्राह्मणेषु च विद्वांसः विद्वत्सु कृतबुद्धयः । कृतबुद्धिषु कर्तारः कर्तृषु ब्रह्मवादिनः ॥ अर्थात् “अचेतन पदार्थोंकी अपेक्षा सचेतन प्राणी श्रेष्ठ है। सचेतन प्राणियोंमें बुद्धिमान्, बुद्धिमानोंमें मनुष्य, मनुष्योंमें ब्राह्मण, ब्राह्मणोंमें विद्वान्, विद्वानोंमें कृतबुद्धि (वे मनुष्य जिनकी बुद्धि सुसंस्कृत हो), कृतबुद्धियोंमें कर्ता (काम करनेवाले), और कर्त्ताओंमें ब्रह्मवादी श्रेष्ठ हैं।” इस प्रकार शास्त्रों (मनु. १. ९६, ९७; मभा. उद्यो. ५. १ और २) में क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियोंका जो वर्णन है, उसकाभी रहस्य वही है, जिसका उल्लेख ऊपर किया गया है। और उसी न्यायसे प्राकृत भाषा-ग्रंथोंमेंभी कहा गया है, कि चौरासी लाख योनियोंमें नरदेह श्रेष्ठ है, नरोंमें मुमुक्षु श्रेष्ठ है और मुमुक्षुओंमें सिद्ध श्रेष्ठ है। संसारमें जो कहावत प्रचलित है, कि “सबको अपनी जान अधिक प्यारी होती है।” उसकाभी कारण वही है, जो ऊपर लिखा गया है। और इसी कारणसे संसारके दुःखमय होनेपरभी जब कोई मनुष्य आत्महत्या करता है, तो उसको लोग पागल कहते हैं; और धर्मशास्त्रके अनुसार वह पापी समझा जाता है (मभा. कर्ण. ७०. २८)। तथा आत्महत्याका प्रयत्नभी कानूनके अनुसार जुर्म माना जाता है। संक्षेपमें यह सिद्ध हो गया, कि “मनुष्य आत्महत्या नहीं करता” – इस बातसे संसारके सुख- मय होनेका अनुमान करना उचित नहीं है। ऐसी अवस्थामें हमको, “यह संसार सुखमय है या दुःखमय?” इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये, पूर्वकर्मानुसार नरदेहप्राप्ति-रूप अपने नैसर्गिक भाग्यकी बातको छोड़कर, केवल उसके पश्चात् अर्थात् इस संसारहीकी बातोंका विचार करना चाहिये। “मनुष्य आत्महत्या नहीं करता; बल्कि वह जीनेकी इच्छा करता रहता है” – यह तो सिर्फ़ संसारकी प्रवृत्तिका कारण है। आधिभौतिक पंडितोंके कथनानुसार संसारके सुखमय होनेका यह कोई सबूत या प्रमाण नहीं है। यह बात इस प्रकारभी कही जा सकती है, कि आत्महत्या न करनेकी बुद्धि स्वाभाविक है; वह संसारके सुखदुःखोके तारतम्यसे उत्पन्न नहीं हुई है; और, इसीलिये इससे यह सिद्ध हो नहीं सकता कि संसार सुखमय है।

केवल मनुष्यजन्म पानेके सौभाग्यको और (उसके बादके) मनुष्यके सांसारिक व्यवहार या 'जीवन'को भ्रमवश एकही नहीं समझ लेना चाहिये। केवल मनुष्यत्व, और मनुष्यके नित्य व्यवहार अथवा सांसारिक जीवन, ये दोनों भिन्न भिन्न बातें हैं। इस भेदको ध्यानमें रखकर यह निश्चय करना है, कि इस संसारमें श्रेष्ठ नरदेह-धारी प्राणीके लिये सुख अधिक है अथवा दुःख ? इस प्रश्नका यथार्थ निर्णय करनेके लिये केवल यही सोचना एकमात्र साधन या उपाय है, कि प्रत्येक मनुष्यके 'वर्तमान समयकी' वासनाओंमेंसे कितनी वासनाएँ सफल हुई और कितनी निष्फल। 'वर्तमान समयकी' कहनेका कारण यह है, कि जो बातें सभ्य या सुधरी हुई दशाके सभी लोगोंको प्राप्त हो जाया करती हैं, उनका नित्य व्यवहारमें उपयोग होने लगता है; और उनसे जो सुख हमें मिलता है, उसे हम लोग भूल जाया करते हैं। एवं जिन वस्तुओंको पानेकी नई इच्छा उत्पन्न होती है, उनमेंसे जितनी हमें प्राप्त हो सकती हैं, सिर्फ उन्हींके आधारपर हम इस संसारके सुख- दुःखोंका निर्णय किया करते हैं। इस बातकी तुलना करना, कि हमें वर्तमानकालमें कितने सुख-साधन उपलब्ध हैं और सौ वर्ष पहले इनमेंसे कितने सुखसाधन प्राप्त हो गये थे; और इस बातका विचार करना कि आजके दिन मैं सुखी हूँ या नहीं; दोनों बातें अत्यंत भिन्न हैं। इन बातोंको समझनेके लिये उदाहरण लीजिये। इसमें संदेह नहीं, कि सौ वर्ष पहलेकी बैलगाड़ीकी यात्रासे वर्तमान समयकी रेल-गाड़ीकी यात्रा अधिक सुखकारक है। परंतु अब इस रेल-गाड़ीसे मिलनेवाले सुखके 'सुखत्व'को हम भूल गये हैं। और इसका परिणाम यह दीख पड़ता है, कि किसी दिन रेल-गाड़ी देरसे आती है; और हमारी डाक हमें समयपर नहीं मिलती, तो हमें अच्छा नहीं लगता - कुछ दुःखी-सा होता है। अतएव मनुष्यके वर्तमान समयके सुख- दुःखोंका विचार, उन सुख-साधनोंके आधारपर नहीं किया जाता कि जो उपलब्ध हैं; किंतु यह विचार मनुष्यकी 'वर्तमान' आवश्यकताओंके (इच्छाओं या वासनाओं) आधारपरही किया जाता है। और, जब हम इन आवश्यकताओं, इच्छाओं या वासनाओंका विचार करने लगते हैं तब मालूम हो जाता है, कि उनका तो कुछ अंतही नहीं - वे अनंत और अमर्यादित हैं। यदि हमारी एक इच्छा आज सफल हो जाय, तो कल दूसरी नई इच्छा उत्पन्न हो जाती है; और मनमें यह भाव उत्पन्न होता है, कि वह इच्छाभी सफल हो। ज्यों ज्यों मनुष्यकी इच्छा या वासना सफल होती जाती है, त्यों त्यों उसकी इच्छाकी दौड़ एक कदम आगेही बढ़ती चली जाती है; और जब कि यह बात अनुभवसिद्ध है, कि इन सब इच्छाओं या वासनाओंका सफल होना संभव नहीं, तब इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्य दुःखी हुए बिना रह नहीं सकता। यहाँ निम्न दो बातोंके भेदपर अच्छी तरह ध्यान देना चाहिये : (१) सब सुख केवल तृष्णा-क्षयरूपही है; और (२) मनुष्यको कितनाही सुख मिले, तोभी वह असंतुष्टही रहता है। यह कहना एक बात है, कि प्रत्येक सुख दुःखाभावरूप नहीं

