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श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३५ यहाँपर 'संकल्प' शब्दका उपयोग - निश्चयकी अपेक्षा न रखते हुए - बात अमुक प्रकारकी मालूम होना, मानना, कल्पना करना, समझना, अथवा कुछ योजना करना, इच्छा करना, चिंतन करना, मनमें लाना आदि व्यापारोंके लियेही किया गया है। परंतु, इस प्रकार वकीलके सदृश अपनी कल्पनाओंको बुद्धिके सामने निर्णयार्थ सिर्फ उपस्थित कर देनेहीमे मनका काम पूरा नही हो जाता। बुद्धिके द्वारा भले-बुरेका निर्णय हो जानेपर, जिस बातको बुद्धिने ग्राह्य माना है, उसका कर्मेंद्रियोंसे आचरण करना, अर्थात् बुद्धिकी आज्ञाको कार्यमें परिणत करना - यह नाज़िरका कामभी मनहीको करना पड़ता है। इसी कारण मनकी व्याख्या दूसरी तरहभी की जा सकती है। यह कहनेमें कोई आपत्ति नहीं, कि बुद्धिके निर्णयकी कार्रवाईपर जो विचार किया जाता है, वहभी एक प्रकारसे संकल्प-विकल्पात्मकही है। परंतु इसके लिये संस्कृतमें 'व्याकरणविस्तार करना यह स्वतंत्र नाम दिया गया है। इसके अतिरिक्त शेष सब कार्य बुद्धिके हैं। यहाँ तक कि मन हमारी कल्पनाओंके सार-असारका विचार नहीं करता। सार-असार विचार करके किसीभी वस्तुका यथार्थ ज्ञान आत्माको करा देना, अथवा चुनाव करके यह निश्चय करना, कि अमुक वस्तु अमुक प्रकारकी है, या तर्कसे कार्य-कारण- संबंधको देख कर निश्चित अनुमान करना, अथवा कार्य-अकार्यका निर्णय करना, इत्यादि सब व्यापार बुद्धिके हैं। संस्कृतमें इन व्यापारोंको 'व्यवसाय' या 'अध्य- वसाय' कहते हैं। अतएव इन दो शब्दोंका उपयोग करके, 'बुद्धि' और 'मन' का भेद बतलानेके लिये, महाभारत (महा. शां. २५१. ११) में यह व्याख्या दी गई है :- व्यवसायात्मिका बुद्धि मनो व्याकरणात्मकम् । "बुद्धि ( इंद्रिय ) व्यवसाय करती है; अर्थात् सार-असार विचार करके कुछ निश्चय करती है; और मन व्याकरण अर्थात् विस्तार अथवा अगली अवस्था करनेवाली प्रवर्तक इंद्रिय है - अर्थात् बुद्धि व्यवसायात्मिका है और मन व्याकरणात्मक है।" भगवद्गीतामेंभी "व्यवसायात्मिका बुद्धिः" शब्द पाये जाते हैं (गीता २. ४४); और वहाँभी बुद्धिका अर्थ "सार-असार-विचार करके निश्चय करनेवाली इंद्रिय" ही है। यथार्थमें बुद्धि केवल एक तलवार है। जो कुछ उसके सामने आता है या लाया जाता है, उसकी काट-छांट करनाही उसका काम है; उसमें दूसरा कोईभी गुण अथवा धर्म नहीं है (मभा. वन. १८१. ८६)। संकल्प, वासना, इच्छा, स्मृति, धृति, श्रद्धा, उत्साह, करुणा, अनुकंपा, प्रेम, दया, सहानुभूति, कृत- ज्ञता, काम, लज्जा, आनंद, भय, राग, संग, द्वेष, लोभ, मद, मत्सर, क्रोध, इत्यादि सब मनहीके गुण अथवा धर्म हैं (बृ. १. ५. ३; मैत्र्यु. ६. ३०)। जैसे जैसे ये मनोवृत्तियाँ जागृत होती जाती हैं, वैसेही कर्म करनेकी ओर मनुष्यकी प्रवृत्ति हुआ करती है। उदाहरणार्थ, मनुष्य चाहे जितना बुद्धिमान् हो और चाहे वह गरीब लोगोंकी दुर्दशाका हाल भली भाँति जानता हो; तथापि यदि उसके हृदयमें

१३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करुणावृत्ति जागृत न हो, तो उसे गरीबोंकी सहायता करनेकी इच्छा कभी होगीही नहीं। अथवा, यदि धैर्यका अभाव हो, तो युद्ध करनेकी इच्छा होनेपरभी वह नहीं लड़ेगा। तात्पर्य यह है, कि बुद्धि सिर्फ़ यही बतलाया करती है, कि जिस बात- को करनेकी हम इच्छा करते हैं, उसका परिणाम क्या होगा। परंतु इच्छा अथवा धैर्य आदि गुण बुद्धिके धर्म नहीं है, इसलिये बुद्धि, स्वयं (अर्थात् बिना मनकी सहायता लियेही) कभी इंद्रियोंको प्रेरित नहीं कर सकती। इसके विरुद्ध क्रोध आदि वृत्तियोंके वशमें होकर स्वयं मन चाहे इंद्रियोंको प्रेरितभी कर सके; तोभी यह नहीं कहा जा सकता, कि बुद्धिके सार-असार-विचारके बिना केवल मनोवृत्तियोंकी प्रेरणासे किया गया काम नीतिकी दृष्टिमे शुद्धही होगा। उदाहरणार्थ, यदि बुद्धिका उपयोग न कर केवल करुणावृत्तिसे कुछ दान किया जाता है, तो संभव है, कि वह किसी अपात्रको दिया जावे; और उसका परिणामभी बुरा हो। सारांश यह है, कि बुद्धिकी सहायताके बिना केवल मनोवृत्तियाँ अंधी हैं, अतएव मनुष्यका कोई काम शुद्ध तभी हो सकता है, जब कि बुद्धि शुद्ध हो - अर्थात् वह भले-बुरेका अचूक निर्णय कर सके; मन बुद्धिके अनुरोधसे आचरण करें; और इंद्रियाँ मनके अधीन रहें। बुद्धि और मनके सिवा 'अंतःकरण' और 'चित्त' ये दोनों शब्दभी प्रचलित हैं। इनमेंसे 'अंतःकरण' शब्दका धात्वर्थ 'भीतरी करण अर्थात् इंद्रिय' है। इसलिये उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सभीका सामान्यतः समावेश किया जाता है और जब 'मन' पहले पहल बाह्य-विषयोंका ग्रहण अर्थात् चिंतन करने लगता है, तब वही 'चित्त' हो जाता है (मभा. शां. २७४. १७)। परंतु सामान्य व्यवहारमें इन सब शब्दोंका अर्थ एकही-सा माना जाता है। इसमे समझमें नही आता, कि किस स्थानपर कौन-सा अर्थ विवक्षित है। इस गड़बड़ीको दूर करनेके लिये ही, उक्त अनेक शब्दोंमेंसे मन और बुद्धि, इन्ही दो शब्दोंका उपयोग शास्त्रीय परिभाषामें ऊपर कहे गये निश्चित अर्थ में किया जाता है। जब इस तरह मन और बुद्धिका भेद एक बार निश्चित कर दिया गया, तब न्यायाधीशके नाते बुद्धिको मनसे श्रेष्ठ मानना पड़ता है; और मन उस न्याया- धीश (बुद्धि) का मुंशी बन जाता है। “मनसस्तु परा बुद्धिः” - इस गीता- वाक्यका भावार्थभी यही है, कि मनकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ एवं उसके परे है (गीता ३. ४२)। तथापि, जैसा कि ऊपर कह आये हैं, उस मुंशीकोभी दो प्रकारके काम करने पड़ते हैं:- (१) ज्ञानेंद्रियों द्वारा अथवा बाहरसे आए हुये संस्कारोंकी व्यवस्था करके उनको बुद्धिके सामने निर्णयके लिये उपस्थित करना; और (२) बुद्धिका निर्णय हो जानेपर उसकी आज्ञा अथवा डाक कर्मेंद्रियोंके पास भेज कर बुद्धिका हेतु सफल करनेके लिये आवश्यक बाह्यक्रिया करवाना। जिस तरह दूकानके लिये माल खरीदनेका काम और दूकानमें बैठ कर बेचनेका कामभी कहीं कहीं उस दूकानके एकही नौकरको करना पड़ता है, उसी तरह मनकोभी दोनों

