भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 167

१२० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और उसने प्रतर्दनकोभी ब्रह्मज्ञानका उपदेश किया था। तथापि जब इंद्रका राज छिन लिया गया और प्रल्हादको त्रैलोक्यका आधिपत्य मिला, तब इंद्रने देवगुरु बृहस्पतिसे पूछा, कि "मुझे बतलाइये कि श्रेय किसमें है ?" तब बृहस्पतिने राज्यभ्रष्ट इंद्रको ब्रह्मविद्या अर्थात् आत्मज्ञानका उपदेश करके कहा, कि "श्रेय इसीमें है" - एतावच्छ्रेय इति - परंतु इससे इंद्रका समाधान नहीं हुआ। उसने फिर प्रश्न किया, "क्या औरभी कुछ अधिक है ?" - को विशेषो भवेत् ? - तब बृहस्पतिने उसे शुक्राचार्यके पास भेजा। वहाँभी वही हाल हुआ; और शुक्राचार्यने कहा, कि "प्रल्हादको वह विशेषता मालूम है।" तब अंतमें इंद्र ब्राह्मणका रूप धारण करके प्रल्हादका शिष्य बनकर सेवा करने लगा। एक दिन प्रल्हादने उससे कहा, कि शील (सत्य तथा धर्मसे चलने का स्वभाव) ही त्रैलोक्यका राज्य पाने का रहस्य है और वही श्रेय है। अनंतर, जब प्रल्हादने कहा, कि "मैं तेरी सेवासे प्रसन्न हूँ, तू चाहे जो वर माँग," तब ब्राह्मण-वेशधारी इंद्रने यही वर माँगा, कि "आप अपना शील मुझे दीजिये।" प्रल्हादके 'तस्थातु' कहतेही उसके 'शील'के साथ धर्म, सत्य, वृत्त, श्री अथवा ऐश्वर्य आदि सब देवता उसके शरीरसे निकल कर इंद्र-शरीरमें प्रविष्ट हो गये। फलतः इंद्र अपना राज्य पा गया। यह प्राचीन कथा भीष्मने युधिष्ठिरसे महाभारतके शांतिपर्व (महा. शां. १२४) में कही है। इस सुंदर कथासे हमें यह बात साफ़ मालूम हो जाती है, कि केवल ऐश्वर्यकी अपेक्षा केवल आत्मज्ञानकी योग्यता भले ही अधिक हो, परंतु जिस इस संसारमें रहना है, उसको अन्य लोगोंके समानही अपने लिये तथा अपने देशके लिये, ऐहिक समृद्धि प्राप्त कर लेनेकी आवश्यकता और नैतिक हक भी है। इसलिये जब यह प्रश्न उठे, कि इस संसारमें मनुष्यका सर्वोत्तम ध्येय या परम उद्देश्य क्या है, तो हमारे कर्मयोगशास्त्रमें अंतिम उत्तर यही मिलता है, कि शांति और पुष्टि, प्रेय और श्रेय अथवा ज्ञान और ऐश्वर्य दोनोंको एक साथ प्राप्त करो। सोचनेकी बात है, कि जिन भगवान्‌से बढ़कर संसारमें और कोई श्रेष्ठ नहीं और जिनके दिखलाये हुए मार्गपर अन्य सभी लोग चलते हैं (गीता ३ : २३); उस भगवान्‌ने क्या ऐश्वर्य और संपत्तिका छोड़ दिया है ? ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः । ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा ॥ अर्थात् "समग्र ऐश्वर्य, धर्म, यश, संपत्ति, ज्ञान और वैराग्य इन छः बातोंको 'भग' कहते हैं"। भग शब्दकी ऐसी व्याख्या पुराणोंमें है (विष्णु. ६. ५. ७४)। कुछ लोग इस श्लोकके 'ऐश्वर्य' शब्दका अर्थ 'योगैश्वर्य' किया करते हैं। क्योंकि 'श्री' अर्थात् संपत्तिसूचक शब्द आगे आया है। परंतु व्यवहारमें ऐश्वर्य शब्दमें सत्ता, यश और संपत्तिका, तथा ज्ञानमें वैराग्य और धर्मका समावेश हुआ करता है। इससे हम बिना किसी बाधाके कह सकते हैं, कि लौकिक दृष्टिसे उक्त श्लोकका