१०६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र है, किंतु सुख और दुःख इंद्रियोंकी दो स्वतंत्र वेदनाएँ हैं, और यह कहना उससे बिलकुलही भिन्न है, कि प्राप्त किसी एक समय सुखोंको भूलकर अधिकाधिक सुख पानेके लिये असंतुष्ट बने रहना । इनमेंसे पहली बात सुखके वास्तविक स्वरूपके विषयमें है; और दूसरी बात यह है, कि प्राप्त सुखसे मनुष्यकी पूरी तृप्ति होती है या नहीं ? विषय-वासना हमेशा अधिकाधिक बढ़तीही जाती है, इसलिये जब प्रतिदिन नये सुख नहीं मिल सकते, तब यही मालूम होता है, कि पूर्वप्राप्त सुखोंकोही बार-बार भोगते रहना चाहिये - और इसीसे मनकी इच्छाका दमन नहीं होता । विटेलियस नामक एक रोमन बादशाह था । कहते हैं, कि बार-बार जिव्हाका सुख पानेके लिये, भोजन करनेपर वह किसी औषधिके द्वारा कै कर डालता था; और प्रतिदिन अनेक बार भोजन किया करता था । परंतु, अंतमें पछतानेवाले ययाति राजाकी कथा इससेभी अधिक शिक्षादायक है । यह राजा शुक्राचार्यके शापसे, बूढ़ा हो गया था; परंतु उन्हींकी कृपासे इसको यह सहूलियतभी मिल गयी थी, कि अपना बुढ़ापा किसीको देकर उसके बदलेमें उसकी जवानी ले लें । तब इसने अपने पुरु नामक बेटेसे उसकी तरुणावस्था मांग ली और सौ दो सौ नहीं, पूरे एक हज़ार वर्षतक लगातार सब प्रकारके विषय-सुखोंका उपभोग किया । अंतमें उसने यही अनुभव किया, कि इस दुनियाके सारे पदार्थ एक मनुष्यकी सुख-वासनाको तृप्त करनेमें असमर्थ हैं । महाभारतके आदिपर्वमें व्यासजीने कहा है, कि तब उसके मुखसे यही उद्गार निकल पड़ा कि :- न जातु कामः कामानां उपभोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ॥ अर्थात् “ सुखोंके उपभोगसे विषय-वासनाकी तृप्ति तो होतीही नही; किंतु विषय- वासना दिनोंदिन उसी प्रकार बढ़ती जाती है, जैसे अग्निकी ज्वाला हवनपदार्थोंसे बढ़ती जाती है” (महा. आ. ७५ ४९) । यही श्लोक मनुस्मृतिमेंभी पाया जाता है ( मनु. २.९४ ) । तात्पर्य यह है, कि चाहे जितने सुखके साधन उपलब्ध हों, तोभी इंद्रियोंकी इच्छा उत्तरोत्तर बढ़तीही जाती है । इसलिये केवल सुखोपभोगसे सुखकी इच्छा कभी तृप्त नहीं हो सकती; उसको रोकने या दबानेके लिये कुछ अन्य उपाय अवश्यही करना पड़ता है । यह तत्त्व हमारे सभी धर्मशास्त्र-ग्रंथ- कारोंको पूर्णतया मान्य है; और इसलिये उनका प्रथम उपदेश यह है; कि प्रत्येक मनुष्यको अपने कामोपभोगकी मर्यादा बांध लेनी चाहिये । जो लोग कहा करते हैं, कि इस संसारमें परम साध्य केवल विषयोपभोगही है, वे यदि उक्त अनुभूत सिद्धान्तपर थोड़ाभी ध्यान दें, तो उन्हें अपने मतकी निस्सारता तुरंतही मालूम हो जायगी । वैदिक धर्मका यह सिद्धान्त बौद्धधर्ममेंभी पाया जाता है; और ययाति राजाके सदृश, मान्धाता नामक पौराणिक राजानेभी मरते समय कहा है :-

सुखदुःखविवेक १०७ न कहापणवस्सेन तित्ति कामेसु विज्जति । अपि दिब्बेसु कामेसु रतिं सो नाधिगच्छति ॥ “कार्षापण नामक महामूल्यवान् सिक्के की यदि वर्षा होने लगे, तोभी काम- वासना की तित्ति अर्थात् तृप्ति नहीं होती; और स्वर्गका सुख मिलनेपरभी कामी पुरुषकी कामेच्छा पूरी नहीं होती ।” यह वर्णन धम्मपद (१८६, १८७) नामक बौद्ध-ग्रंथमें है। इससे कहा जा सकता है कि विषयोपभोगरूपी सुखकी पूर्ति कभी हो नहीं सकती; और इसीलिये हरएक मनुष्यको हमेशा ऐसा मालूम होता है, कि “मैं दुःखी हूँ !” मनुष्योंकी इस स्थितिको विचारनेसे वही सिद्धान्त स्थिर करना पड़ता है, जो महाभारत (महा. शां. २०५. ६; ३३०. १६) में कहा गया है :- सुखाद्बहुतरं दुःखं जीविते नास्ति संशयः । अर्थात् “इस जीवनमें यानी संसारमें सुखकी अपेक्षा दुःखही अधिक है ।” यही सिद्धान्त साधु तुकारामने इस प्रकार दिया है :- “सुख देखो तो राईबराबर और दुःख पर्वतके समान है ।” उपनिषत्कारोँकाभी सिद्धान्त ऐसाही है (मैत्र्यु. १. २-४) । गीता (गीता ८. १५ और ९. ३३) मेंभी कहा गया है, कि मनुष्यका जन्म अशाश्वत और ‘दुःखोंका घर’ है, तथा यह संसार अनित्य और ‘सुखरहित’ है। जर्मन पंडित शोपेनहरका ऐसाही मत है, जिसे सिद्ध करनेके लिये उसने एक विचित्र दृष्टान्त दिया है। वह कहता है, कि मनुष्यकी समस्त सुखेच्छाओँमेंसे जितनी सुखेच्छाएँ सफल होती हैं, उसी परिमाणसे हम उसे सुखी समझते हैं, और जब सुखे- च्छाओँकी अपेक्षा सुखोपभोग कम हो जाता है, तब कहा जाता है, कि वह मनुष्य उस परिमाणसे दुःखी है। इस परिमाणको गणित-रीतिसे समझाना हो तो सुखोप- भोगको सुखेच्छासे भाग देना चाहिये और अपूर्णांकके रूपमें सुखेच्छा ऐसा लिखना चाहिये। परंतु यह अपूर्णांक हैभी विलक्षण; क्योंकि इसका हर (अर्थात् सुखेच्छा), अंश (अर्थात् सुखोपभोग) की अपेक्षा, हमेशा अधिकाधिक बढ़ताही रहता है। यदि यह अपूर्णांक पहले १/२ हो, और यदि आगे – उसका अंश १ से ३ हो जाय, तो उसका हर २ से १० हो जायगा – अर्थात् वही अपूर्णांक ३/१० हो जाता है। तात्पर्य यह है, यदि अंश तिगुना बढ़ता है, तो हर पचगुना बढ़ जाता है, जिसका फल यह होता है, कि वह अपूर्णांक पूर्णताकी ओर न जा कर अधिकाधिक अपूर्णताकी ओर चला जाता है। इसका मतलब यही है, कि कोई मनुष्य कितनाही सुखोप- भोग करे, उसकी सुखेच्छा दिनोंदिन बढ़ती ही जाती है; जिससे यह आशा करना व्यर्थ है, कि मनुष्य पूर्ण सुखी हो सकता है। प्राचीन कालमें कितना सुख था, इसका विचार करते समय हम लोग इस अपूर्णांकके अंशका तो पूर्ण ध्यान रखते हैं, परंतु इस बातको भूल जाते हैं, कि अंशकी अपेक्षा हर कितना बढ़ गया है। किंतु जब हमें सुख-दुःखकी मात्राकाही निर्णय करना है, तो हमें किसी ‘काल’का विचार न

