श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसुखदुःखविवेक १२१ सब अर्थ, ज्ञान और ऐश्वर्य इन्हीं दो शब्दोंसे शक्य हो जाता है। और जब कि स्वयं भगवाननेही ज्ञान और ऐश्वर्यको अंगीकार किया है, तब हमेंभी उस बातको प्रमाण समझकर स्वीकार करना चाहिये (गीता. ३. २१; मभा. शां. ३४१. २५) । कर्मयोगमार्गका सिद्धान्त यह कदापि नही, कि कोरा आत्मज्ञानही इस संसारमें परम साध्य वस्तु है। यह तो संन्यासमार्गका सिद्धान्त है; जो कहता है, कि संसार दुःखमय है; इसलिये उसको एकदम छोड़ही देना चाहिये । भिन्न भिन्न मार्गोंके इन सिद्धान्तोंको एकत्र करके गीताके अर्थका अनर्थ करना उचित नहीं है । स्मरण रहे गीताहीका कथन है, कि ज्ञानके बिना केवल ऐश्वर्य, सिवा आसुरी संपत्के और कुछ नहीं है। इसलिये यही सिद्ध होता है, कि ऐश्वर्यके साथ ज्ञान, और ज्ञानके साथ ऐश्वर्य, अथवा शांतिके साथ पुष्टि, हमेशा होनी चाहिये । ऐसा कहनेपर, कि ज्ञानके साथ ऐश्वर्य होना अत्यावश्यक है; कर्म करनेकी आवश्यकता आप-ही-आप उत्पन्न होती है। क्योंकि मनुका कथन है "कर्माण्यारभमाणं हि पुरुषं श्रीर्निषेवते " (मनु. ९. ३०० ) - कर्म करनेवाले पुरुषकोही इस जगतमें श्री अथवा ऐश्वर्य मिलता है. और प्रत्यक्ष अनुभवसेभी यही बात सिद्ध होती है; एवं गीतामें जो उपदेश अर्जुनको दिया गया है, वहभी ऐसाही है ( गीता ३.८) । इसपर कुछ लोगोंका कहना ' , कि मोक्षकी दृष्टिसे कर्मकी आवश्यकता न होनेके कारण अंतमें - अर्थात् ज्ञानोत्तर अवस्था में - सब कर्मोंको छोड़ देनाही चाहिये । परंतु यहाँ तो केवल सुख- दुःखका विचार करना है। और अबतक मोक्ष तथा कर्मके स्वरूपकी परीक्षाभी नहीं की गई है, इसलिए उक्त आक्षेपका उत्तर यहाँ नही दिया जा सकता। आगे चलकर नौवे तथा दसवें प्रकरणमें अध्यात्म और कर्मविपाकका स्पष्ट विवेचन करके ग्यारहवें प्रकरणमें बतला दिया जायगा, कि यह आक्षेपभी बेसिर-पैरका है। सुख और दुःख दो भिन्न तथा स्वतंत्र वेदनाएँ हैं। सुखेच्छा केवल सुखोप- भोगसेही तृप्त नहीं हो सकती । इसलिये संसारमें बहुधा दुःखकाही अधिक अनुभव होता है। परंतु इस दुःखको टालनेके लिये तृष्णा या असंतोष और साथ साथ सब कर्मोंकाभी समूल नाश करना उचित नहीं। उचित यही है, कि केवल फलाशा छोड़- कर सब कर्मोंको करते रहना चाहिये । केवल विषयोपभोग-सुख कभी पूर्ण न होनेवाला, अनित्य और पशुधर्म है। अतएव इस संसारमें बुद्धिमान मनुष्यका सच्चा ध्येय इस अनित्य पशुधर्मसे ऊंचे दर्जेका होना चाहिये । आत्मबुद्धि-प्रसादसे प्राप्त होनेवाला शांति-सुखही वह सच्चा ध्येय है; परंतु आध्यात्मिक सुखही यद्यपि इस प्रकार ऊंचे दर्जेका हो, तथापि उसके साथ इन सासारिक जीवनमे ऐहिक वस्तुओंकीभी उचित आवश्यकता है; और इसलिये सदा निष्काम-बुद्धिसे प्रयत्न अर्थात् कर्म करतेही रहना चाहिये । - इतनी सब बातें जब कर्मयोगशास्त्रके अनुसार सिद्ध हो चुकी, तो अब सुखकी दृष्टिसे विचार करनेपरभी यह बतलानेकी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती, कि आधिभौतिक सुखोंकोही परम साध्य मानकर कर्मोंके केवल सुख-