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३७ काम करने पड़ते हैं। मान लो, कि हमें एक मित्र दीख पडा; और उसे पुकारने- की इच्छासे हमने उसे 'अरे' कहा। अब देखिये कि उतने समयमें अंतःकरणमें कितने व्यापार होते हैं। पहले आँखोंने अर्थात् ज्ञानेंद्रियोंने यह संस्कार मनके द्वारा बुद्धिको भेजा, कि हमारा मित्र पासही है; और बुद्धिके द्वारा उस संस्कारका ज्ञान आत्माको हुआ। यह हुई ज्ञान होनेकी क्रिया। जब आत्मा बुद्धिके द्वारा यह निश्चय करता है, कि मित्रको पुकारना चाहिये; और बुद्धिके इस हेतुके अनुसार कार्रवाई करनेके लिये मनमें बोलनेकी इच्छा उत्पन्न होती है; तब मन हमारी जिव्हा (कर्मेंद्रिय) मे 'अरे' शब्दका उच्चारण करवाता है। पाणिनीके शिक्षा-ग्रंथमें शब्दोच्चारण-क्रियाका वर्णन उसी बातको ध्यानमे रखकर किया गया है :- आत्मा बुद्ध्या समेत्याऽर्थान् मनो युंक्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् । मारुतस्तूरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम् ॥ अर्थात् “पहले आत्मा बुद्धिके द्वारा सब बातोंका आकलन करके मनमें बोलनेकी इच्छा उत्पन्न करता है; और जब कायाग्निको उकसाता है, तब कायाग्नि वायुको प्रेरित करती है। तदनंतर यह वायु छातीमें प्रवेश करके मंद्र स्वर उत्पन्न करता है। यही स्वर आगे कंठ-तालू आदिके वर्ण-भेद-रूपमे मुखके बाहर आता है। उक्त श्लोकके अंतिम दो चरण मैत्र्युपनिषदमेंभी मिलते हैं (मैत्र्यु. ७. ११) ; और इसमे प्रतीत होता है, कि ये श्लोक पाणिनिसेभी प्राचीन हैं।* आधु- निक शारीरशास्त्रोंमें कायाग्निको मज्जातंतु कहते हैं। परंतु पश्चिमी शारीर- शास्त्रज्ञोंके कथनानुसार मनभी दो हैं। क्योकि बाहरके पदार्थोंका ज्ञान भीतर लाने- वाले और मनके द्वारा बुद्धिकी आज्ञा कर्मेंद्रियोंको बतलानेवाले शरीरके मज्जा- तंतु भिन्न भिन्न हैं। हमारे शास्त्रकार दो मन नहीं मानते; उन्होंने मन और बुद्धिको भिन्न बतला कर सिर्फ यह कहा है, कि मन उभयात्मक है - अर्थात् वह कर्मेंद्रियोंके साथ कर्मेंद्रियोंके समान और ज्ञानेंद्रियोंके साथ ज्ञानेंद्रियोंके समान काम करता है। दोनोंका तात्पर्य एकही है। दोनोंकी दृष्टिसे यही प्रकट है, कि बुद्धि निश्चयकर्ता न्यायाधीश है; और मन पहले ज्ञानेंद्रियोंके साथ संकल्प-विकल्पात्मक हो जाया करता है; तथा फिर कर्मेंद्रियोके साथ व्याकरणात्मक या कार्रवाई करने- वाला अर्थात् कर्मेंद्रियोंका साक्षात् प्रवर्तक हो जाता है। किसी बातका 'व्याकरण' करने समय कभी कभी मन यह संकल्प-विकल्पभी किया करता है, कि बुद्धिकी आज्ञाका पालन किस प्रकार किया जाय। इसीलिये मनकी व्याख्या करते समय

  • मैक्समूलर साहबने लिखा है, कि मैत्र्युपनिषद् पाणिनिकी अपेक्षा प्राचीन होना चाहिये। Sacred Books of the East Series. Vol. XV. pp. xlvii-li. इसपर परिशिष्ट प्रकरणमें अधिक विचार किया गया है।

१३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सामान्यतः सिर्फ़ यही कहा जाता है, कि “संकल्प-विकल्पात्मकं मनः”। परंतु, ध्यान रहे, कि उस समयभी इस व्याख्यामें मनके दोनों व्यापारोंका समावेश किया जाता है। ‘बुद्धि’का जो अर्थ ऊपर किया गया है, कि यह निर्णय करनेवाली इंद्रिय है; वह अर्थ केवल शास्त्रीय और सूक्ष्म-विवेचनके लिये उपयोगी है। परंतु इन शास्त्रीय अर्थोंका निर्णय हमेशा पीछेमे किया जाता है। अतएव यहाँ ‘बुद्धि’ शब्दके उन व्यावहारिक अर्थोंकाभी विचार करना आवश्यक है, जो, इस शब्दका शास्त्रीय अर्थ निश्चित होनेके पहलेही, प्रचलित हो गये हैं। जबतक व्यवसाया- त्मिका बुद्धि किसी बातका पहले निर्णय नहीं करती, तबतक हमें उसका ज्ञान नहीं होता; और जबतक ज्ञान नहीं होता, तबतक उसके प्राप्त करनेकी इच्छा या वासनाभी नहीं हो सकती। अतएव, जिस प्रकार व्यवहारमें आमके पेड़ और फलके लिये 'आम' इस एकही शब्दका प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार व्यवसायात्मिका बुद्धिके लिये और उस बुद्धिकी वासना आदि फलोंके लियेभी ‘बुद्धि’ इस एकही शब्दका उपयोग व्यवहारमें कई बार किया जाता है। उदाहरणार्थ, जब हम कहते हैं, कि अमुक मनुष्यकी बुद्धि खोटी है; तब हमारे इस बोलनेका यह अर्थ होता है, कि उसकी ‘वासना’ खोटी है। शास्त्रके अनुसार इच्छा या वासना मनके धर्म होनेके कारण उन्हें ‘बुद्धि’ शब्दसे संबोधित करना युक्त नहीं है। परंतु बुद्धि शब्दकी शास्त्रीय जाँच होनेके पहलेहीसे सर्वसाधारण लोगोंके व्यवहारमें 'बुद्धि' इस एकही शब्दका उपयोग इन दोनों अर्थोंमें होता चला आया है:— (१) निर्णय करने- वाली इंद्रिय; और (२) उस इंद्रियके व्यापारसे मनुष्यके मनमें उत्पन्न होने- वाली वासना या इच्छा। अतएव, आमके दो अर्थोंका भेद बतलानेके समय जिस प्रकार 'पेड़' और 'फल' इन शब्दोंको जोड़ दिया जाता है, उसी प्रकार जब बुद्धिके उक्त दोनों अर्थोंकी भिन्नता व्यक्त करनी होती है, तब निर्णय करनेवाली अर्थात् शास्त्रीय बुद्धिको 'व्यवसायात्मिका' विशेषण जोड़ दिया जाता है; और वासनाको केवल 'बुद्धि' अथवा 'वासनात्मक' बुद्धि कहते हैं। गीता (गीता २. ४१, ४८, ४९; और ३. ३२) में 'बुद्धि' शब्दका उपयोग उपर्युक्त दोनों अर्थोंमें किया गया है। और कर्मयोगके विवेचनको ठीक ठीक समझ लेनेके लिये 'बुद्धि' शब्दके उपर्युक्त दोनों अर्थोंपर हमेशा ध्यान रखना चाहिये। जब मनुष्य कुछ काम करने लगता है, तब उसके मनोव्यापारका क्रम इस प्रकार होता है:—पहले वह 'व्यव- सायात्मिका' बुद्धींद्रियसे विचार करता है, कि यह कार्य अच्छा है या बुरा, करनेके योग्य है या नहीं; और फिर उस कर्मके करनेकी इच्छा या वासना (अर्थात् वासनात्मक बुद्धि) उत्पन्न होती है; और तब वह उक्त काम करनेके लिये प्रवृत्त हो जाता है। कार्य-अकार्यका निर्णय करना जिस (व्यवसायात्मिका) बुद्धींद्रियका व्यापार है, वह यदि स्वस्थ और शांत हो, तो मनमें निरर्थक अन्य वासनाएँ

