भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३५ यहाँपर 'संकल्प' शब्दका उपयोग - निश्चयकी अपेक्षा न रखते हुए - बात अमुक प्रकारकी मालूम होना, मानना, कल्पना करना, समझना, अथवा कुछ योजना करना, इच्छा करना, चिंतन करना, मनमें लाना आदि व्यापारोंके लियेही किया गया है। परंतु, इस प्रकार वकीलके सदृश अपनी कल्पनाओंको बुद्धिके सामने निर्णयार्थ सिर्फ उपस्थित कर देनेहीमे मनका काम पूरा नही हो जाता। बुद्धिके द्वारा भले-बुरेका निर्णय हो जानेपर, जिस बातको बुद्धिने ग्राह्य माना है, उसका कर्मेंद्रियोंसे आचरण करना, अर्थात् बुद्धिकी आज्ञाको कार्यमें परिणत करना - यह नाज़िरका कामभी मनहीको करना पड़ता है। इसी कारण मनकी व्याख्या दूसरी तरहभी की जा सकती है। यह कहनेमें कोई आपत्ति नहीं, कि बुद्धिके निर्णयकी कार्रवाईपर जो विचार किया जाता है, वहभी एक प्रकारसे संकल्प-विकल्पात्मकही है। परंतु इसके लिये संस्कृतमें 'व्याकरणविस्तार करना यह स्वतंत्र नाम दिया गया है। इसके अतिरिक्त शेष सब कार्य बुद्धिके हैं। यहाँ तक कि मन हमारी कल्पनाओंके सार-असारका विचार नहीं करता। सार-असार विचार करके किसीभी वस्तुका यथार्थ ज्ञान आत्माको करा देना, अथवा चुनाव करके यह निश्चय करना, कि अमुक वस्तु अमुक प्रकारकी है, या तर्कसे कार्य-कारण- संबंधको देख कर निश्चित अनुमान करना, अथवा कार्य-अकार्यका निर्णय करना, इत्यादि सब व्यापार बुद्धिके हैं। संस्कृतमें इन व्यापारोंको 'व्यवसाय' या 'अध्य- वसाय' कहते हैं। अतएव इन दो शब्दोंका उपयोग करके, 'बुद्धि' और 'मन' का भेद बतलानेके लिये, महाभारत (महा. शां. २५१. ११) में यह व्याख्या दी गई है :- व्यवसायात्मिका बुद्धि मनो व्याकरणात्मकम् । "बुद्धि ( इंद्रिय ) व्यवसाय करती है; अर्थात् सार-असार विचार करके कुछ निश्चय करती है; और मन व्याकरण अर्थात् विस्तार अथवा अगली अवस्था करनेवाली प्रवर्तक इंद्रिय है - अर्थात् बुद्धि व्यवसायात्मिका है और मन व्याकरणात्मक है।" भगवद्गीतामेंभी "व्यवसायात्मिका बुद्धिः" शब्द पाये जाते हैं (गीता २. ४४); और वहाँभी बुद्धिका अर्थ "सार-असार-विचार करके निश्चय करनेवाली इंद्रिय" ही है। यथार्थमें बुद्धि केवल एक तलवार है। जो कुछ उसके सामने आता है या लाया जाता है, उसकी काट-छांट करनाही उसका काम है; उसमें दूसरा कोईभी गुण अथवा धर्म नहीं है (मभा. वन. १८१. ८६)। संकल्प, वासना, इच्छा, स्मृति, धृति, श्रद्धा, उत्साह, करुणा, अनुकंपा, प्रेम, दया, सहानुभूति, कृत- ज्ञता, काम, लज्जा, आनंद, भय, राग, संग, द्वेष, लोभ, मद, मत्सर, क्रोध, इत्यादि सब मनहीके गुण अथवा धर्म हैं (बृ. १. ५. ३; मैत्र्यु. ६. ३०)। जैसे जैसे ये मनोवृत्तियाँ जागृत होती जाती हैं, वैसेही कर्म करनेकी ओर मनुष्यकी प्रवृत्ति हुआ करती है। उदाहरणार्थ, मनुष्य चाहे जितना बुद्धिमान् हो और चाहे वह गरीब लोगोंकी दुर्दशाका हाल भली भाँति जानता हो; तथापि यदि उसके हृदयमें