भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 173, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 173

१२६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वात्सल्य आदि भावोंको क्रमशः नीचेकी श्रेणियोंमें शामिल किया है। इस ग्रंथकारका मत है, कि जब ऊपर और नीचेकी श्रेणियोंके सद्गुणोंमें विरोध उत्पन्न हो, तब ऊपरकी श्रेणीके देवताकोही अधिक मान देना चाहिये । उसके मतके अनुसार कार्य-अकार्यका अथवा धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये इसकी अपेक्षा और कोई उचित मार्ग नहीं है। इसका कारण यह है, कि यद्यपि हम अत्यंत दूरदृष्टिसे यह निश्चित कर लें, कि “अधिकांश लोगोंका अधिक सुख” किसमें है, तथापि सारासार बुद्धिमें यह कहनेकी सत्ता या अधिकार नहीं है, कि “जिसमें अधिकांश लोगोंका हित हो वही तू कर ।” इसलिये अंतमें इस प्रश्नका निर्णयही नहीं होता, कि “जिसमें अधिकांश लोगोंका हित है, वह बात मैं क्यों करूँ ?” और सारा झगड़ा ज्यों-का त्यों बना रहता है। राजासे बिना अधिकार प्राप्त किये ही जब कोई न्याया- धीश न्याय करता है, तब उसके निर्णयकी जो दशा होती है, ठीक वही दशा उस कार्य-अकार्यके निर्णयकीभी होती है, जो दूरदृष्टिपूर्वक सुखदुःखोंका विचार करके किया जाता है। केवल दूरदृष्टि यह बात किसीसे नहीं कह सकती, कि “तू यह कर, तुझे यह करनाही चाहिये ।” इसका कारण यही है, कि दूरदृष्टिभी हो तोभी वह मनुष्यकृतही है; और इसी कारणसे वह अपना प्रभाव मनुष्योंपर नहीं जमा सकती । ऐसे समयपर आज्ञा करनेवाला हमसे श्रेष्ठ कोई अधिकारी अवश्य होना चाहिये । और यह काम ईश्वरदत्त सदसद्विवेकदेवताही कर सकता है। क्योंकि वह मनुष्यकी अपेक्षा श्रेष्ठ है अतएव मनुष्यपर अपना अधिकार जमानेमें समर्थ है। यह सद- सद्विवेकबुद्धि या ‘देवता’ स्वयंभू है। इसी कारण व्यवहारमें यह कहनेकी रीत है, कि मेरा ‘मनोदेवता’ अमुक प्रकारकी गवाही नहीं देता। जब कोई मनुष्य एक- आध बुरा काम कर बैठता है, तब पश्चात्तापसे वह स्वयं लज्जित हो जाता है: या उसका मन उसे हमेशा टोकता रहता है। यहभी उपर्युक्त देवताके शासनकाही फल है। इस बातसे उक्त स्वतंत्र मनोदेवताका अस्तित्व सिद्ध हो जाता है। कारण कि आधिदैवत पंथके मतानुसार यदि उपर्युक्त सिद्धान्त न माना जाय, तो इस प्रश्नकी उपपत्ति नहीं हो सकती, कि हमारा मन हमें क्यों टोका करता है। ऊपर दिया हुआ वृत्तान्त पश्चिमी आधिदैवत पंथके मतका है। पश्चिमी देशोंमें इस पंथका प्रचार विशेषतः ईसाई धर्मोपदेशकोंने किया है। उनके मतके अनुसार धर्म-अधर्मका निर्णय करनेके लिये केवल आधिभौतिक साधनोंकी अपेक्षा यह ईश्वरदत्त साधन सुलभ, श्रेष्ठ एवं ग्राह्य है। यद्यपि हमारे देशमें प्राचीन कालमें कर्मयोगशास्त्रका ऐसा कोई स्वतंत्र पंथ नहीं था, तथापि उपर्युक्त मत हमारे प्राचीन ग्रंथोंमें कई जगह पाया जाता है। महाभारतमें अनेक स्थानोंपर मनकी भिन्न भिन्न वृत्तियोंको देवताओंका स्वरूप दिया गया है। पिछले प्रकरणमें यह बतलायाभी गया है, कि धर्म, सत्य, वृत्त, शील, श्री आदि देवताओंने प्रल्हादके शरीरको छोड़ कर इंद्रके शरीरमें कैसे प्रवेश किया। कार्य-अकार्यका अथवा