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३९ (बुद्धि) उत्पन्न नहीं होने पाती और मनभी बिगड़ने नहीं पाता। अतएव गीता (गीता २. ४१) में कर्मयोगशास्त्रका प्रथम सिद्धान्त यह है, कि पहले व्यवसाया- त्मिका बुद्धिको शुद्ध और स्थिर रखना चाहिये। केवल गीताहीमें नहीं, किंतु कांटने * भी बुद्धिके इसी प्रकार दो भेद किये हैं, और शुद्ध अर्थात् व्यवसायात्मिका बुद्धिके एवं व्यावहारिक अर्थात् वासनात्मक बुद्धिके व्यापारोंका विवेचन दो स्वतंत्र ग्रंथोंमें किया है। वस्तुतः देखनेसे तो यही प्रतीत होता है, कि व्यवसाया- त्मिका बुद्धिको स्थिर करना पातंजल योगशास्त्रहीका विषय है; कर्मयोगशास्त्रका नहीं। किंतु गीताका सिद्धान्त है, कि कर्मका विचार करते समय उसकी परि- णामकी ओर ध्यान देनेके पहले सिर्फ यही देखना चाहिये, कि कर्म करनेवालेकी वासना अर्थात् वासनात्मक बुद्धि कैसी है (गीता २.४९)। और इस प्रकार जब वासनाके विषयमें विचार किया जाता है, तब प्रतीत होता है, कि जिसकी व्यवसायात्मिका बुद्धि स्थिर और शुद्ध नहीं रहती, उसके मनमें वासनाओंकी भिन्न भिन्न तरंगें उत्पन्न हुआ करती हैं। और इसी कारण कहा नहीं जा सकता, कि वे वासनाएँ सदैव शुद्ध और पवित्रही होंगी (गीता २.४१)। जब कि वासनाएँही शुद्ध नहीं हैं, तब आगे कर्मभी शुद्ध कैसे हो सकता है? इसीलिये कर्मयोग शास्त्रमेंभी व्यवसायात्मिका कौनसे बुद्धिको शुद्ध, रखनेके लिये साधन अथवा उपाय हैं, इस बातका विस्तारपूर्वक विचार करनेकी आवश्यकता है; और इसी कारण भगवद्गीताके छठे अध्यायमें बुद्धिको शुद्ध करनेके लिये एक साधनके तौरपर पातंजलयोगका विवेचन किया गया है। परंतु इस संबंधपर ध्यान न दे कर कुछ सांप्रदायिक टीकाकारोंने गीताका यह तात्पर्य निकाला है, कि गीतामें केवल पातंजलयोगकाही प्रतिपादन किया गया है। अब पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जायगी, कि गीताशास्त्रमें 'बुद्धि' शब्दके उपर्युक्त दोनों अर्थोंपर और उन अर्थोंके परस्परसंबंधपर ध्यान देना कितने महत्त्व का है। इस बातका वर्णन हो चुका, कि मनुष्यके अंतःकरणके व्यापार किस प्रकार हुआ करते हैं तथा उन व्यापारोंको देखते हुए मन और बुद्धिके कार्य कौन कौनसे हैं, और बुद्धि शब्दके कितने अर्थ होते हैं। मन और व्यवसायात्मिका बुद्धिको इस प्रकार पृथक् कर देनेपर अब देखना चाहिये, कि सदसद्विवेक-देवताका यथार्थ रूप क्या है? इस देवताका काम सिर्फ भले-बुरेका चुनाव करना है, अतएव इसका समावेश 'मन'में नहीं किया जा सकता; और किसीभी बातका विचार करके निर्णय करनेवाली व्यवसायात्मिका बुद्धि केवल एकही है; इसलिये सदसद्विवेक-रूप 'देवता'के लिये कोई स्वतंत्र स्थान नहीं रह जाता। हाँ, इसमें

  • कांटने व्यवसायात्मिका बुद्धिको Pure Reason और वासनात्मक बुद्धिको Practical Reason कहा है।

