श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
DevanagariHindipublished956 पृष्ठ
पृष्ठ 166, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 166
सुखदुःखविवेक ११९ ब्राह्मी अवस्थाकी परमावधिका मुख है (गीता २. ७१; ६. २८; १२. १२; १८. ६२) । अब इस बातका निर्णय हो चुका, कि आत्माकी शांति या सुखही अत्यंत श्रेष्ठ है; और वह आत्मवश होनेके कारण सब लोगोंको प्राप्यभी है। परंतु यह प्रकट है, कि यद्यपि सब धातुओंमें सोना अधिक मूल्यवान् है, तथापि केवल सोनेसेही
- लोहा इत्यादि अन्य धातुओंके बिना - जैसे संसारकाम नहीं चल सकता, अथवा जैसे केवल शक्करसेही - विना नमकके - काम नहीं चल सकता, उसी तरह आत्म- सुख या शांतिकोभी समझना चाहिये। इसमें संदेह नहीं, कि इस शांतिके साथ - शरीर-धारणके लिये सही - कुछ सांसारिक वस्तुओंकी आवश्यकता होती है; और इसी अभिप्रायसे आशीर्वादके संकल्पमें केवल 'शांतिरस्तु' न कह कर " शांतिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु" - अर्थात् शांतिके साथ पुष्टि और तुष्टिभी चाहिये - कहनेकी रीति है। यदि शास्त्रकारोंकी यह समझ होती, कि केवल शांतिसे ही तुष्टि हो सकती है, तो इस संकल्पमें 'पुष्टि' शब्दको व्यर्थ घुसेड़ देनेकी कोई आवश्यकता नहीं थी। इसका यह मतलब नहीं है, कि पुष्टि - अर्थात् ऐहिक सुखोंकी वृद्धिके लिये रात- दिन लालच करते रहो। उक्त संकल्पका भावार्थ यही है, कि तुम्हें शांति, पुष्टि और तुष्टि (संतोष), तीनों उचित परिमाणमें मिलें; और इनकी प्राप्तिके लिये तुम्हें यत्नभी करना चाहिये। कठोपनिषद्काभी यही तात्पर्य है। नचिकेता जब मृत्युके अर्थात् यमके लोकमें गया तब यमने उससे कहा, कि तुम कोईभी तीन वर माँग लो; और उससे माँगेपर दे दिये, इतनीही कथा इस उपनिषदमें विस्तारसे दी गयी है; पर उस समय नचिकेताने एकदम यह वर नहीं माँगा, कि मुझे ब्रह्मज्ञानका उपदेश करो। किंतु उसने कहा, कि "मेरे पिता मुझपर क्रुद्ध हैं, इसलिये प्रथम वर आप मुझे यही दीजिये, कि वे मुझपर प्रसन्न हो जावें।" अनंतर उसने दूसरा वर माँगा कि "अग्निके - अर्थात् ऐहिक समृद्धि प्राप्त करा देनेवाले यज्ञ आदि कर्मोंके - ज्ञानका उपदेश करो।" इन दोनों वरोंको प्राप्त करके अंतमें उसने तीसरा वर यह माँगा, कि "मुझे आत्मविद्याका उपदेश करो।" परंतु जब यमराज कहने लगे, कि इस तीसरे वरके बदलेमें तुझे औरभी अधिक संपत्ति देता हूँ; तब - अर्थात् प्रेय (सुख) की प्राप्तिके लिये आवश्यक यज्ञ आदि कर्मोंका ज्ञान प्राप्त हो जाने- पर उसीकी अधिक आशा न करके - नचिकेताने इस बातका आग्रह किया, कि "अब मुझे श्रेय (आत्यंतिक सुख) की प्राप्ति करा देनेवाले ब्रह्मज्ञानकाही उपदेश करो।" सारांश यह है, कि इस उपनिषद्के अंतिम मंत्रमें जो वर्णन है, उसके अनुसार 'ब्रह्मविद्या' और 'योगविधि' (अर्थात् यज्ञ-याग आदि कर्म), दोनोंको प्राप्त करके नचिकेता मुक्त हो गया है (कठ. ६. १८)। इससे ज्ञान और कर्म इन दोनोंका समुच्चयही इस उपनिषद्का तात्पर्य सिद्ध होता है। इसी विषयपर इंद्रकीभी एक कथा है। कौषीतकी उपनिषद्में कहा गया है, कि इंद्र तो स्वयं ब्रह्मज्ञानी थाही,