भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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१२२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र दुःखात्मक बाह्यपरिणामोंके तारतम्यसेही नीतिमत्ताका निर्णय करना अनुचित है । कारण यह है, कि जो वस्तु कभी पूर्णावस्थाको पहुँचही नहीं सकती, उसे परम साध्य मानना मानो 'परम' शब्दका दुरुपयोग करके मृगजलके स्थानमें जलकी खोज करना है । जब हमारा परम साध्यही अनित्य तथा अपूर्ण है, तब उसकी आशामें बैठे रहनेसे हमें अनित्य-वस्तुको छोड़कर और मिलेगाही क्या ? "धर्मो नित्यः सुखदुःखे त्वनित्ये" इस वचनका मर्मभी यही है । "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इस शब्दसमूहके 'सुख' शब्दके अर्थके विषयमें आधिभौतिकवादियोंमेंभी बहुत मतभेद है । उनमेंसे बहुतेरोंका कहना है, कि बहुधा मनुष्य सब विषय-सुखोंको लात मारकर केवल सत्य अथवा धर्मके लिये जान देनेको तैयार हो जाता है । इससे यह मानना अनुचित है, कि मनुष्यकी इच्छा सदैव आधिभौतिक सुख-प्राप्तिकीही रहती है । इसलिये उन पंडितोंने यह सूचना की है, कि सुखके बदलेमें हित अथवा कल्याण शब्दकी योजना करके "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" इस सूत्रका रूपांतर "अधिकांश लोगोंका अधिक हित या कल्याण" कर देना चाहिये, परंतु इतना करनेपरभी इस मतमें यह दोष बनाही रहता है, कि कर्ताकी बुद्धिका कुछभी विचार नहीं किया जाता । अच्छा, यदि यह कहें, कि विषय-सुखोंके साथ मानसिक सुखोंकाभी विचार करना चाहिये; तो उससे आधिभौतिक पक्षकी इस पहलीही प्रतिज्ञाका विरोध हो जाता है, कि किसीभी कर्मकी नीतिमत्ताका निर्णय केवल उसके बाह्य-परिणामोंसेही करना चाहिये; और तब अंशतः अध्यात्म-पक्षका स्वीकार करना पड़ता है, तो उसे अधूरा या अंशतः स्वीकार करनेमे क्या लाभ होगा ? इसीलिये हमारे कर्मयोग-शास्त्रमें यह अंतिम सिद्धान्त निश्चित किया गया है कि, सर्वभूतहित, अधिकांश लोगोंका अधिक सुख और मनुष्यत्वका परम उत्कर्ष इत्यादि नीतिनिर्णयके सब बाह्य साधनोंको अथवा आधिभौतिक मार्गको गौण या अप्रधान समझना चाहिये; और आत्मप्रसाद-रूपी आत्यंतिक सुख तथा उसीके साथ रहने- वाली कर्ताकी शुद्ध-बुद्धिकोही आध्यात्मिक कसौटी जान कर उसीसे कर्म-अकर्मकी परीक्षा करनी चाहिये । उन लोगोंकी बात छोड़ दो, जिन्होंने यह कसम खा ली हो, कि हम दृश्य सृष्टिके परे तत्त्वज्ञानमें प्रवेशही न करेंगे । जिन लोगोंने ऐसी कसम खाई नहीं है, उन्हें युक्तिसे यह मालूम हो जायगा, कि मन और बुद्धिकेभी परे जाकर नित्य आत्माके नित्य कल्याणकोही कर्मयोग-शास्त्रमें प्रधान मानना चाहिये । कई लोग भूलसे समझ बैठते हैं, कि जहाँ एक बार वेदान्तमें घुसे, कि बस, फिर सभी कुछ ब्रह्ममय हो जाता है; और वहाँ व्यवहारकी उपपत्तिका कुछ पताही नही चलता । आजकल जितने वेदान्तविषयक ग्रंथ पढ़े जाते हैं, वे प्रायः संन्यास- मार्गके अनुयायियोंकेही लिखे हुए हैं; और संन्यासमार्गवाले इस तृणारूपी संसारके सब व्यवहारोंको निःसार समझते हैं, इसलिये उनके ग्रंथोंमें कर्मयोगकी ठीक उपपत्ति सचमुच नहीं मिलती । अधिक क्या कहें; इन परसंप्रदाय-असहिष्णु ग्रंथ-