१४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संदेह नहीं, कि जिन बातोंका या विषयोंका सार-असार विवेक करके निर्णय करना पड़ता है, वे अनेक हो सकते हैं। जैसे व्यापार, लड़ाई, फौजदारी या दीवानी मुक़दमे, साहुकारी, कृषि आदि अनेक व्यवसायोंमें हर अवसरपर सार-असार- विवेक करना पड़ता है। परंतु इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता, कि इनमें व्यवसायात्मिका बुद्धियाँभी भिन्न भिन्न अथवा कई प्रकारकी होती हैं। सार- असार-विवेक नामकी क्रिया सर्वत्र एकही है; और इसी कारण विवेक अथवा निर्णय करनेवाली बुद्धिभी एकही होनी चाहिये। परंतु मनके सदृश बुद्धिभी शरीरका धर्म है। अतएव पूर्वकर्मके अनुसार - पूर्वपरंपरागत या आनुवंशिक संस्कारोंके कारण, अथवा शिक्षा आदि अन्य कारणोंसे - यह बुद्धि कम या अधिक सात्त्विकी, राजसी या तामसी हो सकती है। यही कारण है, कि जो बात किसी एककी बुद्धिमें ग्राह्य प्रतीत होती है वही दूसरेकी बुद्धिमें अग्राह्य जँचती है। इतनेहीसे यह नहीं समझ लेना चाहिये, कि बुद्धि नामकी इंद्रियही प्रत्येक समय भिन्न भिन्न रहती है। आँख ही का उदाहरण लीजिये। किसीकी आँखें तिरछी रहती हैं, तो किसीकी भद्दी और किसीकी कानी; किसीकी दृष्टि मंद और किसीकी साफ़ रहती है। इससे हम यह कभी नहीं कहते, कि नेत्रेंद्रिय एक नहीं, अनेक हैं। यही न्याय बुद्धिके विषयमेंभी उपयुक्त होना चाहिये। जिस बुद्धिसे चावल अथवा गेहूँ जाने जाते हैं; जिस बुद्धिसे पत्थर और हीरेका भेद जाना जाता है; जिस बुद्धिसे काले-गोरे वा मीठे-कड़वेका ज्ञान होता है; वही इन सब बातोंके तारतम्यका विचार करके अंतिम निर्णयभी किया करती है, कि भय किसमें है, और किसमें नहीं; लाभ या हानि, धर्म अथवा अधर्म और कार्य अथवा अकार्यमें क्या भेद है, इत्यादि। साधारण व्यवहारमें 'मनोदेवता' कह कर उसका चाहे जितना गौरव किया जाय, तथापि तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे वह एकही व्यवसाया- त्मिका बुद्धि है। इसी अभिप्रायकी ओर ध्यान दे कर गीताके अठारहवें अध्यायमें एकही बुद्धिके तीन भेद (सात्त्विक, राजस और तामस) करके भगवानने अर्जुनको पहले यह बतलाया है कि :- प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ अर्थात् "सात्त्विक बुद्धि वह है, कि जिसे इन बातोंका यथार्थ ज्ञान है :- कौन-सा काम करना चाहिये और कौन-सा नहीं, काम करने योग्य है और कौन-सा अयोग्य, किस बातसे डरना चाहिये और किस बातसे नहीं, किसमें बंधन है और किसमें मोक्ष" (गीता १८. ३०)। इसके बाद यह बतलाया है कि - यया धर्ममधर्मं च कार्यं च अकार्यमेव च। अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १४१ अर्थात् “ धर्म और अधर्म, अथवा कार्य और अकार्यका यथार्थ निर्णय जो बुद्धि नहीं कर सकती, यानी जो बुद्धि हमेशा भूल किया करती है, वह राजसी है ” ( गीता १८. ३१ )। और अंतमें कहा है कि :- अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धि : सा पार्थ तामसी ॥ अर्थात् “ अधर्मकोही धर्म माननेवाली, अथवा सब बातोंका विपरीत या उलटा निर्णय करनेवाली बुद्धि तामसी कहलाती है ” ( गीता १८. ३२ )। इस विवेचनसे स्पष्ट हो जाता है, कि केवल भले-बुरेका निर्णय करनेवाली, अर्थात् सद- सद्विवेक-बुद्धिरूप स्वतंत्र और भिन्न देवता गीताको संमत नहीं है। उसका अर्थ यह नहीं है, कि सदैव ठीक निर्णय करनेवाली बुद्धि होही नहीं सकती। उपर्युक्त श्लोकोंका भावार्थ यही है, कि बुद्धि एकही है, और ठीक ठीक निर्णय करनेका सात्त्विक गुण इसी एक बुद्धिमें पूर्वसंस्कारोंके कारण, शिक्षासे तथा इंद्रियनिग्रह अथवा आहार आदिके कारण उत्पन्न हो जाता है; और इन पूर्वसंस्कार-प्रभृति कारणोंके अभावसेही - वही बुद्धि जैसे कार्य-अकार्य-निर्णयके विषयमें वैसेही अन्य दूसरी बातोंमेंभी - राजसी अथवा तामसो हो सकती है। इस सिद्धान्तकी सहा- यतासे यह भली भांति मालूम हो जाता है, कि चोर और साहकी बुद्धिमें, तथा भिन्न भिन्न देशोंके मनुष्योंकी बुद्धिमें भिन्नता क्यों हुआ करती है। परंतु जब हम सदसद्विवेचन-शक्तिको स्वतंत्र देवता मानते हैं, तब उस विषयकी उपपत्ति ठीक ठीक सिद्ध नहीं होती। प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है, कि वह अपनी बुद्धिको सात्त्विक बनावे और यह काम इंद्रियनिग्रहके बिना हो नहीं सकता। जबतक व्यवसाया- त्मिका बुद्धि यह जाननेमें समर्थ नहीं है, कि मनुष्यका हित किस बातमें है; और जबतक वह उस बातका निर्णय परीक्षा किये बिनाही इंद्रियोंकी इच्छानुसार आचरण करती रहती है, तबतक वह बुद्धि 'शुद्ध' नहीं कही जा सकती। अतएव बुद्धिको मन और इंद्रियोंके अधीन नहीं होने देना चाहिये। किंतु ऐसा उपाय करना चाहिये, कि जिससे मन और इंद्रियां बुद्धिके अधीन रहें। भगवद्गीता ( गीता २. ६७, ६८; ३. ७, ४१; ६. २४-२६ ) में यही सिद्धान्त अनेक स्थानोंमें बत- लाया गया है; और यही कारण है, कि कठोपनिषद्में शरीरको रथकी उपमा दी गई है; तथा यह रूपक बांधा गया है, कि उस शरीररूपी रथमें जुते हुए इंद्रियाँरूपी घोड़ोंको विषयभोगके मार्गमें अच्छी तरह चलानेके लिये ( व्यवसाया- त्मिका ) बुद्धिरूपी सारथीको मनोमय लगाम धीरतासे खींचे रहना चाहिये - ( कठ. ३. ३-९ )। महाभारत ( मभा. वन. २१०. २५; स्त्री. ७. १३; अश्व. ५१. ५ ) मेंभी वही रूपक दो-तीन स्थानोंमें कुछ हेरफे-के साथ लिया गया है। इंद्रियनिग्रहके इस कार्यका वर्णन करनेके लिये उक्त दृष्टान्त इतना अच्छा है, कि ग्रीसके प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता प्लेटोनेभी इंद्रियनिग्रहका वर्णन करते समय इसी

१४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रूपकका उपयोग अपने ग्रंथमें किया है (फीड्रस २४६)। भगवद्गीतामें, यह दृष्टान्त प्रत्यक्ष रूपसे नहीं पाया जाता। तथापि इस विषयके संदर्भकी ओर जो ध्यान देगा, उसे यह बात अवश्य मालूम हो जायगी, कि गीताके उपर्युक्त श्लोकोंमें इंद्रियनिग्रहका वर्णन इस दृष्टान्तको लक्ष्य करकेही किया गया है। सामान्यतः अर्थात् जब शास्त्रीय सूक्ष्म भेद करनेकी आवश्यकता होती है, तब उसीको मनोनिग्रह कहते हैं। परंतु जब 'मन' और 'बुद्धि'में - जैसा कि ऊपर कह आये हैं - भेद किया जाता है, तब निग्रह करनेका कार्य मनको नहीं, किंतु व्यवसाया- त्मिका बुद्धिकोही करना पड़ता है। इस व्यवसायात्मिका बुद्धिको शुद्ध करनेके लियं - पातंजल-योगकी समाधि से, भक्तिसे, ज्ञानसे अथवा ध्यानसे परमेश्वरके यथार्थ स्वरूपको पहचान कर - यह तत्त्व पूर्णतया बुद्धिमें जम जाना चाहिये, कि "सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है।" इसीको आत्मनिष्ठ बुद्धि कहते हैं। इस प्रकार जब व्यवसायात्मिका बुद्धि आत्मनिष्ठ हो जाती है और मनोनिग्रहकी सहा- यतासे मन और इंद्रियाँ उसकी अधीनतामें रह कर आज्ञानुसार आचरण करना सीख जाती हैं, तब इच्छा, वासना आदि मनोधर्म (अर्थात् वासनात्मक बुद्धि) आप-ही-आप शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं; और शुद्ध सात्त्विक कर्मोंकी ओर देहेंद्रि- योंकी सहजही प्रवृत्ति होने लगती है। अध्यात्म दृष्टिसे यही सब सदाचरणोंकी जड़ अर्थात् कर्मयोगशास्त्रका रहस्य है। ऊपर किये गये विवेचनसे पाठक समझ जावेंगे, कि हमारे शास्त्रकारोंने मन और बुद्धिकी स्वाभाविक वृत्तियोंके अतिरिक्त सदसद्विवेक-शक्तिरूप स्वतंत्र देवताका अस्तित्व क्यों नहीं माना है। उनके मतानुसारभी मन या बुद्धिका गौरव करनेके लिये उन्हें 'देवता' कहनेमें कोई हर्ज नहीं है; परंतु तात्त्विक दृष्टिसे विचार करके उन्होंने निश्चित सिद्धान्त किया है, कि जिसे हम मन या बुद्धि कहते हैं, उससे भिन्न और स्वयंभू 'सदसद्विवेक' नामक किसी तीसरे देवताका अस्तित्व होही नहीं सकता। "सतां हि सन्देहपदेषु०" वचनके 'सतां' पदकी उपयुक्तता और महत्ताभी अब भली भाँति प्रकट हो जाती है। जिनके मन शुद्ध और आत्म- निष्ठ हैं, वे यदि अपने अंतःकरणकी गवाही लें, तो कोई अनुचित बात न होगी; अथवा यहभी कहा जा सकता है, कि किसी कामको करनेके पहले उनके लिये यही उचित है, कि वे अपने मनको अच्छी तरह शुद्ध करके उसीकी गवाही लिया करें। परंतु यदि कोई धूर्त कहने लगे, कि "मैंभी इसी प्रकार आचरण करता हूँ" तो यह कदापि उचित न होगा। क्योंकि, दोनोंकी सदसद्विवेचन-शक्ति एकही-सी नहीं होती। सत्पुरुषोंकी बुद्धि सात्त्विक और चोरोंकी तामसी होती है। सारांश, आधिदैवत पक्षवालोंका 'सदसद्विवेक-देवता' तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे स्वतंत्र देवता सिद्ध नहीं होता; किंतु हमारे शास्त्रकारोंका सिद्धान्त है, कि वह तो व्यवसाया- त्मिका बुद्धिके स्वरूपोंहीमेंसे एक आत्मनिष्ठ अर्थात् सात्त्विक स्वरूप है। और जब

