श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३१ भक्तिका लक्षण समझते हैं। यदि सदसद्विवेचन-शक्तिरूप देवता एकही है, तो यह भेद क्यों है ? और यदि यह कहा जाय, कि शिक्षाके अनुसार अथवा देशके चलनके अनुसार सदसद्विवेचन-शक्तिमेंभी भेद हो जाया करते हैं, तो उसकी स्वयंभू नित्यतामें बाधा आती है। मनुष्य ज्यों ज्यों अपनी असभ्य दशाको छोड़कर सभ्य बनता जाता है, त्यों त्यों उसके मन और बुद्धिका विकास होता जाता है; और इस तरह बुद्धिका विकास होनेपर जिन बातोंका विचार वह अपनी पहली असभ्य अवस्था में नहीं कर सकता था, उन्हीं बातोंका विचार अब वह अपनी सभ्य दशामें शीघ्रतासे करने लग जाता है। अथवा यह कहना चाहिये, कि इस तरह बुद्धिका विकसित होनाही सभ्यताका लक्षण है। यह सभ्य अथवा सुशिक्षित मनुष्यके इंद्रियनिग्रहका परिणाम है, कि वह औरोंकी वस्तुको ले लेने या मांगनेकी इच्छा नहीं करता। इसी प्रकार मनकी वह शक्तिभी - जिससे बुरे-भलेका निर्णय किया जाता है - धीरे धीरे बढ़ती जाती है। और अब तो कुछ बातोंमें वह इतनी परिपक्व हुईही है, कि किसी विषयमें कुछ विचार किये बिनाही हम लोग अपना नैतिक निर्णय प्रकट कर दिया करते हैं। जब हमें आँखोंमें कोई दूर या पासकी वस्तु देखनी होती है, तब आँखोंकी नसोंको उचित परिमाणसे खींचना पड़ता है; और यह क्रिया इतनी शीघ्रतासे होती है, कि हमें उसका कुछ बोधभी नहीं होता। परंतु क्या इतनेहीसे किसीने इस बातकी उपपत्तिको निरुपयोगी मान रखा है ? सारांश यह है, कि मनुष्यकी बुद्धि या मन सब समय और सब कामोंमें एकही है। यह बात यथार्थ नहीं, कि काले-गोरेका निर्णय एक प्रकारकी बुद्धि करती है और बुरे-भलेका निर्णय किसी अन्य प्रकारकी बुद्धिमें किया जाता है। अंतर केवल इतनाही है, कि किसीमें बुद्धि कम रहती है और किसीकी अशिक्षित अथवा अपरिपक्व रहती है। उक्त भेदकी ओर, तथा इस अनुभवकी ओर उचित ध्यान दे कर, कि किसी कामको शीघ्रतापूर्वक कर सकना केवल आदत या अभ्यासका फल है, पश्चिमी आधिभौतिकवादियोंने यह निश्चय किया है, कि मनकी स्वाभाविक शक्तियोंमें परे सदसद्विचार-शक्ति नामक कोई भिन्न, स्वतंत्र और विलक्षण शक्तिके माननेकी आवश्यकता नहीं है। इस विषयमें हमारे प्राचीन शास्त्रकारोंका अंतिम निर्णयभी पश्चिमी आधि- भौतिकवादियोंके सदृशही है। वे इस बातको मानते हैं, कि स्वस्थ और शांत अंतः- करणसे किसीभी बातका विचार करना चाहिये। परंतु उन्हें यह बात मान्य नहीं, कि धर्म-अधर्मका निर्णय करनेवाली बुद्धि अलग है और काला-गोरा पहचाननेकी बुद्धि अलग है। उन्होंने यहभी प्रतिपादन किया है, कि मन जितना सुशिक्षित होगा, उतनाही वह भला या बुरा निर्णय कर सकेगा। अतएव मनको सुशिक्षित करनेका प्रयत्न प्रत्येकको दृढ़तासे करना चाहिये। परंतु वे इस बातको नहीं मानते, कि सदसद्विवेचन-शक्ति सामान्य बुद्धिसे कोई भिन्न वस्तु या ईश्वरीय प्रसाद है। प्राचीन समयमें इस बातका परीक्षण सूक्ष्म रीतिसे किया गया है, कि मनुष्यको ज्ञान