१०८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करके सिर्फ यही देखना चाहिये, कि उक्त अपूर्णांकके अंश और हरमें कैसा संबंध है। फिर हमें आप-ही-आप मालूम हो जायगा, कि इस अपूर्णांकका पूर्ण होना असंभव है। “न जातु कामः कामानाम्” इस मनुवचनका (२. ९४) भी यही अर्थ है। संभव है, कि बहुतेरोंको सुख-दुःख नापनेकी गणितकी यह रीति पसंद न हो; क्योंकि यह उष्णतामापक यंत्रके समान कोई निश्चित साधन नहीं है। परंतु इस युक्तिवादसे प्रकट हो जाता है, कि इस बातको सिद्ध करनेके लियेभी कोई निश्चित साधन नहीं, कि “संसारमें सुखही अधिक है।” यह आपत्ति दोनों पक्षोंके लिये समानही है। इसलिये उक्त प्रतिपादनके साधारण सिद्धान्तमें - अर्थात् उस सिद्धान्तमें जो सुखोपभोगकी अपेक्षा सुखेच्छाकी अमर्यादित वृद्धिसे निष्पन्न होता है- यह आपत्ति कुछ बाधा नहीं डाल सकती। धर्म-ग्रंथोंमें तथा संसारके इतिहासमें सिद्धान्तके पोषक अनेक उदाहरण मिलते हैं। किसी जमानेमें स्पेन देशमें मुसलमानोंका राज्य था। वहाँ तीसरा अब्दुल रहमान* नामक एक बहुतही न्यायी और पराक्रमी बादशाह हो गया है। उसने यह देखनेके लिये - कि मेरेदिन कैसे कटते हैं- एक रोजनामचा बनाया था; जिसे देखके अंतमें उसे यह ज्ञात हुआ, कि पचास वर्षके शासन-कालमें उसके केवल चौदह दिन सुखपूर्वक बीते। किसीने हिसाब करके बतलाया है, कि संसारभरके - विशेषतः यूरोपके - प्राचीन और अर्वाचीन सभी तत्त्वज्ञानियोंके मतोंको देखो; तो यही मालूम होगा, कि उनमेंसे प्रायः आधे लोग संसारको दुःखमय कहते हैं, और प्रायः आधे उसे सुखमय कहते हैं। अर्थात् संसारको सुखमय तथा दुःखमय कहनेवालोंकी संख्या प्रायः बराबर है। † यदि इस तुल्य संख्यामें हिंदु तत्त्वज्ञोंके मतोंको जोड़ दें, तो कहना नही होगा, कि संसारको दुःखमय माननेवालोंकी संख्याही अधिक हो जायगी। संसारके सुख-दुःखोंके उक्त विवेचनको सुनकर कोई संन्यासमार्गीय पुरुष कह सकता है; कि यद्यपि तुम इस सिद्धान्तको नहीं मानते कि “सुख कोई सच्चा पदार्थ नहीं है; फलतः सब तृष्णात्मक कर्मोंको छोड़े बिना शांति नहीं मिल सकती।” तथापि तुम्हारेही कथनानुसार यह बात सिद्ध है, कि तृष्णासे असंतोष और असंतोषसे दुःख उत्पन्न होता है। तब ऐसी व्यवस्थामें यह कह देनेमें क्या हर्ज है, कि इस असंतोषको दूर करनेके लिये मनुष्यको अपनी तृष्णाओंका और उन्हींके साथ सब सांसारिक कर्मोंकाभी त्याग करके सदा संतुष्टही रहना चाहिये - फिर तुम्हें इस बातका विचार नहीं करना चाहिये, कि उन कर्मोंको तुम परोपकारके लिये करना चाहते हो या स्वार्थके लिये। महाभारत (महा. वन. २१५. २२) में कहा है, कि “असंतोषस्य नास्त्यन्तस्तुष्टिस्तु परमं सुखम्” अर्थात् असंतोषका अंत

  • Moors in Spain, p. 128 (Story of the Nations Series). † Macmillan's Promotion of Happiness, p. 26.

सुखदुःखविवेक १०९ नहीं है और संतोषही परम सुख है। जैन और बौद्ध धर्मोंकी नींवभी इसी तत्त्वपर डाली गयी है; तथा पश्चिमी देशोंमें शोपेनहर* ने अर्वाचीन कालमें इसी मतका प्रतिपादन किया है; परंतु इसके विरुद्ध यह प्रश्न भी किया जा सकता है, कि जिव्हासे कभी कभी गालियाँ वगैरह अपशब्दोंका उच्चारण करना पड़ता है, तो क्या जीभहीको समूल काटकर फेंक देना चाहिये ? या अग्निसे कभी कभी मकान जल जाते हैं, तो क्या लोगोंने अग्निका सर्वथा त्यागही कर दिया है ? और उन्होंने भोजन बनानाही छोड़ दिया है ? अग्निकी बात कौन कहे; जब हम विद्युत्-शक्तिकोभी मर्यादामें रखकर उसको नित्यव्यवहारके उपयोगमें लाते हैं, तो उसी तरह तृष्णा और असंतोषकीभी सुव्यवस्थित मर्यादा बाँधना कुछ असंभव नहीं है। हां, यदि असंतोष सर्वांशमें और सभी समय हानिकारक होता, तो बात दूसरी थी; परंतु विचार करनेसे मालूम होगा कि सचमुच बात ऐसी नहीं है। असंतोष यह अर्थ बिलकुल नहीं, कि किसी चीजको पानेके लिये रात-दिन हाय हाय करते रहें, रोते रहें; (या न मिलनेपर सिर्फ शिकायतही किया करें)। ऐसे असंतोषको शास्त्रकारोंनेभी निंद्य माना है। परंतु उस इच्छाका मूलभूत असंतोष कभी निंदनीय नहीं कहा जा सकता, जो यह कहे, कि तुम अपनी वर्तमान स्थितिमेंही पड़े पड़े सड़ते मत रहो; किंतु उसमें यथाशक्ति शांत और समचित्तसे अधिकाधिक सुधार करते जाओ; तथा शक्तिके अनुसार उसे उत्तम अवस्थामें ले जानेका प्रयत्न करो। जो समाज चार वर्णोंमें विभक्त है, उसके ब्राह्मणोंने ज्ञानकी, क्षत्रियोंने ऐश्वर्यकी और वैश्योंने धन-धान्यकी उन्नति करनेकी इच्छा या वासना छोड़ दी, तो कहना नहीं होगा, कि वह समाज शीघ्रही अधोगतिको पहुँच जायगा। इसी अभिप्रायको मनमें रखकर व्यासजीने (मभा. शां. २३. ९) युधिष्ठिरसे कहा है, कि "यज्ञो विद्या समुत्थानमंतोषः श्रियं प्रति" - अर्थात् यज्ञ, विद्या, उद्योग और ऐश्वर्यके विषयमें असंतोष (रखना) ये क्षत्रियके गुण हैं। उसी तरह विदुलानेभी अपने पुत्रको उपदेश करते समय (मभा. उ. १३३-३३) कहा है, कि "संतोषो वै श्रियं हन्ति"

  • अर्थात् संतोषसे ऐश्वर्यका नाश होता है; और किसी अन्य अवसरपर एक वाक्य (मभा. सभा. ५५. ११) में यहभी कहा गया है, कि "असंतोषः श्रियो मूलम्" अर्थात् असंतोषही ऐश्वर्यका मूल है।† ब्राह्मणधर्ममें संतोष एक गुण बतलाया गया है सही; परंतु उसका अर्थ केवल यही है, कि वह चातुर्वर्ण्य-धर्मानुसार द्रव्य * Schopenhauer's World as Will and Representation, Vol. II, chap. 46. संसारके दुःखमयत्वका, शोपेनहरकृत वर्णन अत्यंतही सरस है। मूल ग्रंथ जर्मन भाषामें है और उसका भाषांतर अंग्रेजीमेंभी हो चुका है। † Cf. "Unhappiness is the cause of progress." Dr. Paul Caru's, The Ethical Problem, p. 251 (2nd Ed.).

११० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

और ऐहिक ऐश्वर्यके विषयमें संतोष रखे। यदि कोई ब्राह्मण कहने लगे, कि मुझे जितना ज्ञान प्राप्त हो चुका है, उसीसे मुझे संतोष है, तो वह स्वयं अपना नाश कर बैठेगा। इसी तरह यदि कोई वैश्य या शूद्र, अपने अपने धर्मके अनुसार जितना मिला है उतना पा करही, सदा संतुष्ट बना रहे तो उसकीभी वही दशा होगी। सारांश यह है, कि असंतोष सब भावी उत्कर्षका, प्रयत्नका, ऐश्वर्यका और मोक्षका बीज है। हमें इस बातका सदैव ध्यान रखना चाहिये, कि यदि हम असंतोषका पूर्णतया नाश कर डालेंगे तो, इस लोक और परलोकमेंभी हमारी दुर्गति होगी। श्रीकृष्णका उपदेश सुनते समय जब अर्जुनने कहा, कि "भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्तिमेऽमृतम्" (गीता १०. १८) अर्थात् आपके अमृततुल्य भाषणको सुनकर मेरी तृप्ति होतीही नहीं। इसलिये आप फिरसे अपनी विभूतियोंका वर्णन कीजिये - तब भगवानने फिरसे अपनी विभूतियोंका वर्णन आरंभ किया। उन्होंने ऐसा नहीं कहा, कि तू अपनी इच्छाको वशमें रख। असंतोष या अतृप्ति अच्छी बात नहीं है। इससे सिद्ध होता है, कि योग्य और कल्याणकारक बातोंमें उचित असंतोषका होना भगवानकोभी इष्ट है। भर्तृहरिकाभी इसी आशयका एक श्लोक है। यथा "यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ" अर्थात् रुचि या इच्छा अवश्य होनी चाहिये, परंतु वह यशके लियेही हो। और व्यसनभी होना चाहिये, परंतु वह विद्याका हो, अन्य बातोंका नहीं। काम-क्रोध आदि विकारोंके समान असंतोषकोभी वशसे बाहर नहीं होने देना चाहिये। यदि वह वशमें न रहेगा, तो निःसंदेह हमारे सर्वस्वका नाशकर डालेगा। इसी हेतुसे केवल विषयभोगकी प्रीतिके लिये तृष्णा लादकर और एक आशाके बाद दूसरी आशा रखकर सांसारिक सुखोंके पीछे हमेशा भटकनेवाले पुरुषोंकी संपत्तिको गीताके सोलहवें अध्यायमें 'आसुरी संपत्ति' कहा है। ऐसे रात- दिनके लालचीपनसे मनुष्यके मनकी सात्त्विक वृत्तियोंका नाश हो जाता है - उसकी अधोगति होती है; और तृष्णाकी पूरी तृप्ति होना असंभव होनेके कारण कामोपभोग-वासना नित्य अधिकाधिक बढ़ती जाती है; तथा वह मनुष्य अंतमें उसी दशामें मर जाता है! इसके विपरीत तृष्णा या असंतोषके इस दुष्परिणामसे बचनेके लिये सब प्रकारकी तृष्णाओंके साथ सब कार्योंको एकदम छोड़ देनाभी सात्त्विक मार्ग नहीं है। उपर्युक्त कथनानुसार तृष्णा या असंतोष भावी उत्कर्षका बीज है। इसलिये चोरके डरसे साहकोही मार डालनेका प्रयत्न कभी नहीं करना चाहिये। युक्तिका मध्यम मार्ग तो यही है, कि हम इस बातका भली भांति विचार किया करें कि किस तृष्णा या किस असंतोषसे हमें दुःख होता है; और जो विशिष्ट आशा, तृष्णा या असंतोष दुःखकारक हो उसे छोड़ दें। उसके लिये समस्त कर्मोंको छोड़ देना उचित नहीं। केवल दुःखकारी आशाओंकोही छोड़ने और स्वधर्मानुसार कर्म करनेकी इस युक्ति या कौशल्यकोही योग अथवा कर्मयोग कहते हैं (गीता २. ५०); और यही गीताका मुख्यतः प्रतिपाद्य विषय है। इसलिये यहाँ

सुखदुःखविवेक १११ थोड़ा-सा इस बातका और विचार कर लेना चाहिये, कि गीतामें किस प्रका- रकी आशाको दुःखकारी कहा है। मनुष्य कानसे सुनता है, त्वचासे स्पर्श करता है, आँखोंसे देखता है, जिह्वासे स्वाद लेता है तथा नाकसे संघता है। इंद्रियोंके ये व्यापार जिस परिमाणसे इंद्रियोंकी वृत्तियोंके अनुकूल या प्रतिकूल होते हैं, उसी परिमाणमें मनुष्यको सुख अथवा दुःख हुआ करता है। सुख-दुःखके वस्तुस्वरूपके लक्षणका यह वर्णन पहले हो चुका है; परंतु सुख-दुःखोंका विचार केवल इसी परिभाषासे पूरा नहीं हो जाता। आधिभौतिक सुख-दुःखोंके उत्पन्न होनेके लिये बाह्य पदार्थोंका संयोग इंद्रियोंके साथ होना यद्यपि प्रथमतः आवश्यक है, तथापि इसका विचार करनेपर

  • कि आगे इन सुख-दुःखोंका अनुभव मनुष्य किस रीतिसे करता है - तो यह मालूम होगा, कि इंद्रियोंके स्वाभाविक व्यापारसे उत्पन्न होनेवाले इन सुख-दुःखोंको जाननेका (अर्थात् इन्हें अपने लिये स्वीकार या अस्वीकार करनेका) काम हरएक मनुष्यको अपने मनके अनुसारही करना पड़ता है। महाभारतमें कहा है, कि "चक्षुः पश्यति रूपाणि मनसा न तु चक्षुषा" (मभा. शां. ३११. १७) - अर्थात् देखनेका काम केवल आँखोंसेही नहीं होता; किंतु उसमें मनकीभी सहायता आवश्यक है। और यदि मन व्याकुल हो, तो आँखोंसे देखनेपरभी अन- देखा-सा हो जाता है। बृहदारण्यकोपनिषद् (बृ. १. ५. ३) मेंभी यह वर्णन पाया जाता है; यथा (अन्यत्रमना अभूव नादर्शम्) "मेरा मन दूसरी ओर लगा था; इसलिये मुझे नहीं दीख पड़ा" और (अन्यत्रमना अभूवं नाश्रौषम्) "मेरा मन दूसरी ओर था; इसलिये मैं सुन नहीं सका" - इससे यह स्पष्टतया सिद्ध हो जाता है, कि आधिभौतिक सुखदुःखोंका अनुभव करनेके लिये इंद्रियोंके साथ मनकीभी सहायता होनी चाहिये; और आध्यात्मिक सुख-दुःख तो मानसिक ही होते हैं। सारांश यह है, कि सब प्रकारके सुख-दुःखोंका अनुभव अंतमें हमारे मनपरही अवलंबित रहता है; और यदि यह बात सच है, तो यहभी आप-ही-आप सिद्ध हो जाता है, कि मनोनिग्रहसे सुख-दुःखोंके अनुभवकाभी निग्रह अर्थात् दमन करना कुछ असंभव नहीं है। इसी बातको ध्यान रखते हुए मनुजीने सुख-दुःखोंका लक्षण नैयायिकोंके लक्षणसे भिन्न प्रकार बतलाया है। उनका कथन है, कि :- सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम् । एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः ॥ अर्थात् "जो दूसरोंकी (बाह्य-वस्तुओंकी) अधीनतामें है, वह सब दुःख है; और जो अपने (मनके) अधिकारमें है, वह सुख है। यही सुख-दुःखका संक्षिप्त लक्षण है" (मनु. ४. १६०) नैयायिकोंके बतलाये हुए लक्षणको 'वेदना' शब्दमें शारीरिक और मानसिक, दोनों वेदनाओंका समावेश होता है; और उससे सुख-दुःखका

११२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बाह्य वस्तुस्वरूपभी मालूम हो जाता है; और मनका विशेष ध्यान सुख-दुःखोंके केवल आंतरिक अनुभवपर है। बस, इस बातको ध्यानमें रखनेसे सुख-दुःखोंके उक्त दोनों लक्षणोंमें कुछ विरोध नहीं पड़ेगा। इस प्रकार जब सुख-दुःखोंके लिये इंद्रियोंका अवलंब अनावश्यक हो गया, तब तो यही कहना चाहिये कि :- भेषज्यमेतद् दुःखस्य यदेतन्नानुचिंतयेत्। "मनसे दुःखोंका चिंतन न करनाही दुःखनिवारणकी अचूक ओषधि है" (महा. शां. २०५. २); और इसी तरह मनको कठोर बनाकर सत्य तथा धर्मके लिये सुखपूर्वक अग्निमें जलकर भस्म हो जानेवालोंके अनेक उदाहरण इतिहासमेंभी मिलते हैं। इसलिये गीताका कथन है, कि हमें जो कुछ करना है, उसे मनोनिग्रहके साथ और उसकी फलाशाको छोड़ कर तथा सुख-दुःखोंमें समभाव रखकर करना चाहिये। ऐसा करनेसे न तो हमें कर्माचरणका त्याग करना पड़ेगा और न हमें उसके दुःखकी बाधाही होगी। फलाशा-त्यागका यह अर्थ नहीं है, कि हमें जो फल मिले उसे छोड़ दें; अथवा ऐसी इच्छा रखें, कि वह फल कभी किसीको न मिले। इसी तरह फलाशामें और कर्म करनेकी केवल इच्छा, आशा, हेतु या फलके लिये किसी बातकी योजना करनेमेंभी बहुत अंतर है। केवल हाथपैर हिलानेकी इच्छा होनेमें और अमुक मनुष्यको पकड़नेके लिये या किसी मनुष्यको लात मारनेके लिये हाथ- पैर हिलानेकी इच्छामें बहुत भेद है। पहली इच्छा केवल कर्म करनेकीही है, उसमें दूसरा कोई हेतु नहीं होता; और यदि यह इच्छा छोड़ दी जाय, तो कर्मका करनाही रुक जायगा। इस इच्छाके अतिरिक्त प्रत्येक मनुष्यको इस बातका ज्ञानभी होना चाहिये, कि हरएक कर्मका कुछ-न-कुछ फल अथवा परिणाम अवश्यही होगा। बल्कि ऐसे ज्ञानके साथ साथ उसे इस बातकी इच्छा अवश्य होनी चाहिये, कि मैं अमुक फलप्राप्तिके लिये अमुक प्रकारकी योजना करकेही अमुक कर्म करना चाहता हूँ। नहीं तो उसके सभी कार्य पागलोंके-से निरर्थक सिद्ध होंगे। ये सब इच्छाएँ, हेतु, योजनाएँ, परिणाममें दुःखकारक नहीं होती; और, गीताका यह कथनभी नहीं है, कि कोई उनको छोड़ दें। परंतु स्मरण रहे, कि उस स्थितिसे बहुत आगे बढ़ कर जब मनुष्यके मनमें यह भाव होता है, कि "मैं जो कर्म करता हूँ, मेरे उस कर्मका अमुक फल मुझे अवश्यही मिलना चाहिये।" अर्थात् जब कर्मफलके विषयमें, कर्ताकी बुद्धिमें ममत्वकी यह आसक्ति, अभिमान, अभिनिवेश, आग्रह या इच्छा उत्पन्न हो जाती है और मन उसीसे ग्रस्त हो जाता है और जब इच्छानुसार फल मिलनेमें बाधा होने लगती है, तभी दुःख-परंपराका प्रारंभ हुआ करता है। यदि यह बाधा अनिवार्य अथवा दैवकृत हो, तो केवल निराशामात्र होती है, परंतु वह कहीं मनुष्यकृत हुई तो फिर क्रोध या द्वेषभी उत्पन्न हो जाता है, जिससे कुकर्म होनेपर मर मिटना पड़ता है। कर्मके परिणामके विषयमें जो यह ममत्वयुक्त आसक्ति