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १४३ यह सिद्धान्त स्थिर हो जाता है, तब आधिदैवत पक्ष अपने आपही कमज़ोर हो जाता है ! जब सिद्ध हो गया, कि आधिभौतिक-पक्ष एकदेशीय तथा अपूर्ण है; और आधिदैवत पक्षका सहल युक्तिवादभी किसी कामका नहीं, तब यह जानना आवश्यक है, कि कर्मयोगशास्त्रकी उपपत्ति ढूंढनेके लिये कोई अन्य मार्ग है या नहीं । और उत्तरभी यह मिलता है, कि हाँ, मार्ग है; और उसीको आध्यात्मिक मार्ग कहते हैं । इसका कारण यह है, कि यद्यपि बाह्य कर्मोंकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, तथापि जब सदसद्विवेक-बुद्धि नामक स्वतंत्र और स्वयंभू देवताका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता, तब कर्मयोगशास्त्रमेंभी इन प्रश्नोंका विचार करना आवश्यक हो जाता है, कि शुद्ध कर्म करनेके लिये बुद्धिको किस प्रकार शुद्ध रखना चाहिये ; शुद्ध बुद्धि किसे कहते हैं; अथवा बुद्धि किस प्रकार शुद्ध की जा सकती है । और यह विचार केवल बाह्य सृष्टिका विचार करनेवाले आधिभौतिकशास्त्रोंको छोड़े बिना तथा अध्यात्मज्ञानमें प्रवेश किये बिना पूर्ण नहीं हो सकता । इस विषयमें हमारे शास्त्रकारोंका अंतिम सिद्धान्त यही है, कि जिस बुद्धिको आत्माका अथवा परमे- श्वरके सर्वव्यापी यथार्थ स्वरूपका पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ है, वह बुद्धि शुद्ध नहीं है । गीतामें अध्यात्मशास्त्रका निरूपण यही बतलानेके लिये किया गया है, कि आत्म- निष्ठ बुद्धि किसे कहना चाहिये । परंतु इस पूर्वापर-संबंधकी ओर ध्यान न दे कर, गीताके कुछ सांप्रदायिक टीकाकारोंने यह निश्चय किया है, कि गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय वेदान्तही है । आगे चल कर यह बात विस्तारपूर्वक बतलाई जायगी, कि गीताके प्रतिपाद्य विषयके संबंधमें उक्त टीकाकारोंका यह निर्णय ठीक नहीं है । यहाँपर सिर्फ़ यही बतलाया है, कि बुद्धिको शुद्ध रखनेके लिये आत्माकाभी अवश्य विचार करना पड़ता है । आत्माके विषयमें यह विचार दो प्रकारोंसे किया जाता है :- (१) स्वयं अपने पिंड, क्षेत्र अथवा शरीरके और मनके व्यापारोंका निरीक्षण करके यह विवेचन करना, कि उस निरीक्षणसे क्षेत्रज्ञ- रूपी आत्मा कैसे उत्पन्न होता है ( गीता अ. १३ ) । इसीको शारीरक अथवा क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार कहते हैं; और इसी कारण वेदान्तसूत्रोंको शारीरक ( शरीरका विचार करनेवाले ) सूत्र कहते हैं । स्वयं अपने शरीर और मनका इस प्रकार विचार होनेपर, (२) यह जानना होगा कि उस विवेचनसे निष्पन्न होनेवाला तत्त्व – और हमारे चारों ओर की दृश्यसृष्टि अर्थात् ब्रह्मांडके निरीक्षणसे निष्पन्न होनेवाला तत्त्व – दोनों एकही हैं अथवा भिन्न भिन्न हैं । इस प्रकार किये गये सृष्टिके निरीक्षणको क्षर-अक्षर-विचार अथवा व्यक्त-अव्यक्त विचार कहते हैं । सृष्टिके सब नाशवान् पदार्थोंको 'क्षर' या 'व्यक्त' कहते हैं; और सृष्टिके उन नाशवान् पदार्थोंमें जो सारभूत नित्य तत्त्व है, उसे 'अक्षर' या 'अव्यक्त' कहते हैं ( गीता ८. २१; १५. १६ ) । क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार और क्षर-अक्षर-विचारसे प्राप्त होनेवाले

१४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इन दोनों तत्त्वोंका फिरसे विचार करने पर प्रकट होता है, कि ये दोनों तत्त्व जिससे निष्पन्न हुए हैं और इन दोनोंके परे जो सबका मूलभूत एकतत्त्व है, उसीको 'परमात्मा' अथवा 'पुरुषोत्तम' कहते हैं (गीता ८. २०) । इन बातोंका विचार भगवद्गीतामें किया गया है; और अंतमें कर्मयोगशास्त्रकी उपपत्ति बतलानेके लिये यह दिखलाया गया है, कि मूलभूत परमात्मरूपी तत्त्वके ज्ञानसे बुद्धि किस प्रकार शुद्ध हो जाती है । अतएव उस उपपत्तिका अच्छी तरह समझ लेनेके लिये हमेंभी उन्हीं मार्गोंका अनुकरण करना चाहिये । इन मार्गोंमेंसे ब्रह्मांड-ज्ञान अथवा क्षर-अक्षर-विचारका विवेचन अगले प्रकरणमें किया जायगा । इस प्रकरणमें, सदसद्विवेक-देवताके यथार्थ स्वरूपका निर्णय करनेके लिये, पिंड-ज्ञान अथवा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो विवेचन आरंभ किया गया था, वह अधूराही रह गया है । इसलिये अब उसे पूरा कर लेना चाहिये । पाँचभौतिक स्थूल देह, पाँच कर्मेंद्रियां, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, इन ज्ञानेंद्रियोंके शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंधात्मक पाँच विषय, संकल्प-विकल्पात्मक मन और व्यव- सायात्मिका बुद्धि - इन सब विषयोंका विवेचन हो चुका । परंतु, इतनेहीसे शरीर- संबंधी विचारकी पूर्णता हो नहीं जाती । मन और बुद्धि केवल विचारके साधन अथवा इंद्रियाँ हैं। यदि जड शरीरमें इनके अतिरिक्त प्राणरूपी चेतना अर्थात् हलचल न हो, तो मन और बुद्धिका होना न होना बराबरही - अर्थात् किसी कामका नहीं - समझा जायगा । अर्थात्, शरीरमें उपर्युक्त बातोंके अतिरिक्त चेतना नामक एक और तत्त्वका भी समावेश होना चाहिये । कई बार 'चेतना' शब्दका अर्थ 'चैतन्य' किया जाता है पर, यह ध्यान रखना चाहिये कि यहाँपर 'चेतना' शब्दका अर्थ 'चैतन्य' नहीं माना गया है; वरन् "जड़ देहमें दृग्गोचर होनेवाली प्राणोंकी हलचल, चेष्टा या जीवितावस्थाका व्यवहार" सिर्फ यही अर्थ विवक्षित है। जिस चिद्शक्तिके द्वारा जड़ पदार्थोंमेंभी हलचल अथवा व्यापार उत्पन्न हुआ करता है, उसको चैतन्य कहते हैं; और अब इसी शक्तिके विषयमें विचार करना है। शरीरमें दृग्गोचर होनेवाले सजीवताके व्यापार अथवा चेतनाके अतिरिक्त जिस कारण 'मेरा-तेरा' यह भेद उत्पन्न होता है, वहभी एक भिन्न गुण है। उसका कारण यह है, कि उपर्युक्त विवेचनके अनुसार बुद्धि सार-असारका विचार करके केवल निर्णय करनेवाली एक इंद्रिय है; अतएव 'मेरा-तेरा' इस भेद-भावके मूलको अर्थात् अहंकारको उस बुद्धिसे पृथकही मानना पड़ता है। इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख आदि द्वंद्व मनही के गुण हैं; परंतु नैयायिक इन्हें आत्माके गुण समझते हैं। इसीलिये इस भ्रमको हटानेके लिये वेदान्तशास्त्रने इसका समावेश मनहीं में किया है। इसी प्रकार जिन मूल तत्त्वोंसे पंचमहाभूत उत्पन्न हुए हैं, उन प्रकृतिरूप तत्त्वोंकाभी समावेश शरीरहीमें किया जाता है (गीता १३. ५, ६)। जिस शक्तिके द्वारा ये तत्त्व स्थिर रहते हैं, वहभी

