भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 179

१३२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र किस प्रकार प्राप्त होता है; और उसके मनका और बुद्धिका व्यापार किस तरह हुआ करता है। इसी परीक्षणको 'क्षेत्रक्षेत्रज्ञ-विचार' कहते हैं। क्षेत्रका अर्थ 'शरीर' और क्षेत्रज्ञका अर्थ 'आत्मा' है। यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विचार अध्यात्मविद्याकी जड़ है। इस क्षेत्रज्ञ-विद्याका ठीक ठीक ज्ञान हो जानेपर, सदसद्विवेक-शक्तिहीका कौन कहे, किसीभी मनोदेवताका अस्तित्व आत्मासे श्रेष्ठ या स्वतंत्र नहीं माना जा सकता। ऐसी अवस्थामें आधिदैवत पक्ष आप-ही-आप कमजोर हो जाता है। अतएव, अब यहाँ इस क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विद्याहीका विचार संक्षेपमें किया जायगा। इस विवेचनसे भगवद्गीताके बहुतेरे सिद्धान्तोंका सत्यार्थभी पाठकोंके ध्यानमें अच्छी तरह आ जायगा। यह कहा जा सकता है, कि मनुष्यका शरीर ( पिंड, क्षेत्र या देह ) एक बहुत बड़ा कारखानाही है। जैसे किसी कारखानेमें पहले बाहरका माल भीतर लिया जाता है; फिर उस मालका चुनाव या व्यवस्था करके इस बातका निश्चय किया जाता है, कि कारखानेके लिये उपयोगी और निरुपयोगी पदार्थ कौन-से हैं; और तब बाहरसे लाये गये कच्चे मालसे नई चीजें बनाते और उन्हें बाहर भेजते हैं। वैसेही मनुष्यकी देहमेंभी प्रतिक्षण अनेक व्यापार हुआ करते हैं। इस सृष्टिके पांचभौतिक पदार्थोंका ज्ञान प्राप्त करनेके लिये मनुष्यकी इंद्रियाँही प्रथम साधन हैं। इन इंद्रियोंके द्वारा सृष्टिके पदार्थोंका यथार्थ अथवा मूल स्वरूप नहीं जाना जा सकता। आधिभौतिकवादियोंका यह मत है, कि पदार्थोंका यथार्थ स्वरूप वैसाही है, जैसा कि वह हमारी इंद्रियोंको प्रतीत होता है। परंतु यदि कल किसीको कोई नूतन इंद्रिय प्राप्त हो जाय, तो उसकी दृष्टिसे सृष्टिके पदार्थोंके गुण-धर्म जैसे आज हैं, वैसेही नहीं रहेंगे। मनुष्यकी इंद्रियोंकेभी दो भेद हैं, - एक कर्मेंद्रियाँ और दूसरी ज्ञानेंद्रियाँ। हाथ, पैर, वाणी, गुद और उपस्थ ये पाँच कर्मेंद्रियाँ हैं। हम जो कुछ व्यवहार अपने शरीरसे करते हैं, वह सब इन्हीं कर्मेंद्रियोंके द्वारा होता है। नाक, आँखें, कान, जीभ और त्वचा ये पाँच ज्ञानेंद्रियाँ हैं। आँखोंसे रूप, जिह्वासे रस, कानोंसे शब्द, नाकसे गंध, और त्वचासे स्पर्शका ज्ञान होता है। किसीभी बाह्य पदार्थका जो हमें ज्ञान होता है, वह उस पदार्थके रूप-रस-शब्द-गंध-स्पर्शके सिवा और कुछ नहीं है। उदाहरणार्थ, एक सोनेका टुकड़ा लीजिये। वह पीला दीख पड़ता है, त्वचाको भारी मालूम होता है, पीटनेसे लंबा हो जाता है इत्यादि जो गुण हमारी इंद्रियोंको गोचर होते हैं, उन्हींको हम सोना कहते हैं; और जब ये गुण बार बार एकही पदार्थमें, एकहीसे दृग्गोचर होने लगने हैं, तब हमारी दृष्टिसे सोना एक स्वतंत्र पदार्थ बन जाता है। जिस प्रकार बाहरका माल भीतर लानेके लिये और भीतरका माल बाहर भेजनेके लिये किसी कारखानेमें दरवाजे होते हैं, उसी प्रकार मनुष्यकी देहमें बाहरके मालको भीतर लेनेके लिये ज्ञानेंद्रियाँ-रूपी द्वार हैं, और भीतरका माल बाहर भेजनेके लिये कर्मेंद्रियाँ-रूपी द्वार हैं। सूर्यकी किरणें