सुखदुःखविवेक ११३ होती है, उसीको 'फलाशा', 'संग', 'अहंकार-बुद्धि' और 'काम' कहते हैं; और यह बतलानेके लिये, कि संसारकी दुःखपरंपरा यहींसे शुरू होती है, गीताके दूसरे अध्यायमें कहा गया है, कि विषय-संगसे काम, कामसे क्रोध, क्रोधसे मोह और अंतमें मनुष्यका नाशभी होता है (गीता २. ६२, ६३) । अब यह बात सिद्ध हो गई, कि जड़ सृष्टिके अचेतन कर्म स्वयं दुःखके मूल कारण नहीं हैं, किंतु मनुष्य उनमें जो फलाशा, संग, काम या इच्छा लगाये रहता है, वही यथार्थमें दुःखका मूल है। ऐसे दुःखोंसे बचे रहनेका महज उपाय यही है, कि सिर्फ विषयकी फलाशा, संग, काम या आसक्तिको मनोनिग्रहद्वारा छोड़ देना चाहिये। संन्यासमार्गियोंके कथनानुसार सब विषयों और कर्मोंहीको, अथवा सब प्रकारकी इच्छाओंहीको, छोड़ देनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। इसी लिये गीता (गीता २. ६४) में कहा है, कि जो मनुष्य फलाशाको छोड़कर यथाप्राप्त विषयोंका निष्काम और निस्संग-बुद्धिसे सेवन करता है, वही सच्चा स्थितप्रज्ञ है। संसारके कर्मव्यवहार कभी रुक नहीं सकते। मनुष्य चाहे इस संसारमें रहे या न रहे; परंतु प्रकृति अपने गुणधर्मानुसार सदैव अपना व्यापार करतीही रहेगी। जड़ प्रकृतिको न तो उसमें कुछ सुख है, और न दुःख। मनुष्य व्यर्थही अपने आपको महत्त्व देकरही प्रकृतिके व्यवहारोंमें आसक्त हो जाता है, इसीलिये वह सुख-दुःखका भागी हुआ करता है। यदि वह इस आसक्त- बुद्धिको छोड़ दे और अपने सब व्यवहार इस भावनासे करने लगे, कि "गुणा गुणेषु वर्तन्ते" (गीता ३. २८) - प्रकृतिके गुणधर्मानुसारही सब व्यापार हो रहे हैं- तो असंतापजन्य कोईभी दुःख उसको होही नहीं सकता। इसलिये यह समझकर, कि प्रकृति तो अपना व्यापार करतीही रहती है; उसके लिये संसारको दुःखप्रधान मानकर रोते नहीं रहना चाहिये; और न उसको त्यागनेहीका प्रयत्न करना चाहिये। महाभारत (मभा. शां. २५. २६) में व्यासजीने युधिष्ठिरको यह उपदेश दिया है, कि :- सुखं वा यदि वा दुःखं प्रियं वा यदि वाऽप्रियम् । प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः ॥ "चाहे सुख हो या दुःख, प्रिय हो अथवा अप्रिय, जो जिस समय जैसे प्राप्त हो वह उस समय वैसेही, मनको निराश न करते हुए (अर्थात् नाराज बनकर अपने कर्तव्यको न छोड़ते हुए) सेवन करते रहो !" इस उपदेशका महत्त्व पूर्णतया तभी ज्ञात हो सकता है, जब कि हम इस बातको ध्यानमें रखें, कि संसारमें अनेक कर्तव्य ऐसे हैं, जिन्हें दुःख सह करभी करना पड़ता है। भगवद्गीतामेंभी स्थितप्रज्ञका यह लक्षण बतलाया है, कि "यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्" (गीता गी. र. ८

११४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र २. ५७) - अर्थात् शुभ अथवा अशुभ जो कुछ आ पड़े, उसके बारेमें जो सदा निष्काम या निस्संग रहता है, और जो उसका अभिनंदन या द्वेष कुछभी नहीं करता, वही स्थितप्रज्ञ है। फिर पाँचवे अध्याय (गीता ५. २०) में कहा है, कि "न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्" - सुख पा कर फूल न जाना चाहिये। और दुःखमें कातरभी न होना चाहिये। एवं दूसरे अध्याय (गीता २. १४, १५) में इन सुख-दुःखोंको निष्काम-बुद्धिसे भोगनेका उपदेश किया है। भगवान् श्रीकृष्णने उसी उपदेशको बार बार दुहराया है (गीता ५. ९; १३. ९)। वेदान्तशास्त्रकी परिभाषामें उसीको "सब कर्मोंको ब्रह्मार्पण करना" कहते हैं। और भक्ति- मार्गमें 'ब्रह्मार्पण'के बदले 'श्रीकृष्णार्पण' शब्दकी योजना की जाती है। बस यही, गीतार्थ का सारांश है। कर्म चाहे किसीभी प्रकारका हो, परंतु कर्म करनेकी इच्छा और अपने उद्योगको बिना छोड़े तथा फल-प्राप्तिकी आसक्ति न रखकर (अर्थात् निस्संग- बुद्धिसे) उसे करते रहना चाहिये; और साथ-ही-साथ हम भविष्यमें परिणाम- स्वरूप मिलनेवाले सुख-दुःखोंकोभी एकही समान भोगनेके लिये तैयार रहना चाहिये। ऐसा करनेसे अमर्यादित तृष्णादि और असंतोषजनित दुष्परिणामोंसे तो हम बचेंगेही; परंतु दूसरा लाभ यह होगा, कि तृष्णा या असंतोषके साथ साथ कर्मकोभी त्याग देनेसे जीवनकेही नष्ट हो जानेका जो प्रसंग आ सकता है, वह भी नहीं आ सकेगा; और हमारी मनोवृत्तियाँ शुद्ध होकर प्राणिमात्रके लिये हितप्रद हो जायेंगी। इसमें संदेह नहीं, कि इस तरह फलाशा छोड़नेके लियेभी इंद्रियोंका और मनका वैराग्यसे पूरा दमन करना पड़ता है; परंतु स्मरण रहे, कि इंद्रियोंको वशमें करके स्वार्थके बदले वैराग्यसे तथा निष्काम- बुद्धिसे लोकसंग्रहके लिये उन्हें अपने अपने व्यापार करने देना कुछ और बात है; और संन्यास-मार्गानुसार तृष्णाको मारनेके लिये इंद्रियोंके सभी व्यापारोंको अर्थात् कर्मोंको आग्रहपूर्वक समूल नष्ट कर डालना बिलकुलही भिन्न बात है। इन दोनोंमें ज़मीन-आसमानका अंतर है। गीतामें जिस वैराग्यका और जिस इंद्रिय- निग्रहका उपदेश किया गया है, वह पहले प्रकारका है; दूसरे प्रकारका नहीं; और उसी तरह अनुगीता (मभा. अश्व. ३२. १७-२३) में जनक-ब्राह्मण-संवादमें राजा जनक ब्राह्मणरूपधारी धर्मसे कहते हैं कि :- शृणु बुद्धिं च यां ज्ञात्वा सर्वत्र विषयो मम । नाहमात्मार्थमिच्छामि गन्धान् घ्राणगतानपि ॥ . . . . . . . . . . नाहमात्मार्थमिच्छामि मनो नित्यं मनोन्तरे । मनो मे निर्जितं तस्मात् वशे तिष्ठति सर्वदा ॥