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रज्ञविचार १४५ इन सबसे न्यारी है। उसे धृति कहते हैं (गीता १८. ३३)। इन सब बातोंको एकत्र करनेसे जो समुच्चय-रूपी पदार्थ बनता है, उसे शास्त्रोंमें सविकार शरीर अथवा क्षेत्र कहा है; और व्यवहारमें इसे चलता-फिरता (सविकार) मनुष्य शरीर अथवा पिंड कहते हैं। क्षेत्र शब्दकी यह व्याख्या गीताके आधारपर की गई है; परंतु इच्छा-द्वेष आदि गुणोंकी गणना करते समय कभी इस व्याख्यामें कुछ कुछ हेरफेरभी कर दिया जाता है। उदाहरणार्थ, शांति-पर्वके जनक-सुलभा- संवादमें (मभा. शां. ३२०) शरीरकी व्याख्या करते समय पंचकर्मेंद्रियोंके बदले काल, सदसद्भाव, विधि, शुक्र और बलका समावेश किया गया है। इस गणनाके अनुसार पंचकर्मेंद्रियोंको पंचमहाभूतोंहीमें शामिल करना पड़ता है; और यह मानना पड़ता है, कि गीताकी गणनाके अनुसार कालका अंतर्भाव आकाशमें और विधि-शुक्र-बल आदियोंका अंतर्भाव अन्य महाभूतोंमें अथवा प्रकृतिमें किया गया है। कुछभी हो; इसमें संदेह नही, कि क्षेत्र शब्दसे सब लोगोंको एकही अर्थ अभिप्रेत है। अर्थात्, मानसिक और शारीरिक सब द्रव्यों और गुणोंका प्राणरूपी विशिष्ट चेतनायुक्त जो समुदाय है, उसीको क्षेत्र कहते हैं। शरीर शब्दका उपयोग मृत देहके लियेभी किया जाता है, अतएव उस विषयका विचार करते समय 'क्षेत्र' शब्दहीका अधिक उपयोग किया जाता है; क्योंकि वह शरीर शब्दसे भिन्न है। 'क्षेत्र'का मूल अर्थ खेत है; परंतु प्रस्तुत प्रकरणमें 'सविकार और सजीव मनुष्य-देह' के अर्थमें उसका लाक्षणिक उपयोग किया गया है। पहले जिसे हमने 'बड़ा कारखाना' कहा है, वह यही "सविकार और सजीव मनुष्य देह" हैं। बाहरका माल इस कारखानेके भीतर लेनेके लिये और कारखानेके भीतरका माल बाहर भेजनेके लिये, ज्ञानेंद्रियाँ उस कारखानेके यथाक्रम द्वार हैं; और मन, बुद्धि, अहंकार एवं चेतना उस कारखानेमें काम करनेवाले नौकर हैं। ये नौकर जो कुछ व्यवहार कराते हैं या करते हैं, उन्हें इस क्षेत्रके व्यापार, विकार अथवा धर्म कहते हैं। इस प्रकार 'क्षेत्र' शब्दका अर्थ निश्चित हो जानेपर यह प्रश्न सहजही उठता है, कि यह क्षेत्र अथवा खेत है किसका ? इस कारखानेका कोई स्वामीभी है या नहीं ? आत्मा शब्दका उपयोग बहुधा मन, अंतःकरण तथा स्वयं अपने लियेभी किया जाता है। परंतु उसका प्रधान 'अर्थ' 'क्षेत्रज्ञ' अथवा "शरीरका स्वामी" ही है। मनुष्यके जितने व्यापार हुआ करते हैं - चाहे वे मानसिक हों या शारीरिक - वे सब उसकी बुद्धि आदि अंतरिंद्रियाँ, चक्षु आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा हस्त-पाद आदि कर्मेंद्रियांही किया करती हैं। इंद्रियोंके इस समूहमें बुद्धि और मन सबसे श्रेष्ठ हैं। परंतु, यद्यपि वे श्रेष्ठ हैं, तथापि अन्य इंद्रियोंके समान वेभी मूलतः जड़ देह वा प्रकृतिकेही विकार हैं (अगला प्रकरण देखो)। अतएव, यद्यपि मन और बुद्धि सर्वश्रेष्ठ हैं, तथापि उन्हें अपने अपने विशिष्ट व्यापारोंके गी. र. १०

