भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 171, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 171

छठा प्रकरण आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् । * कर्म-अकर्मकी परीक्षा करनेका - आधिभौतिक मार्गके अतिरिक्त - दूसरा पंथ आधिदैवतवादियोंका है। इस पंथके लोगोंका यह कथन है, कि जब कोई मनुष्य कर्म-अकर्मका या कार्य-अकार्यका निर्णय करता है, तब वह इस झगड़ेमें नहीं पड़ता, कि किसका किस कर्मसे कितना सुख अथवा दुःख होगा; अथवा उनमेंसे सुखका जोड़ अधिक होगा या दुःखका। वह आत्म-अनात्म-विचारकी झंझटमेंभी नहीं पड़ता; और ये झगड़े बहुतेरोंकी तो समझमें नहीं आते। यहभी नहीं कहा जा सकता, कि प्रत्येक प्राणी प्रत्येक कर्मको केवल अपने सुखके लियेही करता है। आधिभौतिकवादी कुछभी उपपत्ति कहें; परंतु यदि इस बातका थोड़ासा विचार किया जाय, कि धर्म-अधर्मका निर्णय करते समय मनुष्यके मनकी स्थिति कैसी होती है, तो यह ध्यानमें आ जायगा, कि मनकी स्वाभाविक और उदात्त मनोवृत्तियां - करुणा, दया, परोपकार आदि - ही किसी कामको करनेके लिये मनुष्यको एकाएक प्रवृत्त किया करती हैं। उदाहरणार्थ, जब कोई भिखारी दीख पड़ता है; तब मनमें यह विचार आनेके पहलेही - कि उसे "दान करनेसे जगत्का अथवा अपने आत्माका कितना हित होगा" - मनुष्यके हृदयमें करुणावृत्ति जागृत हो जाती है; और वह अपनी शक्तिके अनुसार उस याचकको कुछ दान कर देता है। इसी प्रकार जब बालक रोता है, तब माता उसे दूध पिलाते समय इस बातका कुछभी विचार नहीं करती, कि बालकको पिलानेमें कितने लोगोंका इस बातका कितना हित होगा। अर्थात् ये उदात्त मनोवृत्तियांही कर्मयोगशास्त्रकी यथार्थ नींव हैं। हमें किसीने ये मनोवृत्तियां दी नहीं हैं; किंतु ये निसर्गसिद्ध अर्थात् स्वाभाविक अथवा स्वयंभू देवताही हैं। जब न्यायाधीश न्यायासनपर बैठता है, तब उसकी बुद्धिमें न्यायदेवताकी प्रेरणा हुआ करती है; और वह उसी प्रेरणाके अनुसार न्याय किया करता है। परंतु जब कोई न्यायाधीश इस प्रेरणाका अनादर करता है, तभी उससे अन्याय हुआ करते हैं। न्यायदेवताके सदृशही करुणा, दया, परोपकार, कृतज्ञता, कर्तव्यप्रेम, धैर्य आदि सद्गुणोंकी जो स्वाभाविक मनोवृत्तियां हैं, वेभी देवता हैं। प्रत्येक मनुष्य स्वभावतः इन देवताओंके शुद्ध स्वरूपोंसे परिचित

  • "वही बोलना चाहिये जो सत्यपूत अर्थात् सत्यसे शुद्ध किया गया है; और वही आचरण करना चाहिये जो मनको शुद्ध मालूम हो।"