भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १२९ हैं। कोईभी बात लीजिये; कहनेकी आवश्यकता नहीं है, कि उसके बारेमें भली- भाँति विचार करना - वह ग्राह्य है अथवा अग्राह्य है, करनेके योग्य है या नहीं, उससे लाभ अथवा सुख होगा या नहीं; इत्यादि बातोंका निर्णय करना - नाक अथवा आँख जैसी इंद्रियोंका काम नहीं है। किंतु वह काम उस स्वतंत्र इंद्रियका है, जिसे मन कहते हैं। अर्थात्, कार्य-अकार्य अथवा धर्म-अधर्मका निर्णय मनही करता है। चाहे आप उसे इंद्रिय कहें या देवता। यदि आधिदैविक पंथ का सिर्फ यही कहना हो, तो कोई आपत्ति नहीं। परंतु पश्चिमी आधिदैवत पक्ष इससे एक पग औरभी आगे बढ़ा हुआ है। उसका यह कथन है, - भला अथवा बुरा (सत् अथवा असत्) न्याय्य अथवा अन्याय्य, धर्म अथवा अधर्मका निर्णय करना एक बात है; और इस बातका निर्णय करना दूसरी बात है, कि अमुक पदार्थ भारी है या हलका है, गोरा है या काला, अथवा गणितका कोई उदाहरण सही है या गलत - ये दोनों बातें अत्यंत भिन्न हैं। इनमेंसे दूसरे प्रकारकी बातोंका निर्णय न्यायशास्त्रका आधार लेकर मन कर सकता है; परंतु पहले प्रकारकी बातोंका निर्णय करनेके लिये केवल मन असमर्थ है। अतएव यह काम सदसद्विवेचन-शक्तिरूप देवताही किया करता है, जो कि हमारे मनमें रहता है। इसका कारण वे यह बतलाते हैं, कि जब हम किसी गणितके उदाहरणकी जाँच करके निश्चय करते हैं, कि वह सही है या गलत, तब हम पहले उसके गुणा, जोड़ आदिकी जाँच कर लेते हैं, और फिर अपना निश्चय स्थिर करते हैं। अर्थात् इस निश्चयके स्थिर होनेके पहले मनको अन्य क्रिया या व्यापार करने पड़ते हैं; परंतु भले-बुरेका निर्णय इस प्रकार नहीं किया जाता। जब हम यह सुनते हैं, कि किसी एक आदमीने किसी दूसरेको जानसे मार डाला, तब हमारे मुँहसे एकाएक ये उद्गार निकल पड़ते हैं; “राम राम! उसने बहुत बुरा काम किया!” और इस विषयमें हमें कुछभी विचार नहीं करना पड़ता। अतएव, यह नहीं कहा जा सकता, कि कुछभी विचार न करके आप-ही-आप जो निर्णय हो जाता है, और जो निर्णय विचार-पूर्वक किया जाता है, वे दोनों एकही मनोवृत्तिके व्यापार हैं। इसलिये यह मानना चाहिये, कि सदसद्विवेचन-शक्तिभी एक स्वतंत्र मानसिक देवता है। सब मनुष्योंके अंतःकरणमें यह देवता या शक्ति एकही-सी जागृत रहती है। इसलिये हत्या करना सभी लोगोंको दोष प्रतीत होता है; उसके विषयमें किसीको कुछ सिखलानाभी नहीं पड़ता। इस आधिदैविक युक्तिवादका आधिभौतिक पंथके लोगोंका यह उत्तर है, कि सिर्फ “हम एक-आध बातका निर्णय एकदम कर सकते हैं;” इतनेहीसे यह नहीं माना जा सकता, कि जिस बातका निर्णय विचार- पूर्वक किया जाता है वह उससे भिन्न है। किसी कामको जल्द अथवा धीरे करना अभ्यासपर अवलंबित है। उदाहरणार्थ, गणितका विषय लीजिये। व्यापारी लोग मनके भावसे सेर-छटाँकके दाम एकदम मुखाग्र गणितकी रीतिसे बतलाया करते हैं। इस कारण यह नहीं कहा जा सकता, कि गुणाकार करनेकी उनकी शक्ति गी. र. ९