श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकारोंने संन्यासमार्गीय कोटिक्रम या युक्तिवादको कर्मयोगमें संमिलित करके ऐसाभी प्रयत्न किया है, जिससे लोग समझने लगें, कि कर्मयोग और संन्यास दो स्वतंत्र मार्ग नहीं हैं; किंतु संन्यासही अकेला शास्त्रोक्त मोक्षमार्ग है। परंतु यह ठीक नहीं है। संन्यास-मार्गके समान कर्मयोग-मार्गभी वैदिक धर्ममें अनादि कालसे स्वतंत्रता- पूर्वक चला आ रहा है, और इस मार्गके संचालकोंने वेदान्ततत्त्वोंको न छोड़ते हुए कर्मयोग शास्त्रकी ठीक ठीक उपपत्तिभी दिखलाई है। भगवद्गीता ग्रंथ इसी पंथका है। यदि गीताको छोड़ दें, तोभी जान पड़ेगा, कि अध्यात्म-दृष्टिसे कार्य अकार्य- शास्त्रका विवेचन करनेकी पद्धति ग्रीन सरीखे ग्रंथकार द्वारा इंग्लैंडमेंही शुरू कर दी गई है * और जर्मनीमें तो उससेभी पहले यह पद्धति प्रचलित थी। दृश्य सृष्टिका कितनाही विचार करें; परंतु जब तक यह बात ठीक मालूम नहीं हो जाती, कि इस सृष्टिको देखनेवाला और कर्म करनेवाला कौन है, तबतक तात्त्विक दृष्टिसे इस विषयकाभी विचार पूरा नहीं हो सकता, कि इस संसारमें मनुष्यका परम साध्य, श्रेष्ठ कर्तव्य या अंतिम ध्येय क्या है। इसीलिये याज्ञवल्क्यका यह उपदेश कि “ आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः । ” प्रस्तुत विषयमेंभी अक्षरशः उपयुक्त होता है। दृश्य जगतकी परीक्षा करनेसे यदि परोपकार सरीखे तत्त्वही अंतमें निष्पन्न होते हैं, तो उससे आत्मविद्याका महत्त्व कम तो होता नहीं उलटे उससे सब प्राणियोंमें एकही आत्माके होनेका एक और सबूत मिल जाता है। इस बातका तो कुछ उपायही नहीं है, कि आधिभौतिकवादी अपनीही बनाई हुई मर्यादासे स्वयं बाहर नहीं जा सकते। परंतु हमारे शास्त्रकारोंकी दृष्टि इस संकुचित मर्यादाके परे पहुँच गई है; और इसलिये उन्होंने आध्यात्मिक दृष्टिसेही कर्मयोगशास्त्रकी पूरी उपपत्ति दी है। इस उपपत्तिकी चर्चा करनेके पहले कर्म- अकर्म-परीक्षाके एक और पूर्वपक्षकाभी कुछ विचार कर लेना आवश्यक है। इसलिये अब उस पंथका विवेचन किया जायगा।
- Prolegomena to Ethics, Book I; and Kant's Metaphysics of Morals (Trans. by Abbot in Kant's Theory of Ethics.)