श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र लोगोंका अधिक हित" और 'मनोदेवता' इन दोनों पक्षोंका इस श्लोकमें एक साथ उल्लेख किया गया है। मनुस्मृति (मनु. १२. ३५, ३७) में भी कहा गया है, कि जिस कर्म करनेसे या उसे करते हुए लज्जा मालूम होती है वह तामस है और जो कर्म करनेमें लज्जा मालूम नहीं होती-एवं अंतरात्मा संतुष्ट होता है-वह सात्त्विक है। धम्मपद नामक बौद्ध-ग्रंथ (धम्मपद ६७ और ६८) में भी इसी प्रकारके विचार पाये जाते हैं। कालिदास भी यही कहते हैं, कि जब कर्म-अकर्मका निर्णय करनेमें कुछ संदेह हो, तब- सतां हि सन्देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्तःकरणप्रवृत्तयः । "सत्पुरुष लोग अपने अंतःकरणहीकी गवाहीको प्रमाण मानते हैं" (शाकुंतल १. २२)। पातंजल योग इसी बातकी शिक्षा देता है, कि चित्तवृत्तियोंका निरोध करके मनको किसी एकही विषयपर कैसे स्थिर करना चाहिये; और यह योगशास्त्र हमारे यहाँ बहुत प्राचीन समयसे प्रचलित है। अतएव जब कभी धर्म-अधर्मके विषयमें कुछ संदेह उत्पन्न हो, तब हम लोगोंको किसीके यह सिखानेकी आवश्यकता नहीं थी कि "अंतःकरणको स्वस्थ और शांत करनेपर जो उचित मालूम हो, वही करना चाहिये।" सब स्मृति-ग्रंथोंके आरंभमें, इस प्रकारके वर्णन मिलते हैं, कि स्मृतिकार ऋषि अपने मनको एकाग्र करके ही धर्म-अधर्म बतलाया करते थे। (मनु. १. १)। योंही देखनेसे तो "किसी काममें मनकी गवाही लेना' यह मार्ग अत्यंत सुलभ प्रतीत होता है, परंतु जब हम तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे इस बातका सूक्ष्म विचार करने लगते हैं, कि 'शुद्ध मन' किसे कहना चाहिये; तब यह सरल पक्ष अंततक काम नहीं दे सकता। और यही कारण है, कि हमारे शास्त्रकारोंने कर्मयोगशास्त्रकी इमारत इस कच्ची नींवपर खड़ी नहीं की है। अब इस बातका विचार करना चाहिये, कि यह तत्त्वज्ञान कौन-सा है। परंतु उसका विवेचन करनेके पहले यहाँपर इस बातका उल्लेख करना आवश्यक है, कि पश्चिमी आधिभौतिकवादियोंने इस आधिदैवत पक्षका किस प्रकार खंडन किया है। कारण यह है, कि यद्यपि इस विषयमें आध्यात्मिक और आधिभौतिक पंथोंके कारण भिन्न भिन्न हैं; तथापि उन दोनोंका अंतिम निर्णय एकही-सा है। अतएव, पहले आधिभौतिक कारणोंका उल्लेखकर देनेसे आध्यात्मिक कारणोंकी महत्ता और सयुक्तता पाठकोंके ध्यानमें शीघ्र आ जायगी। ऊपर कह आये हैं, कि आधिदैविक पंथमें शुद्ध मनोदेवताकोही अग्रस्थान दिया गया है इससे यह प्रकट होता है, कि "अधिकांश लोगोंका अधिक सुख" वाले आधिभौतिक नीतिग्रंथमें कर्ताकी बुद्धि या हेतुके कुछ भी विचार न किये जानेका जो दोष पहले बतलाया गया है, वह इस आधिदैवत पक्षमें नहीं है। परंतु जब हम इस बातका सूक्ष्म विचार करने लगते हैं, कि सदसद्विवेकविषयी शुद्ध मनोदेवता किसे कहना चाहिये; तब इस पंथमेंभी दूसरे अनेक अपरिहार्य बाधाएँ उपस्थित हो जाती