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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 956 में से

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पृष्ठ 165

११८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परम सुखका अनुभव मनुष्यको यदि एक बारभी हो जाता है, तो फिर कितनेही भारी दुःखके जबरदस्त धक्के क्यों न लगते रहें, उसकी यह सुखमय स्थिति कभी नहीं डिगने पाती। यह आत्यंतिक सुख स्वर्गकेभी विषयोपभोगसुखमें नहीं मिल सकता और इसे पानेके लिये पहले अपनी बुद्धि प्रसन्न होनी चाहिये। जो मनुष्य बुद्धिको प्रसन्न रखनेकी युक्तिको बिना सोचे-समझे केवल विषयोपभोगमेंही निमग्न हो जाता है, उसका सुख अनित्य और क्षणिक होता है। इसका कारण यह है, कि जो इंद्रियसुख आज है, वह कल नहीं रहता। इतनाही नहीं; किंतु जो बात हमारी इंद्रियोंको आज सुखकारक प्रतीत होती है, वही किसी कारणसे दूसरे दिन दुःखमय हो जाती है। उदाहरणार्थ, ग्रीष्म ऋतुमें जो ठंडा पानी हमें अच्छा लगता है, वही शीतकालमें अप्रिय हो जाता है। अस्तु, इतना करनेपरभी उसमे सुखेच्छाकी पूर्ण तृप्ति होनेही नहीं पाती। इसलिये, सुखका व्यापक अर्थ लेकर यदि हम उस शब्दका उपयोग सभी प्रकारके सुखोंके लिये करें, तोभी हमें सुख-सुखमें भेद करनाही पड़ेगा। नित्य व्यवहारमें सुखका अर्थ मुख्यतः इंद्रियसुखही होता है। परंतु जो इंद्रियातीत है, अर्थात् जो केवल आत्मनिष्ठ बुद्धिकोही ज्ञात हो सकता है, उसमें और विषयोप- भोगरूपी सुखमें जब भिन्नता प्रकट करनी हो, तब आत्मबुद्धि-प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले सुखको - अर्थात् आध्यात्मिक सुखको - श्रेय, कल्याण, हित, आनंद अथवा शांति कहते हैं, और विषयोपभोगमे होनेवाले आधिभौतिक सुखको केवल सुख या प्रेय कहते हैं। पिछले प्रकरणके अंतमें दिये हुए कठोपनिषदके वाक्यमें, प्रेय और श्रेयमे नचिकेताने जो भेद बतलाया है उसकाभी अभिप्राय यही है। मृत्युने उसे अग्निका रहस्य पहलेही बतला दिया था। परंतु इस सुखके मिलनेपरभी जब उसने आत्मज्ञान-प्राप्तिका वर माँगा, तब मृत्युने उसके बदलेमें उसे अनेक सांसारिक सुखोंका लालच दिखलाया। परंतु नचिकेता इन अनित्य, आधिभौतिक सुखोंको कल्याणकारक नहीं समझता था। क्योंकि ये (प्रेय) सुख बाहरी दृष्टिमे अच्छे हैं, पर आत्माके श्रेयके लिये अच्छे नहीं। इसीलिये उसने उन सुखोंकी ओर ध्यान नहीं दिया। किंतु उस आत्मविद्याकी प्राप्तिके लियेही हठ किया; जिसका परिणाम आत्माके लिये श्रेयस्कर या कल्याणकारक है, और उसे अंतमें पाकरही छोड़ा। सारांश यह है, कि आत्मबुद्धि-प्रसादसे उत्पन्न होनेवाले केवल बुद्धिगम्य सुखको - अर्थात् आध्यात्मिक सुखकोही - हमारे शास्त्रकार श्रेष्ठ सुख मानते हैं। और उनका कथन है, कि यह नित्य सुख आत्मवश है, इसलिये सभीको प्राप्त हो सकता है; तथा सब लोगोंको चाहिये, कि वे इसकी प्राप्तिके लिये प्रयत्न करें। पशु-धर्ममे प्राप्त सुखमें, और मानवी सुखमें जो कुछ विशेषता या विलक्षणता है, वह यही है; और यह आत्मानंद केवल बाह्य उपाधियोंपर कभी निर्भर न होनेके कारण सब सुखोंमें नित्य, स्वतंत्र और श्रेष्ठ है। इसीको गीतामें निर्वाण, अर्थात् परम शांति कहा है (गीता ६. १५), और यही स्थितप्रज्ञोंकी

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