१४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अतिरिक्त और कुछ करते धरते नहीं बनता; और कर सकना संभव भी नहीं है। यह सच है, कि मन चिंतन करता है और बुद्धि निश्चय करती है। परंतु इससे यह निर्णय नहीं होता कि इन कामोंको बुद्धि और मन किनके लिये करते हैं; अथवा भिन्न भिन्न समयपर मन और बुद्धिके जो पृथक् पृथक् व्यापार हुआ करते हैं, उनका एकत्र ज्ञान होनेके लिये जो एकता करनी पड़ती है, वह एकता या एकीकरण कौन करता है; तथा उसीके अनुसार आगे सब इंद्रियोंको अपना अपना व्यापार तदनुकूल करनेकी दिशा कौन दिखाता है? यह नहीं कहा जा सकता, कि यह सब काम मनुष्यका जड़ शरीरही किया करता है। इसका कारण यह है, कि जब शरीरकी चेतना अथवा हलचल करनेके सब व्यापार नष्ट हो जाते हैं, तब जड़ शरीरके बने रहने परभी वह इन कामोंको नहीं कर सकता; और जड़ शरीरके घटकावयव जैसे मांस, स्नायु इत्यादि तो अन्नके परिणाम हमेशा घिस जीर्ण होकर नित्य नये हो जाया करते हैं। इसलिये, “कल मैंने जिस अमुक एक बात देखी थी, वही मैं आज दूसरी देख रहा हूँ” इस प्रकारकी एकत्व-बुद्धिके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता, कि वह नित्य बदलने- वाले जड़ शरीरकाही धर्म है। अच्छा; अब जड़ देह छोड़कर चेतनाकोही स्वामी मानें, तो यह आपत्ति दीख पड़ती है, कि गाढ निद्रामें प्राणादि वायुके श्वासोच्छ्वास प्रभृति व्यापार अथवा रुधिराभिसरण आदि व्यापार — अर्थात् चेतना — के स्थिर रहते हुएभी, 'मैं'का ज्ञान नहीं रहता (बृ. २. १. १५-१८)। अतएव यह सिद्ध होता है, कि चेतना — अथवा प्राण प्रभृतिका व्यापार — भी जड़ पदार्थमें उत्पन्न एक प्रकारका विशिष्ट गुण है और वह इंद्रियोंके सब व्यापारोंकी एकता करनेवाली मूल शक्ति या स्वामी नहीं है (कठ. ५. ५)। 'मेरा' और 'पराया' इन संबंधकारक शब्दोंसे केवल अहंकाररूपी गुणका बोध होता है; परंतु इस बातका निर्णय नहीं होता, कि 'अहं' अर्थात् 'मैं' कौन हूँ। यदि इस 'मैं' या 'अहं'को केवल भ्रम मान लें, तो प्रत्येककी प्रतीति अथवा अनुभव वैसा नहीं है; और इस अनुभवको छोड़ कर किसी अन्य बातकी कल्पना करना मानों श्रीसमर्थ रामदास स्वामीके निम्न वचनोंकी सार्थकताही कर दिखाना है — “प्रतीतिके बिना कोईभी कथन अच्छा नहीं लगता। वह कथन ऐसा होता है, जैसे कुत्ता मूंह फैला कर रो गया हो!” (दा. ९. ५. १५)। उक्त अनुभवके विपरीत किसी बातको मान लेनेपरभी इंद्रियोंके व्यापारोंकी एकताकी उपपत्तिका कुछभी पता नहीं लगता। कई लोंगोंकी राय है, कि 'मैं' कोई भिन्न पदार्थ नहीं है, 'क्षेत्र' शब्दमें जिन — मन, बुद्धि, चेतना, जड़ देह आदि — तत्त्वोंका समावेश किया जाता है, उन सबके संघात या समुच्चयकोही 'मैं' कहना चाहिये। पर यह बात हम प्रत्यक्ष देखा करते हैं, कि लकड़ीपर लकड़ी रख देनेसेही संदूक नहीं बन जाता; अथवा किसी घड़ीके सब कील-पुर्जोंको एक स्थानमें रख देनेसेही उनमें गति उत्पन्न

नहीं हो जाती । अतएव यह नहीं कहा जा सकता, कि केवल संघात या समुच्चयसेही कर्तृत्व उत्पन्न होता है। कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि क्षेत्रके सब व्यापार योंही - सिड़ी सरीखे नहीं होते । किंतु उनमें कोई विशिष्ट दिशा, उद्देश्य या हेतु रहता है। तो फिर इस क्षेत्ररूपी कारखानेमें काम करनेवाले मन, बुद्धि आदि सब नौकरोंको इस विशिष्ट दिशा या उद्देश्यकी ओर कौन प्रवृत्त करता है ? संघातका अर्थ केवल समूह है। सब पदार्थोंको एकत्र करके उनके जोड़नेके लिये उनमें धागा डालना पड़ता है, नहीं तो वे फिर कभी-न-कभी अलग हो जायेंगे। अब हमें सोचना चाहिये, कि यह धागा कौन-सा है ? यह बात नही है, कि गीताको संघात मान्य न हो; परंतु उसकी गणना क्षेत्रहीमें की जाती है ( गीता १३. ६) । संघातसे इस बातका निर्णय नहीं होता, कि क्षेत्रका स्वामी अर्थात् क्षेत्रज्ञ कौन है। कुछ लोग समते हैं, कि समुच्चयमें कोई नया गुण उत्पन्न हो जाता है। परंतु पहले तो यह मतही सत्य नहीं; क्योंकि तत्त्वज्ञोंने पूर्ण विचार करके सिद्धान्त कर दिया है, कि जो पहले किसीभी रूपमें अस्तित्वमें नहीं था, वह इस जगतमें नया उत्पन्न नहीं होता ( गीता २. १६) । यदि हम इस सिद्धान्तको क्षणभरके लिये एक ओर धर दें, तोभी यह प्रश्न सहजही उपस्थित हो जाता है, कि संघातमें उत्पन्न होने- वाला यह नया गुणही क्षेत्रका स्वामी क्यों न माना जाय। इसपर कई अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंका कथन है, कि द्रव्य और उसके गुण भिन्न भिन्न नहीं रह सकते; गुणके लिये किसी-न-किसी अधिष्ठानकी आवश्यकता होती है। इसी कारण समुच्चयोत्पन्न गुणके बदले हम समुच्चयहीको उस क्षेत्रका स्वामी मानते हैं। ठीक है; परंतु व्यवहारमेंभी 'अग्नि' शब्दके बदले लकड़ी, 'विद्युत्'के बदले मेघ, अथवा पृथ्वीकी 'आकर्षण-शक्ति'के बदले पृथ्वीही क्यों नहीं कहा जाता ? यदि यह बात निर्विवाद सिद्ध है, कि क्षेत्रके सब व्यापार व्यवस्थापूर्वक और उचित रीतिसे मिल-जुलकर चलते रहनेके लिये - मन और बुद्धिके सिवा - किसी भिन्न शक्तिका अस्तित्व अत्यंत आवश्यक है। और यदि यह बात सच हो, कि उस शक्तिका अधिष्ठान अबतक हमारे लिये अगम्य है; अथवा उस शक्ति या अधिष्ठानका पूर्ण-स्वरूप ठीक ठीक नहीं बतलाया जा सकता है; तो यह कहना न्यायोचित कैसे हो सकता है, कि वह शक्ति हैही नहीं ? जैसे कोईभी मनुष्य अपनेही कंधेपर बैठ नहीं सकता, वैसेही यहभी नहीं कहा जा सकता, कि संघातसंबंधी ज्ञान स्वयं संघातही प्राप्त कर लेता है। अतएव तर्ककी दृष्टिसेभी यही दृढ़ अनुमान किया जाता है, कि देहेंद्रिय आदि संघातके व्यापार जिसके उपभोग लाभके लिये हुआ करते हैं, वह संघातसे भिन्नही है। यह तत्त्व - जो कि संघातसे भिन्न है - स्वयं सब बातोंको जानता है। इसलिये यह बात सच है, कि सृष्टिके अन्य पदार्थोंके सदृश्य यह स्वयं अपनेही लिये 'ज्ञेय' अर्थात् गोचर हो नहीं सकता। परंतु उससे इसके अस्तित्वमें कुछ बाधा नहीं पड़