सुखदुःखविवेक ११५ अर्थात् "जिस (वैराग्य) बुद्धिको मनमें धारण करके मैं सब विषयोंका सेवन करता हूँ, उसका हाल सुनो। नाकसे मैं 'अपने लिये' वास नहीं लेता (आँखोंसे मैं 'अपने लिये' नहीं देखता, इत्यादि), और मनकाभी उपयोग मैं आत्माके लिये अर्थात् अपने लाभके लिये नहीं करता। अतएव मेरी नाक (आँख इत्यादि) और मन मेरे वशमें हैं, अर्थात् मैंने उन्हें जीत लिया है।" गीताके वचनकाभी (गीता ३. ६, ७) यही तात्पर्य है, कि जो मनुष्य केवल इंद्रियोंकी वृत्तियोंको तो रोक देता है, और मनसे विषयोंका चिंतन करता रहता है, वह पूरा ढोंगी है; और जो मनुष्य मनोनिग्रहपूर्वक काम्य-बुद्धिको जीत कर, सब मनोवृत्तियोंको लोकसंग्रहके लिये अपना अपना काम करने देता है, वही श्रेष्ठ है। बाह्य जगत् या इंद्रियोंके व्यापार हमारे उत्पन्न किये हुए नहीं हैं, वे स्वभावसिद्ध हैं। हम देखते हैं, जब कोई संन्यासी बहुत भूखा होता है तब उसको चाहे वह कितनाही निग्रही हो - भीख माँगनेके लिये कहीं बाहर जानाही पड़ता है (गीता ३. ३३); या बहुत देरतक एक जगह बैठे रहनेसे ऊबकर वह उठ खड़ा हो जाता है। तात्पर्य यह है, कि निग्रह चाहे जितना हो; परंतु इंद्रियोंके जो स्वभावसिद्ध व्यापार हैं, वे कभी नहीं छूटते। और यदि यह बात सच है, तो इंद्रियोंकी वृत्तियों तथा सब कर्मोंको और सब प्रकारकी इच्छाओं या असंतोषको नष्ट करनेके दुराग्रहमें न पड़ना (गीता २. ४७; १८. ५९), एवं मनोनिग्रहपूर्वक फलाशा छोड़ कर सुख-दुःखोंको एक बराबर समझना (गीता २. १८), तथा निष्काम-बुद्धिसे लोकहितके लिये कर्मोंका शास्त्रोक्त रीतिसे करते रहनाही, श्रेष्ठ तथा आदर्श मार्ग है। इसीलिये - कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि ॥ इस श्लोकमें (गीता २. ४७) श्रीभगवान् अर्जुनको पहले यह बतलाते हैं, कि तू इस कर्मभूमिमें पैदा हुआ है, इसलिये "तुझे कर्म करनेकाही अधिकार है"; परंतु इस बातकोभी ध्यानमें रख, कि तेरा यह अधिकार केवल (कर्तव्य) कर्म करने- तकही सीमित है। इस 'एव' पदका अर्थ है 'केवल'; जिससे यह सहज विदित होता है, कि मनुष्यका अधिकार कर्मके सिवा अन्य बातोंमें - अर्थात् कर्मफलके विषयमें नहीं है। यह महत्त्वपूर्ण बात केवल अनुमानपरही अवलंबित नहीं रख दी है; क्योंकि दूसरे चरणमें भगवान्‌ने स्पष्ट शब्दोंमें पुनः कह दिया है, कि "तेरा अधिकार कर्मफलके विषयमें कुछभी नहीं है।" अर्थात् किसी कर्मका फल मिलना - न मिलना तेरे अधिकारकी बात नहीं है। वह सृष्टिके कर्मविपाकपर या ईश्वरपर अवलंबित है। फिर जिस बातमें हमारा अधिकारही नहीं है उसके विषयमें आशा - करना कि वह अमुक प्रकार हो - केवल मूर्खताका लक्षण है; परंतु यह तीसरी बातभी अनुमानपर अवलंबित नहीं है। तीसरे चरणमें कहा गया है, कि "इसलिये तू कर्म-

११६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फलकी लालचसे किसीभी कामको मत कर।" क्योंकि, कर्मविपाकके अनुसार तेरे कर्मोंका जो फल प्राप्त होगा वह अवश्य होगाही। तेरी इच्छासे उसमें कुछ न्यूना- धिकता नहीं हो सकती; और उसके देरीसे या जल्दीसे मिल जानेकी संभावना नहीं है। परंतु तेरे लालचीपनसे तो तुझे केवल व्यर्थ दुःखही मिलेगा। अब यहाँ कोई-विशेषतः संन्यासमार्गी पुरुष-प्रश्न करेंगे, कि कर्म करके फलाशा छोड़नेके झगड़ेमें पड़नेकी अपेक्षा कर्माचरणकोही छोड़ देना क्या अच्छा नहीं होगा? इस- लिये भगवान्‌ने अंतमें अपना निश्चित मतभी बतला दिया है, कि "कर्म न करनेका (अकर्मणि) तू हठ मत कर। तेरा जो अधिकार है उसके अनुसार-परंतु फलाशा छोड़कर-कर्म करता जा।" कर्मयोगकी दृष्टिसे ये सब सिद्धान्त इतने महत्त्वपूर्ण हैं, कि उक्त श्लोकके चारों चरणोंको यदि हम कर्मयोगशास्त्र या गीता-धर्मके चतुःसूत्री कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह मालूम हो गया, कि इस संसारमें सुख-दुःख हमेशा क्रमसे मिला करते हैं; और यहाँ सुख की अपेक्षा दुःखकी मात्रा अधिक है। ऐसी अवस्थामेंभी जब यह सिद्धान्त बतलाया जाता है, कि सांसारिक कर्मोंको छोड़ नहीं देना चाहिये; तब कुछ लोगोंकी यह समझ हो सकती है, कि दुःखकी आत्यंतिक निवृत्ति करने और अत्यंत सुख प्राप्त करनेके सब मानवी प्रयत्न व्यर्थ हैं। और केवल आधिभौतिक अर्थात् इंद्रियगम्य बाह्य विषयोपभोगरूपी सुखोंकोही देखें, तो यह नहीं कहा जा सकता, कि उनकी यह समझ ठीक नहीं है। यह सच है, कि यदि कोई बालक पूर्णचंद्रको पकड़नेके लिये हाथ फैला दे, तो जैसे आकाशका चंद्रमा उसके हाथमें कभी नहीं आता; उसी तरह आत्यंतिक सुखकी आशा रखकर केवल आधिभौतिक सुखके पीछे लगे रहनेसे आत्यंतिक सुखकी प्राप्ति कभी नहीं होगी। परंतु स्मरण रहे, कि आधिभौतिक सुखही समस्त प्रकारके सुखोंका भांडार नहीं है। इसलिये उपर्युक्त कठिनाईमेंभी आत्यंतिक और नित्य सुखप्राप्तिका मार्ग ढूंढ़ लिया जा सकता है। यह ऊपर बतलाया जा चुका है, कि सुखोंके दो भेद हैं-एक शारीरिक और दूसरा मानसिक और शरीर अथवा इंद्रियोंके व्यापारोंकी अपेक्षा मनको अंतमें अधिक महत्त्व देना पड़ता है। ज्ञानी पुरुष जो यह सिद्धान्त बतलाते हैं, कि शारीरिक (अर्थात् आधिभौतिक) सुखकी अपेक्षा मानसिक सुखकी योग्यता अधिक है, उसे वे कुछ अपने ज्ञानके घमंडसे नहीं बतलाते। प्रसिद्ध आधिभौतिकवादी मिलनेभी अपने उपयुक्तता- वादविषयक ग्रंथमें साफ़ मंजूर किया है,* कि उस सिद्धान्तमेंही श्रेष्ठ मनुष्य-

  • "It is better to be a human being dissatisfied than a pig satis- fied, better to be Socrates dissatisfied than a fool satisfied. And if the fool, or the pig, is of a different opininon, it is because they only know their own side of the question." Utilitarianism; p. 14 (Longmans 1907).

