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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 172

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १२५ रहता है। परंतु यदि लोभ, द्वेष, मत्सर आदि कारणोंसे वह इन देवताओंकी परवाह न करे, तो उसे देवता क्या करें ? यह बात सच है, कि कई बार इन देवताओंमेंभी विरोध उत्पन्न हो जाता है, और तब कोई कार्य करते समय हमें संदेह हो जाता है कि किस देवताकी स्फूर्ति बलवती मानें ? तब इस संदेहका निर्णय करनेके लिये न्याय, करुणा आदि देवताओंके अतिरिक्त किसी दूसरेकी सलाह लेन। आवश्यक जान पड़ता है। परंतु ऐसे अवसरपर अध्यात्मविचार अथवा सुख-दुःखकी न्यूना- धिकताके झगड़ेमें न पड़कर यदि हम अपने मनोदेवताकी गवाही लें, तो वह एकदम इस बातका निर्णय कर देता है, कि इन दोनोंमेंसे कौन-सा मार्ग श्रेयस्कर है। यही कारण है, कि उक्त सब देवताओंमें मनोदेवता श्रेष्ठ है ! 'मनोदेवता' शब्दमें इच्छा, क्रोध, लोभ आदि सभी मनोविकारोंको शामिल नहीं करना चाहिये। किन्तु इस शब्दसे मनकी वह ईश्वरदत्त और स्वाभाविक शक्तिही अभीष्ट है, कि जिसकी सहायतासे केवल भले-बुरेका निर्णय किया जाता है। इसी शक्तिका एक बड़ा भारी नाम 'सदसद्विवेक-बुद्धि' * है और यदि किसी संदेहग्रस्त अवसरपर मनुष्य स्वस्थ अंतःकरणसे और शांतिके साथ विचार करे, तो यह सदसद्विवेक-बुद्धि कभी उसको धोखा नहीं देगी। इतनाही नहीं तो ऐसे अवसरोंपर हम दूसरोंसे यही कहा करते हैं, "कि तू अपने मनसे पूछ।" इस बड़े देवताके पास एक सूची हमेशा मौजूद रहती है। उसमें यह लिखा होता है, कि किस सद्गुणको किस समय कितना महत्त्व दिया जाना चाहिये। यह मनोदेवता समय समयपर इसी सूचीके अनुसार अपना निर्णय झट प्रकट किया करता है। मान लीजिये, किसी समय आत्मरक्षा और अहिंसामें विरोध उत्पन्न हुआ; और यह शंका उपस्थित हुई, कि दुर्भिक्षके समय अभक्ष्य भक्षण करना चाहिये या नहीं ? तब इस संशयको दूर करनेके लिये यदि हम शांत चित्तसे इस मनोदेवताकी मिन्नत करें, तो झट उसका यही निर्णय प्रकट होगा, कि "अभक्ष्य भक्षण करो।" इसी प्रकार यदि कभी स्वार्थ और परार्थ अथवा परोपकारके बीच विरोध उत्पन्न हो जाय, तो उसका निर्णयभी इस मनोदेवताको मनाकर करना चाहिये। मनोदेवताके घरकी - धर्म-अधर्मके न्यूनाधिक भावकी - यह सूची एक ग्रंथकारको शांतिपूर्वक विचार करनेसे उपलब्ध हुई है, जिसे उसने अपने ग्रंथमें प्रकाशित किया है।† इस सूचीमें नम्रतायुक्त पूज्यभावको पहला अर्थात् अत्युच्च स्थान दिया गया है; और उसके बाद करुणा, कृतज्ञता, उदारता,

  • इस सदसद्विवेक-बुद्धिको अंग्रेजी में Conscience कहते हैं और आधि- दैवतपक्ष Intuitionist School कहलाता है। † इस ग्रंथकारका नाम James Martineau (जेम्स मार्टिनो) हैं। इसने यह सूची अपने Types of Ethical Theory (Vol. II, p. 266. 3rd Ed). नामक ग्रंथमें दी है। मार्टिनो अपने पंथको Idio-psychological कहता है। परंतु हम उसे आधिदैवत पक्षहीमें शामिल करते हैं।