भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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१३४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हानिकारक कौनसे हैं। यह निर्णय हो जानेपर उनमेंसे जो बात अच्छी, ग्राह्य, लाभदायक, उचित अथवा करनेयोग्य होती है, उसे करनेमें हम प्रवृत्त हुआ करते हैं। यही सामान्य मानसिक व्यवहार है। उदाहरणार्थ, जब हम किसी बगीचेमें जाते हैं, तब आंख और नाक-रूपी ज्ञानेंद्रियोंके द्वारा उस बगीचेके वृक्षों और फूलोंके संस्कार हमारे मनपर होते हैं। परंतु जब तक हमारे आत्माको यह ज्ञान नहीं होता, कि इन फूलोंमेंसे किसकी सुगंध अच्छी और किसकी बुरी है; तब तक किसी फूलको प्राप्त कर लेनेकी इच्छा मनमें उत्पन्न नहीं होती; और न हम उसे तोड़नेका प्रयत्नही करते है। अतएव सब मनोव्यापारोंके तीन स्थूल भाग हो सकते हैं:- (१) ज्ञानेंद्रियोंके द्वारा बाह्य पदार्थोंका ज्ञान प्राप्त करके उन संस्कारोंको तुलनाके लिये व्यवस्थापूर्वक रखना; (२) ऐसी व्यवस्था हो जानेपर उनके अच्छेपन या बुरेपनका सारअसार-विचार करके यह निश्चय करना, कि कौन-सी बात ग्राह्य है और कौन-सी त्याज्य; और (३) निश्चय हो चुकनेपर, ग्राह्य वस्तुको प्राप्त कर लेनेकी, और अग्राह्यको त्यागनेकी इच्छा उत्पन्न होकर फिर उसके अनुसार प्रवृत्तिका होना। परंतु यह आवश्यक नहीं, कि ये तीनों व्यापार बिना रुकावटके लगातार एकके बाद एक होतेही रहें। संभव है, कि पहले किसी समय देखी हुई वस्तुकी इच्छा आज हो जाय। किंतु इतनेहीसे यह नहीं कह सकते, कि उक्त तीनों क्रियाओंमेंसे किसीभी क्रियाकी आवश्यकता नहीं है। यद्यपि न्याय करनेकी कचहरी एकही होती है, तथापि उसमें कामका विभाजन इस प्रकार किया जाता है:- पहले वादी और प्रतिवादी अथवा उनके वकील अपनी अपनी गवाहियां और सबूत न्यायाधीशके सामने पेश करते हैं। इसके बाद न्यायाधीश दोनों पक्षोंके सबूत देखकर निर्णय स्थिर करता है, और अंतमें न्यायाधीशके निर्णयके अनुसार नाज़िर कारवाई करता है। ठीक इसी प्रकार जिस मुंशीको अभीतक हम सामान्यतः 'मन' कहते आये हैं, उसके व्यापारोंकेभी विभाग हुआ करते हैं! इनमेंसे सामने उपस्थित बातोंका सार-असार विचार करके यह निश्चय करनेका काम - अर्थात् केवल न्यायाधीशका काम - 'बुद्धि' नामक इंद्रियका है, कि कोई एक बात अमुक प्रकारहीकी (एकमेव) है, दूसरे प्रकारकी नहीं (नाऽन्यथा)। ऊपर कहे गये सब मनो-व्यापारोंमेंसे इस सार-असार-विवेक- शक्तिको अलग कर देनेपर बचे हुए सभी व्यापार जिस इंद्रियके द्वारा हुआ करते हैं, उसीको सांख्य और वेदान्तशास्त्रमें 'मन' कहते हैं (सां. का. २३ और २७) यही मन वकीलके सदृश्य, कोई बात ऐसी है (संकल्प), अथवा उसके विरुद्ध वैसी है (विकल्प); इत्यादि कल्पनाओंको बुद्धिके सामने निर्णय करनेके लिये पेश किया करता है। इसीलिये उसे 'संकल्प-विकल्पात्मक' अर्थात् बिना निश्चय किये केवल कल्पना करनेवाली इंद्रिय कहा गया है। कभी कभी 'संकल्प' शब्दमें 'निश्चय' काभी अर्थ शामिल कर दिया जाता है (छांदोग्य ७. ४. १)। परंतु