श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १२७ धर्म-अधर्मका निर्णय करनेवाले देवताका नामभी 'धर्म'ही है। ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, कि शिबि राजाके सत्त्वकी परीक्षा करनेके लिये श्येनका रूप धर कर, और युधिष्ठिरकी परीक्षा लेनेके लिये यक्षरूपसे तथा दूसरी बार कुत्ता बन कर 'धर्म'देवता प्रकट हुए थे। स्वयं भगवद्गीता (गीता १०. ३४) मेंभी कीर्ति, धी, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा ये सब देवता माने गये हैं। इनमेंसे स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा मनके धर्म हैं। मनभी एक देवता है; और परब्रह्मका प्रतीक मान कर उपनिषदोंमें उसकी उपासनाभी बतलाई गई है (तै. ३. ४; छां. ३. १८) । जब मनुजी कहते हैं, कि " मनःपूतं समाचरेत् " (६. ४६) - मनको जो पवित्र मालूम हो, वही करना चाहिये - तब यही बोध होता है, कि उन्हें 'मन' शब्दसे मनोदेवताही अभिप्रेत है। साधारण व्यवहारमें हम यही कहा करते हैं, कि जो मनोदेवताको अच्छा मालूम हो, वही करना चाहिये । मनुजीने मनुसंहिताके चौथे अध्याय (४. १६१) में यह बात विशेष स्पष्ट कर दी है कि :- यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात् परितोषोऽन्तरात्मनः । यत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत् ॥ "वह कर्म प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये, जिसके करनेसे हमारा अंतरात्मा संतुष्ट हो और जो कर्म इसके विपरीत हो, उसे छोड़ देना चाहिये।" इसी प्रकार चातुर्वर्ण्य- धर्म आदि व्यावहारिक नीतिके मूलतत्त्वोंका उल्लेख करते समय मनु, याज्ञवल्क्य आदि स्मृति-ग्रंथकारभी यही कहते हैं :- वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम् ॥ "वेद, स्मृति, शिष्टाचार और अपने आत्माको प्रिय मालूम होना धर्मके ये चार मूलतत्त्व हैं" (मनु. २. १२) । "अपने आत्माको जो प्रिय मालूम हो " - इसका अर्थ यही है कि मनको जो शुद्ध मालूम हो। इससे स्पष्ट होता है, कि श्रुति, स्मृति और सदाचारसे यदि किसी कार्यकी धर्मता या अधर्मताका निर्णय नहीं हो सकता था, तब निर्णय करनेका चौथा साधन 'मनःपूतता' समझी जाती थी। पिछले प्रकरणमें कही गई प्रल्हाद और इंद्रकी कथा बतला चुकनेपर 'शील'के लक्षणके विषयमें, धृतराष्ट्रने महाभारतमें यह कहा है :- यदन्येषां हितं न स्यात् आत्मनः कर्म पौरुषम् । अपत्रपेत वायेन न तत्कुर्यात् कथंचन ॥ अर्थात् " हमारे जिस कर्मसे लोगोंका हित नहीं हो सकता अथवा जिसके करनेसे स्वयं अपनेहीको लज्जा मालूम होती है, वह कभी नहीं करना चाहिये (मभा. शां. १२४. ६६) । इससे पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जायगी, कि " लोगोंका हित हो नहीं सकता"; "और लज्जा मालूम होती है" इन दो पदोंसे "अधिकांश