भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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१३० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र

या देवता किसी अच्छे गणितज्ञसे भिन्न है। कोई काम अभ्यासके कारण इतना अच्छी तरह सध जाता है, कि बिना विचार कियेही कोई मनुष्य उसको शीघ्र और सरलतापूर्वक कर लेता है। उत्तम लक्ष्यभेदी मनुष्य उड़ते हुए पक्षियोंको बंदूकसे सहज मार गिराता हैं, इससे कोईभी यह नहीं कहता, कि लक्ष्यभेद एक स्वतंत्र देवता है। इतनाही नहीं; किंतु निशाना मारना, उड़ते हुए पक्षियोंकी गतिको जानना, इत्यादि शास्त्रीय बातोंको कोईभी निरर्थक और त्याज्य नहीं कह सकता । नेपोलियनके विषयमें यह प्रसिद्ध है, कि जब वह समरांगणमें खड़ा होकर चारों ओर सूक्ष्म दृष्टिसे देखता था, तब उसके ध्यानमें यह बात एकदम आ जाया करती थी, कि शत्रु किस स्थानपर कमजोर है। इतनेहीसे किसीने यह सिद्धान्त नहीं निकाला है, कि युद्धकला एक स्वतंत्र देवता है, और उसका अन्य मानसिक शक्तियोंसे कुछभी संबंध नहीं है। इसमें संदेह नहीं; कि किसी एक काममें किसीकी बुद्धि स्वभावतः काम देती है; और किसीकी कम परंतु सिर्फ इस असमानताके आधारपरही हम यह नहीं कहते, कि दोनोंकी बुद्धियां वस्तुतः भिन्न हैं। इसके अतिरिक्त यह बातभी सत्य नहीं, कि कार्य-अकार्यका अथवा धर्म-अधर्मका निर्णय सदैव एकाएक हो जाता है। यदि ऐसाही होता, तो यह प्रश्नभी कभी उपस्थित न होता कि "अमुक काम करना चाहिये अथवा नहीं करना चाहिये।" यह बात प्रकट है, कि इस प्रकारका प्रश्न प्रसंगानुसार अर्जुनकी तरह सभी लोगोंके सामने उपस्थित हुआ करता है; और कार्य-अकार्य-निर्णयके कुछ विषयोंमें, भिन्न भिन्न लोगोंके अभिप्रायभी भिन्न भिन्न हुआ करते हैं। यदि सदसद्विवेचनरूप स्वयंभू देवता एकही है, तो फिर यह भिन्नता क्यों है ? इससे यही कहना पड़ता है, कि मनुष्यकी बुद्धि जितनी सुशिक्षित अथवा सुसंस्कृत होगी, उतनीही योग्यतापूर्वक वह किसी बातका निर्णय करेगा। बहुतेरे जंगली लोग ऐसेभी हैं, कि जो मनुष्यका वध करना अपराध तो मानते नहीं; किंतु मारे हुए मनुष्यका मांसभी वे सहर्ष खा जाते हैं! जंगली लोगोंकी बात जाने दीजिये। सभ्य देशोंमेंभी यह देखा जाता है, कि देशके अनुसार किसी एक देशमें जो बात गर्ह्य समझी जाती है, वही किसी दूसरे देशाचरमें सर्वमान्य समझी जाती है। उदाहरणार्थ, एक स्त्रीके रहने हुए दूसरी स्त्रीके साथ विवाह करना इंग्लैंडमें अपराध माना जाता है; परंतु हिंदुस्थानमें यह बात विशेष दूषणीय नहीं मानी जाती। भरी सभामें सिरकी पगड़ी उतारना हिंदू लोगोंके लिये लज्जा या अमर्यादाकी बात है; परंतु अंग्रेज लोग सिरकी टोपी उतारनाही सभ्यताका लक्षण मानते है। यदि - यह बात सच है, कि ईश्वरदत्त या स्वाभाविक सदसद्विवेचन-शक्तिके कारणही बुरे कर्म करनेमें लज्जा मालूम होती है तो क्या सब लोगोंको एक ही कृत्य करनेमें एकही समान लज्जा नहीं मालूम होनी चाहिये ? बड़े बड़े लुटेरे और डाकू लोगभी एक बार जिसका नमक खा लेते हैं, उसपर हथियार उठाना निंद्य मानते हैं, किंतु बड़े बड़े सभ्य पश्चिमी राष्ट्र अपने पड़ोसी राष्ट्रके लोगोंका वध करना स्वदेश-