सुखदुःखविवेक ११७ जन्मकी सच्ची सार्थकता और महत्ता है। कुत्ते, शूकर और बैल इत्यादिकोभी इंद्रियसुखका आनंद मनुष्योंके समानही होता है; और मनुष्यकी यदि यह समझ होती, कि संसारमें सच्चा सुख विषयोपभोगही है; तो मनुष्य पशु बननेपरभी राजी हो गया होता। परंतु पशुओंके सब विषय-सुखोंके नित्य मिलनेका अवसर आने- परभी कोई मनुष्य पशु होनेको राजी नहीं होता। इससे यही विदित होता है, कि पशुकी अपेक्षा मनुष्यमें कुछ-न-कुछ विशेषता अवश्य है। इस विशेषताको समझनेके लिये, उस आत्माके स्वरूपका विचार करना पड़ता है, जिसे मन और बुद्धिद्वारा स्वयं अपना और बाह्यसृष्टिका ज्ञान होता है; और, ज्योंही यह विचार किया जायगा त्योंही स्पष्ट मालूम हो जायगा, कि पशु और मनुष्यके लिये विषयोपभोगसुख तो एकही-सा है; परंतु उसकी अपेक्षा मन और बुद्धिके अत्यंत उदात्त व्यापारमें तथा शुद्धावस्थामें जो सुख है, वही मनुष्यका श्रेष्ठ और आत्यंतिक सुख है। यह सुख आत्मवश है, इसकी प्राप्ति किसी वाह्यवस्तुपर अवलंबित नहीं है और इसकी प्राप्तिके लिये दूसरोंके सुखको न्यून करनेकीभी कुछ आवश्यकता नहीं है। यह सुख अपनेही प्रयत्नसे हमीको मिलता है। और ज्यों ज्यों हमारी उन्नति होती जाती है, त्यों त्यों इस सुखका स्वरूपभी अधिकाधिक शुद्ध और निर्मल होता चला जाता है। भर्तृहरिने सच कहा है, कि "मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः" - मनके प्रसन्न होनेपर क्या दरिद्रता और क्या अमीरी, दोनों समानही हैं। प्लेटो नामक प्रसिद्ध यूनानी तत्त्ववेत्तानेभी यह प्रतिपादन किया है, कि शारीरिक (अर्थात् वाह्य या आधिभौतिक) सुखकी अपेक्षा मनका सुख श्रेष्ठ है, और मनके सुखसेभी बुद्धिग्राह्य (अर्थात् परम आध्यात्मिक) सुख अत्यंत श्रेष्ठ है।* इसलिये यदि हम अभी मोक्षके विचारको छोड़ दें, तोभी यही सिद्ध होता है, कि जो बुद्धि आत्म- विचारमें निमग्न हो, उसीही परम सुख मिल सकता है। इसी कारण भगवद्गीतामें सुखके - सात्त्विक, राजस और तामस तीन भेद किये गये हैं और इनका लक्षणभी बतलाया गया है। यथा-आत्मनिष्ठ बुद्धि (अर्थात् सब भूतोंमें एकही आत्माको जानकर, आत्माके उसी सच्चे स्वरूपमें रत होनेवाली बुद्धि) की प्रसन्नतासे जो आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है, वही श्रेष्ठ और सात्त्विक सुख है - "तन्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तं आत्मबुद्धिप्रसादजम्" (गीता १८. ३७); जो आधिभौतिक सुख इंद्रियोंसे और इंद्रियोंके विषयोंसे होता है, वह सात्त्विक सुखसे कम दर्जेका होता है, और राजस कहलाता है (गीता १८. ३८)। और जिस सुखसे चित्तको मोह होता है, तथा जो सुख, निद्रा या आलस्यसे उत्पन्न होता है, उसकी योग्यता तामस अर्थात् अत्यन्त कनिष्ठ श्रेणीकी है। इस प्रकरणके आरंभमें गीताका जो श्लोक दिया है, उसका यही तात्पर्य है। और गीता (गीता ६. २२) में यहभी कहा है, कि इस * Republic Book IX.

११८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परम सुखका अनुभव मनुष्यको यदि एक बारभी हो जाता है, तो फिर कितनेही भारी दुःखके जबरदस्त धक्के क्यों न लगते रहें, उसकी यह सुखमय स्थिति कभी नहीं डिगने पाती। यह आत्यंतिक सुख स्वर्गकेभी विषयोपभोगसुखमें नहीं मिल सकता और इसे पानेके लिये पहले अपनी बुद्धि प्रसन्न होनी चाहिये। जो मनुष्य बुद्धिको प्रसन्न रखनेकी युक्तिको बिना सोचे-समझे केवल विषयोपभोगमेंही निमग्न हो जाता है, उसका सुख अनित्य और क्षणिक होता है। इसका कारण यह है, कि जो इंद्रियसुख आज है, वह कल नहीं रहता। इतनाही नहीं; किंतु जो बात हमारी इंद्रियोंको आज सुखकारक प्रतीत होती है, वही किसी कारणसे दूसरे दिन दुःखमय हो जाती है। उदाहरणार्थ, ग्रीष्म ऋतुमें जो ठंडा पानी हमें अच्छा लगता है, वही शीतकालमें अप्रिय हो जाता है। अस्तु, इतना करनेपरभी उसमे सुखेच्छाकी पूर्ण तृप्ति होनेही नहीं पाती। इसलिये, सुखका व्यापक अर्थ लेकर यदि हम उस शब्दका उपयोग सभी प्रकारके सुखोंके लिये करें, तोभी हमें सुख-सुखमें भेद करनाही पड़ेगा। नित्य व्यवहारमें सुखका अर्थ मुख्यतः इंद्रियसुखही होता है। परंतु जो इंद्रियातीत है, अर्थात् जो केवल आत्मनिष्ठ बुद्धिकोही ज्ञात हो सकता है, उसमें और विषयोप- भोगरूपी सुखमें जब भिन्नता प्रकट करनी हो, तब आत्मबुद्धि-प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले सुखको - अर्थात् आध्यात्मिक सुखको - श्रेय, कल्याण, हित, आनंद अथवा शांति कहते हैं, और विषयोपभोगमे होनेवाले आधिभौतिक सुखको केवल सुख या प्रेय कहते हैं। पिछले प्रकरणके अंतमें दिये हुए कठोपनिषदके वाक्यमें, प्रेय और श्रेयमे नचिकेताने जो भेद बतलाया है उसकाभी अभिप्राय यही है। मृत्युने उसे अग्निका रहस्य पहलेही बतला दिया था। परंतु इस सुखके मिलनेपरभी जब उसने आत्मज्ञान-प्राप्तिका वर माँगा, तब मृत्युने उसके बदलेमें उसे अनेक सांसारिक सुखोंका लालच दिखलाया। परंतु नचिकेता इन अनित्य, आधिभौतिक सुखोंको कल्याणकारक नहीं समझता था। क्योंकि ये (प्रेय) सुख बाहरी दृष्टिमे अच्छे हैं, पर आत्माके श्रेयके लिये अच्छे नहीं। इसीलिये उसने उन सुखोंकी ओर ध्यान नहीं दिया। किंतु उस आत्मविद्याकी प्राप्तिके लियेही हठ किया; जिसका परिणाम आत्माके लिये श्रेयस्कर या कल्याणकारक है, और उसे अंतमें पाकरही छोड़ा। सारांश यह है, कि आत्मबुद्धि-प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले केवल बुद्धिगम्य सुखको - अर्थात् आध्यात्मिक सुखकोही - हमारे शास्त्रकार श्रेष्ठ सुख मानते हैं। और उनका कथन है, कि यह नित्य सुख आत्मवश है, इसलिये सभीको प्राप्त हो सकता है; तथा सब लोगोंको चाहिये, कि वे इसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करें। पशु-धर्ममे प्राप्त सुखमें, और मानवी सुखमें जो कुछ विशेषता या विलक्षणता है, वह यही है; और यह आत्मानंद केवल बाह्य उपाधियोंपर कभी निर्भर न होनेके कारण सब सुखोंमें नित्य, स्वतंत्र और श्रेष्ठ है। इसीको गीतामें निर्वाण, अर्थात् परम शांति कहा है (गीता ६. १५), और यही स्थितप्रज्ञोंकी

