भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 180

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३३ किसी पदार्थपर गिर कर जब लौटती हैं, और हमारे नेत्रोंमें प्रवेश करती हैं तब हमारे आत्माको उस पदार्थके रूपका ज्ञान होता है। किसी पदार्थसे आनेवाली गंधके सूक्ष्म परमाणु जब हमारी नाकके मज्जातंतुओंसे टकराते हैं, तब हमें उस पदार्थकी बास आती है। अन्य ज्ञानेंद्रियोंके व्यापारभी इसी प्रकार हुआ करते हैं। जब ज्ञानेंद्रियाँ इस प्रकार अपना व्यापार करने लगते हैं, तब हमें उनके द्वारा बाह्य सृष्टिके पदार्थोंका ज्ञान होने लगता है। परंतु ज्ञानेंद्रियाँ जो कुछ व्यापार करती हैं, उसका ज्ञान स्वयं उनको नहीं होता; उसी लिये ज्ञानेंद्रियोंको 'ज्ञाता' नहीं कहते; किंतु उन्हें सिर्फ बाहरके मालको भीतर ले आनेवाले 'द्वार'ही कहते हैं। इन दरवाजोंसे माल भीतर आ जानेपर उसकी व्यवस्था करना मनका काम है। उदाहरणार्थ, बारह बजे जब घड़ीमें घंटे बजने लगते हैं, तब एकदम हमारे कानोंको यह नहीं समझ पड़ता, कि कितने बजे हैं; किंतु ज्यों ज्यों घड़ीमें 'टन् टन्' की एक एक आवाज़ होती जाती है, त्यों त्यों हवाकी लहरें हमारे कानोंपर आकर टक्कर मारती हैं; और मज्जातंतुओंके द्वारा प्रत्येक आवाजका हमारे मनपर पहले अलग अलग संस्कार होता है और अंतमें इन सबोंको जोड़ कर हम निश्चित किया करते हैं, कि इतने बजे हैं। पशुओंमेंभी ज्ञानेंद्रियाँ होती हैं। जब घड़ीकी 'टन् टन्' आवाज होती है, तब प्रत्येक ध्वनिका संस्कार उनके कानोंके द्वारा मनतक पहुँच जाता है। परंतु उनका मन इतना विकसित नहीं रहता, कि वे उन सब संस्कारोंको एकत्र करके यह निश्चित कर लें कि बारह बजे हैं। यही अर्थ शास्त्रीय परिभाषामें इस प्रकार कहा जाता है, कि यद्यपि अनेक संस्कारोंका पृथक् पृथक् ज्ञान पशुओंको हो जाता है, तथापि उम अनेकताकी एकताका बोध उन्हें नहीं होता। भगवद्गीता (गीता ३. ४२) में कहा है:- " इंद्रियाणि पराण्याहुः इंद्रियेभ्यः परं मनः" अर्थात् इंद्रियाँ (बाह्य) पदार्थोंसे श्रेष्ठ हैं; और मन इंद्रि- योंसेभी श्रेष्ठ है। इसका भावार्थभी वही है, जो ऊपर लिखा गया है। पहले कह चुके हैं, कि यदि मन स्थिर न हो, तो आँखें खुली होनेपरभी कुछ दीख नहीं पड़ता; और कान खुले होनेपरभी कुछ सुन नहीं पड़ता। तात्पर्य यह है, कि इस देहरूपी कारखानेमें 'मन' एक मुंशी (क्लर्क) है; जिसके पास बाहरका सब माल ज्ञाने- द्रियोंके द्वारा भेजा जाता है। और तब यही मुंशी (मन) मालकी जाँच किया करता है। अब इन बातोंका विचार करना चाहिये कि यह जाँच किस प्रकारकी जाती है; और जिसे हम अबतक सामान्यतः 'मन' कहते आये हैं, उसकेभी और कौन-कौन-से भेद किये जा सकते हैं अथवा एकही मनको भिन्न भिन्न अधिकारोंके अनुसार कौन-कौनसे भिन्न भिन्न नाम प्राप्त हो जाते हैं। ज्ञानेंद्रियोंके द्वारा मनपर जो संस्कार होते हैं, उन्हें प्रथम एकत्र करके और उनकी परस्पर तुलना करके इस बातका पहले निर्णय करना पड़ता है, कि उनमेंसे अच्छे कौन-से और बुरे कौन-से हैं, ग्राह्य और त्याज्य कौनसे और लाभदायक तथा