श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखदुःखविवेक ११७ जन्मकी सच्ची सार्थकता और महत्ता है। कुत्ते, शूकर और बैल इत्यादिकोभी इंद्रियसुखका आनंद मनुष्योंके समानही होता है; और मनुष्यकी यदि यह समझ होती, कि संसारमें सच्चा सुख विषयोपभोगही है; तो मनुष्य पशु बननेपरभी राजी हो गया होता। परंतु पशुओंके सब विषय-सुखोंके नित्य मिलनेका अवसर आने- परभी कोई मनुष्य पशु होनेको राजी नहीं होता। इससे यही विदित होता है, कि पशुकी अपेक्षा मनुष्यमें कुछ-न-कुछ विशेषता अवश्य है। इस विशेषताको समझनेके लिये, उस आत्माके स्वरूपका विचार करना पड़ता है, जिसे मन और बुद्धिद्वारा स्वयं अपना और बाह्यसृष्टिका ज्ञान होता है; और, ज्योंही यह विचार किया जायगा त्योंही स्पष्ट मालूम हो जायगा, कि पशु और मनुष्यके लिये विषयोपभोगसुख तो एकही-सा है; परंतु उसकी अपेक्षा मन और बुद्धिके अत्यंत उदात्त व्यापारमें तथा शुद्धावस्थामें जो सुख है, वही मनुष्यका श्रेष्ठ और आत्यंतिक सुख है। यह सुख आत्मवश है, इसकी प्राप्ति किसी वाह्यवस्तुपर अवलंबित नहीं है और इसकी प्राप्तिके लिये दूसरोंके सुखको न्यून करनेकीभी कुछ आवश्यकता नहीं है। यह सुख अपनेही प्रयत्नसे हमीको मिलता है। और ज्यों ज्यों हमारी उन्नति होती जाती है, त्यों त्यों इस सुखका स्वरूपभी अधिकाधिक शुद्ध और निर्मल होता चला जाता है। भर्तृहरिने सच कहा है, कि "मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः" - मनके प्रसन्न होनेपर क्या दरिद्रता और क्या अमीरी, दोनों समानही हैं। प्लेटो नामक प्रसिद्ध यूनानी तत्त्ववेत्तानेभी यह प्रतिपादन किया है, कि शारीरिक (अर्थात् वाह्य या आधिभौतिक) सुखकी अपेक्षा मनका सुख श्रेष्ठ है, और मनके सुखसेभी बुद्धिग्राह्य (अर्थात् परम आध्यात्मिक) सुख अत्यंत श्रेष्ठ है।* इसलिये यदि हम अभी मोक्षके विचारको छोड़ दें, तोभी यही सिद्ध होता है, कि जो बुद्धि आत्म- विचारमें निमग्न हो, उसीही परम सुख मिल सकता है। इसी कारण भगवद्गीतामें सुखके - सात्त्विक, राजस और तामस तीन भेद किये गये हैं और इनका लक्षणभी बतलाया गया है। यथा-आत्मनिष्ठ बुद्धि (अर्थात् सब भूतोंमें एकही आत्माको जानकर, आत्माके उसी सच्चे स्वरूपमें रत होनेवाली बुद्धि) की प्रसन्नतासे जो आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है, वही श्रेष्ठ और सात्त्विक सुख है - "तन्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तं आत्मबुद्धिप्रसादजम्" (गीता १८. ३७); जो आधिभौतिक सुख इंद्रियोंसे और इंद्रियोंके विषयोंसे होता है, वह सात्त्विक सुखसे कम दर्जेका होता है, और राजस कहलाता है (गीता १८. ३८)। और जिस सुखसे चित्तको मोह होता है, तथा जो सुख, निद्रा या आलस्यसे उत्पन्न होता है, उसकी योग्यता तामस अर्थात् अत्यन्त कनिष्ठ श्रेणीकी है। इस प्रकरणके आरंभमें गीताका जो श्लोक दिया है, उसका यही तात्पर्य है। और गीता (गीता ६. २२) में यहभी कहा है, कि इस * Republic Book IX.