सुखदुःखविवेक ११९ ब्राह्मी अवस्थाकी परमावधिका मुख है (गीता २. ७१; ६. २८; १२. १२; १८. ६२) । अब इस बातका निर्णय हो चुका, कि आत्माकी शांति या सुखही अत्यंत श्रेष्ठ है; और वह आत्मवश होनेके कारण सब लोगोंको प्राप्यभी है। परंतु यह प्रकट है, कि यद्यपि सब धातुओंमें सोना अधिक मूल्यवान् है, तथापि केवल सोनेसेही

  • लोहा इत्यादि अन्य धातुओंके बिना - जैसे संसारकाम नहीं चल सकता, अथवा जैसे केवल शक्करसेही - विना नमकके - काम नहीं चल सकता, उसी तरह आत्म- सुख या शांतिकोभी समझना चाहिये। इसमें संदेह नहीं, कि इस शांतिके साथ - शरीर-धारणके लिये सही - कुछ सांसारिक वस्तुओंकी आवश्यकता होती है; और इसी अभिप्रायसे आशीर्वादके संकल्पमें केवल 'शांतिरस्तु' न कह कर " शांतिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु" - अर्थात् शांतिके साथ पुष्टि और तुष्टिभी चाहिये - कहनेकी रीति है। यदि शास्त्रकारोंकी यह समझ होती, कि केवल शांतिसे ही तुष्टि हो सकती है, तो इस संकल्पमें 'पुष्टि' शब्दको व्यर्थ घुसेड़ देनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी। इसका यह मतलब नहीं है, कि पुष्टि - अर्थात् ऐहिक सुखोंकी वृद्धिके लिये रात- दिन लालच करते रहो। उक्त संकल्पका भावार्थ यही है, कि तुम्हें शांति, पुष्टि और तुष्टि (संतोष), तीनों उचित परिमाणमें मिलें; और इनकी प्राप्तिके लिये तुम्हें यत्नभी करना चाहिये। कठोपनिषद्‌काभी यही तात्पर्य है। नचिकेता जब मृत्युके अर्थात् यमके लोकमें गया तब यमने उससे कहा, कि तुम कोईभी तीन वर माँग लो; और उससे माँगेपर दे दिये, इतनीही कथा इस उपनिषदमें विस्तारसे दी गयी है; पर उस समय नचिकेताने एकदम यह वर नहीं माँगा, कि मुझे ब्रह्मज्ञानका उपदेश करो। किंतु उसने कहा, कि "मेरे पिता मुझपर क्रुद्ध हैं, इसलिये प्रथम वर आप मुझे यही दीजिये, कि वे मुझपर प्रसन्न हो जावें।" अनंतर उसने दूसरा वर माँगा कि "अग्निके - अर्थात् ऐहिक समृद्धि प्राप्त करा देनेवाले यज्ञ आदि कर्मोंके - ज्ञानका उपदेश करो।" इन दोनों वरोंको प्राप्त करके अंतमें उसने तीसरा वर यह माँगा, कि "मुझे आत्मविद्याका उपदेश करो।" परंतु जब यमराज कहने लगे, कि इस तीसरे वरके बदलेमें तुझे औरभी अधिक संपत्ति देता हूँ; तब - अर्थात् प्रेय (सुख) की प्राप्तिके लिये आवश्यक यज्ञ आदि कर्मोंका ज्ञान प्राप्त हो जाने- पर उसीकी अधिक आशा न करके - नचिकेताने इस बातका आग्रह किया, कि "अब मुझे श्रेय (आत्यंतिक सुख) की प्राप्ति करा देनेवाले ब्रह्मज्ञानकाही उपदेश करो।" सारांश यह है, कि इस उपनिषद्‌के अंतिम मंत्रमें जो वर्णन है, उसके अनुसार 'ब्रह्मविद्या' और 'योगविधि' (अर्थात् यज्ञ-याग आदि कर्म), दोनोंको प्राप्त करके नचिकेता मुक्त हो गया है (कठ. ६. १८)। इससे ज्ञान और कर्म इन दोनोंका समुच्चयही इस उपनिषद्‌का तात्पर्य सिद्ध होता है। इसी विषयपर इंद्रकीभी एक कथा है। कौषीतकी उपनिषद्में कहा गया है, कि इंद्र तो स्वयं ब्रह्मज्ञानी थाही,

१२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और उसने प्रतर्दनकोभी ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया था। तथापि जब इंद्रका राज छिन लिया गया और प्रल्हादको त्रैलोक्यका आधिपत्य मिला, तब इंद्रने देवगुरु बृहस्पतिसे पूछा, कि "मुझे बतलाइये कि श्रेय किसमें है ?" तब बृहस्पतिने राज्यभ्रष्ट इंद्रको ब्रह्मविद्या अर्थात् आत्मज्ञानका उपदेश करके कहा, कि "श्रेय इसीमें है" - एतावच्छ्रेय इति - परंतु इससे इंद्रका समाधान नहीं हुआ। उसने फिर प्रश्न किया, "क्या औरभी कुछ अधिक है ?" - को विशेषो भवेत् ? - तब बृहस्पतिने उसे शुक्राचार्यके पास भेजा। वहाँभी वही हाल हुआ; और शुक्राचार्यने कहा, कि "प्रल्हादको वह विशेषता मालूम है।" तब अंतमें इंद्र ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रल्हादका शिष्य बनकर सेवा करने लगा। एक दिन प्रल्हादने उससे कहा, कि शील (सत्य तथा धर्मसे चलने का स्वभाव) ही त्रैलोक्यका राज्य पाने का रहस्य है और वही श्रेय है। अनंतर, जब प्रल्हादने कहा, कि "मैं तेरी सेवासे प्रसन्न हूँ, तू चाहे जो वर माँग," तब ब्राह्मण-वेशधारी इंद्रने यही वर माँगा, कि "आप अपना शील मुझे दीजिये।" प्रल्हादके 'तस्थातु' कहतेही उसके 'शील'के साथ धर्म, सत्य, वृत्त, श्री अथवा ऐश्वर्य आदि सब देवता उसके शरीरसे निकल कर इंद्र-शरीरमें प्रविष्ट हो गये। फलतः इंद्र अपना राज्य पा गया। यह प्राचीन कथा भीष्मने युधिष्ठिरसे महाभारतके शांतिपर्व (महा. शां. १२४) में कही है। इस सुंदर कथासे हमें यह बात साफ़ मालूम हो जाती है, कि केवल ऐश्वर्यकी अपेक्षा केवल आत्मज्ञानकी योग्यता भले ही अधिक हो, परंतु जिस इस संसारमें रहना है, उसको अन्य लोगोंके समानही अपने लिये तथा अपने देशके लिये, ऐहिक समृद्धि प्राप्त कर लेनेकी आवश्यकता और नैतिक हक भी है। इसलिये जब यह प्रश्न उठे, कि इस संसारमें मनुष्यका सर्वोत्तम ध्येय या परम उद्देश्य क्या है, तो हमारे कर्मयोगशास्त्रमें अंतिम उत्तर यही मिलता है, कि शांति और पुष्टि, प्रेय और श्रेय अथवा ज्ञान और ऐश्वर्य दोनोंको एक साथ प्राप्त करो। सोचनेकी बात है, कि जिन भगवान्‌से बढ़कर संसारमें और कोई श्रेष्ठ नहीं और जिनके दिखलाये हुए मार्गपर अन्य सभी लोग चलते हैं (गीता ३ : २३); उस भगवान्‌ने क्या ऐश्वर्य और संपत्तिका छोड़ दिया है ? ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ अर्थात् "समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, संपत्ति, ज्ञान और वैराग्य इन छः बातोंको 'भग' कहते हैं"। भग शब्दकी ऐसी व्याख्या पुराणोंमें है (विष्णु. ६. ५. ७४)। कुछ लोग इस श्लोकके 'ऐश्वर्य' शब्दका अर्थ 'योगैश्वर्य' किया करते हैं। क्योंकि 'श्री' अर्थात् संपत्तिसूचक शब्द आगे आया है। परंतु व्यवहारमें ऐश्वर्य शब्दमें सत्ता, यश और संपत्तिका, तथा ज्ञानमें वैराग्य और धर्मका समावेश हुआ करता है। इससे हम बिना किसी बाधाके कह सकते हैं, कि लौकिक दृष्टिसे उक्त श्लोकका