भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

११६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र फलकी लालचसे किसीभी कामको मत कर।" क्योंकि, कर्मविपाकके अनुसार तेरे कर्मोंका जो फल प्राप्त होगा वह अवश्य होगाही। तेरी इच्छासे उसमें कुछ न्यूना- धिकता नहीं हो सकती; और उसके देरीसे या जल्दीसे मिल जानेकी संभावना नहीं है। परंतु तेरे लालचीपनसे तो तुझे केवल व्यर्थ दुःखही मिलेगा। अब यहाँ कोई-विशेषतः संन्यासमार्गी पुरुष-प्रश्न करेंगे, कि कर्म करके फलाशा छोड़नेके झगड़ेमें पड़नेकी अपेक्षा कर्माचरणकोही छोड़ देना क्या अच्छा नहीं होगा? इस- लिये भगवान्‌ने अंतमें अपना निश्चित मतभी बतला दिया है, कि "कर्म न करनेका (अकर्मणि) तू हठ मत कर। तेरा जो अधिकार है उसके अनुसार-परंतु फलाशा छोड़कर-कर्म करता जा।" कर्मयोगकी दृष्टिसे ये सब सिद्धान्त इतने महत्त्वपूर्ण हैं, कि उक्त श्लोकके चारों चरणोंको यदि हम कर्मयोगशास्त्र या गीता-धर्मके चतुःसूत्री कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह मालूम हो गया, कि इस संसारमें सुख-दुःख हमेशा क्रमसे मिला करते हैं; और यहाँ सुख की अपेक्षा दुःखकी मात्रा अधिक है। ऐसी अवस्थामेंभी जब यह सिद्धान्त बतलाया जाता है, कि सांसारिक कर्मोंको छोड़ नहीं देना चाहिये; तब कुछ लोगोंकी यह समझ हो सकती है, कि दुःखकी आत्यंतिक निवृत्ति करने और अत्यंत सुख प्राप्त करनेके सब मानवी प्रयत्न व्यर्थ हैं। और केवल आधिभौतिक अर्थात् इंद्रियगम्य बाह्य विषयोपभोगरूपी सुखोंकोही देखें, तो यह नहीं कहा जा सकता, कि उनकी यह समझ ठीक नहीं है। यह सच है, कि यदि कोई बालक पूर्णचंद्रको पकड़नेके लिये हाथ फैला दे, तो जैसे आकाशका चंद्रमा उसके हाथमें कभी नहीं आता; उसी तरह आत्यंतिक सुखकी आशा रखकर केवल आधिभौतिक सुखके पीछे लगे रहनेसे आत्यंतिक सुखकी प्राप्ति कभी नहीं होगी। परंतु स्मरण रहे, कि आधिभौतिक सुखही समस्त प्रकारके सुखोंका भांडार नहीं है। इसलिये उपर्युक्त कठिनाईमेंभी आत्यंतिक और नित्य सुखप्राप्तिका मार्ग ढूंढ़ लिया जा सकता है। यह ऊपर बतलाया जा चुका है, कि सुखोंके दो भेद हैं-एक शारीरिक और दूसरा मानसिक और शरीर अथवा इंद्रियोंके व्यापारोंकी अपेक्षा मनको अंतमें अधिक महत्त्व देना पड़ता है। ज्ञानी पुरुष जो यह सिद्धान्त बतलाते हैं, कि शारीरिक (अर्थात् आधिभौतिक) सुखकी अपेक्षा मानसिक सुखकी योग्यता अधिक है, उसे वे कुछ अपने ज्ञानके घमंडसे नहीं बतलाते। प्रसिद्ध आधिभौतिकवादी मिलनेभी अपने उपयुक्तता- वादविषयक ग्रंथमें साफ़ मंजूर किया है,* कि उस सिद्धान्तमेंही श्रेष्ठ मनुष्य-

  • "It is better to be a human being dissatisfied than a pig satis- fied, better to be Socrates dissatisfied than a fool satisfied. And if the fool, or the pig, is of a different opininon, it is because they only know their own side of the question." Utilitarianism; p. 14 (Longmans 1907).