१४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सकती। क्योंकि यह नियम नहीं है, कि सब पदार्थोंको एकही श्रेणी या वर्ग - जैसे ज्ञेय - में शामिल कर देना चाहिये। सब पदार्थोंके दो वर्ग या विभाग होते हैं; जैसे ज्ञाता और ज्ञेय - अर्थात् जाननेवाला और जाननेकी वस्तु। और जब कोई वस्तु दूसरे वर्ग (ज्ञेय) में शामिल नहीं होती, तब उसका समावेश पहले वर्ग (ज्ञाता) में हो जाता है। एवं उसका अस्तित्वभी ज्ञेय वस्तुके समानही पूर्णतया सिद्ध होता है। इतनाही नहीं; किंतु यहभी कहा जा सकता है, कि संघातके परे जो आत्म- तत्त्व है, वह स्वयं ज्ञाता है। इसलिये उसको होनेवाले ज्ञानका यदि वह स्वयं विषय न हो, तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। इसी अभिप्रायसे बृहदारण्यकोपनिषदमें याज्ञवल्क्यने कहा है, "अरे! जो सब बातोंको जानता है, उसको जाननेवाला दूसरा कहाँसे आ सकता है?" - विज्ञातारमरे केन विजानीयात् (बृ. २. ४. १४)। अतएव, अंतमें यही सिद्धान्त कहना पड़ता है, कि इस चेतना-विशिष्ट सजीव शरीर अर्थात् क्षेत्रमें एक ऐसी शक्ति रहती है, जो हाथ-पैर आदि इंद्रियोंसे लेकर प्राण, चेतना, मन और बुद्धि जैसे परतंत्र एवं एकदेशीय नौकरोंकेभी परे है, और जो उन सबके व्यापारोंकी एकता करती है, और उनके कार्योंकी दिशा बतलाती है; अथवा जो उनके कर्मोंकी नित्य साक्षी रहकर उनसे भिन्न अधिक व्यापक और समर्थ है। सांख्य और वेदान्तशास्त्रोंको यह सिद्धान्त मान्य है; और अर्वाचीन समयमें जर्मन तत्त्वज्ञ कांटनेभी कहा है, कि बुद्धिके व्यापारोंका सूक्ष्म परीक्षण करनेसे यही तत्त्व निष्पन्न होता है। मन, बुद्धि, अहंकार और चेतना, ये सब शरीरके अर्थात् क्षेत्रके गुण अथवा अवयव हैं। इनका प्रवर्तक उससे भिन्न, स्वतंत्र और उसके परे है - "यो बुद्धेः परतस्तु सः" (गीता ३. ४२)। सांख्य- शास्त्रमें इसीका नाम पुरुष है। वेदान्ती इसीको क्षेत्रज्ञ अर्थात् क्षेत्रको जाननेवाला आत्मा कहते हैं। "मैं हूँ" यह प्रत्येक मनुष्यको होनेवाली उसकी प्रतीतिही उस आत्माके अस्तित्वका सर्वोत्तम प्रमाण है (वे. सू. शां. भा. ३. ३. ५३, ५४)। किसीको यह नहीं मालूम होता, कि "मैं नहीं हूँ"! इतनाही नहीं; किंतु मुखसे "मैं नहीं हूँ" शब्दोंका उच्चारण करते समयभी "नहीं हूँ" इस क्रियापदके कर्ताका - अर्थात् 'मैं'का - अथवा आत्माका अस्तित्व वह प्रत्यक्ष रीतिसे मानाही करता है। इस प्रकार 'मैं' इस अहंकारयुक्त सगुण रूपसे शरीरमें, स्वयं अपनेहीको व्यक्त होनेवाले आत्मतत्त्वके अर्थात् क्षेत्रज्ञके असली, शुद्ध और गुणविरहित स्वरूपका यथाशक्ति निर्णय करनेके लियेही वेदान्तशास्त्रकी उत्पत्ति हुई है। (गीता १३. ४)। तथापि यह निर्णय केवल शरीर अर्थात् क्षेत्रकाही विचार करके नहीं किया जाता। पहले कहा जा चुका है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विचारके अतिरिक्त यहभी सोचना पड़ता है, कि बाह्यसृष्टि अर्थात् ब्रह्मांडका विचार करनेसे कौन-सा तत्त्व निष्पन्न होता है। ब्रह्मांडके इस विचारकाही नाम 'क्षर-अक्षर-विचार' है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारसे इस बातका निर्णय होता है, कि क्षेत्रमें (अर्थात् शरीर

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १४९ या पिंडमें) कौन-सा मूलतत्त्व (क्षेत्रज्ञ या आत्मा) है; और क्षर-अक्षर-विचारसे बाह्य सृष्टिके अर्थात् ब्रह्मांडके मूल तत्त्वका ज्ञान होता है। जब इस प्रकार पिंड और ब्रह्मांडके मूल तत्त्वोंका पहले पृथक् पृथक् निर्णय हो जाता है, (आगे अधिक विचार किया जाएगा), वेदान्तशास्त्रमें यह सिद्धान्त किया जाता है,* कि ये दोनों तत्त्व एकरूप अर्थात् एकही हैं-यानी "जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमें है। यही चराचर सृष्टिका अंतिम सत्य है।" पश्चिमी देशोंमेंभी इन बातोंकी चर्चा की गई है; औट कांट जैसे कुछ पश्चिमी तत्त्वज्ञोंके सिद्धान्त हमारे वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तोंसे बहुत कुछ मिलते-जुलतेभी हैं-जब हम इस बातपर ध्यान देते हैं, और जब हम यहभी देखते हैं, कि वर्तमान समयकी नाईं प्राचीन कालमें आधि- भौतिक शास्त्रकी उन्नति नहीं हुई थी; तब ऐसी अवस्थामें जिन लोगोंने अपनी अंतर्दृष्टिसे वेदान्तके अपूर्व सिद्धान्तोंको ढूंढ निकाला, उनके अलौकिक बुद्धिवैभवके बारेमें आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। और केवल आश्चर्यही नहीं होना चाहिये, किंतु हमें उनपर उचित अभिमानभी होना चाहिये।

  • हमारे शास्त्रोंके क्षर-अक्षर-विचार और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारके वर्गीकरणसे ग्रीनसाहब परिचित न थे। तथापि, उन्होंने अपने Prolegomena to Ethics ग्रंथके आरंभमें अध्यात्मका जो विवेचन किया है, उसमें पहले Spiritual Principle in Nature और Spiritual Principle in Man इन दोनों तत्त्वोंका विचार किया है और फिर उनकी एकता दिखाई है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें Psychology आदि मानस- शास्त्रोंका, और क्षर-अक्षर-विचारमें Physics, Metaphysics आदि शास्त्रोंका समावेश होता हैँ। इस बातको पश्चिमी पंडितभी मानते हैं, कि उक्त सब शास्त्रोंका विचार कर लेनेपरही आत्मस्वरूपका निर्णय करना पड़ता है।

सातवाँ प्रकरण कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । * — गीता १३. १९ पिछले प्रकरणमें यह बात बतला दी गई है, कि शरीर और शरीरके स्वामी या अधिष्ठाता – क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ – के विचारके साथही साथ दृश्य सृष्टि और उसके मूलतत्त्व – क्षर और अक्षर – काभी विचार करनेके पश्चात् फिर आत्माके स्वरूपका निर्णय करना पड़ता है। इस क्षर-अक्षर सृष्टिका योग्य रीतिसे वर्णन करनेवाले तीन शास्त्र हैं। पहला न्यायशास्त्र और दूसरा कापिलसांख्य- शास्त्र । परंतु इन दोनों शास्त्रोंके सिद्धान्तोंको अपूर्ण ठहरा कर वेदान्तशास्त्रने ब्रह्म- स्वरूपका निर्णय एक तीसरीही रीतिसे किया है। इस कारण वेदान्तप्रतिपादित उपपत्तिका विचार करनेके पहले हमें न्याय और सांख्यशास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर विचार करना चाहिये । बादरायणाचार्यके वेदान्तसूत्रोंमें इसी पद्धतिसे काम लिया गया है; और न्याय तथा सांख्यके मतोंका दूसरे अध्यायमें खंडन किया गया है। यद्यपि इस विषयका यहाँपर विस्तृत वर्णन नहीं कर सकते, तथापि हमने उन बातोंका उल्लेख इस प्रकरणमें और अगले प्रकरणमें स्पष्ट कर दिया है, जिनकी भगवद्गीताका रहस्य समझनेमें आवश्यकता है। नैयायिकोंके सिद्धान्तोंकी अपेक्षा सांख्यवादियोंके सिद्धान्त अधिक महत्त्वके हैं। इसका कारण यह है, कि कणादके न्यायमतोंको किसीभी प्रमुख वेदान्ती ने स्वीकार नहीं किया है, परंतु कापिलसांख्यशास्त्रके बहुतसे सिद्धान्तोंका उल्लेख मनु आदिके स्मृति- ग्रंथोंमें तथा गीतामेंभी पाया जाता है। यही बात बादरायणाचार्यनेभी (वे. सू. २. १. १२ और २. २. १७) कही है। इस कारण पाठकोंको सांख्यके सिद्धान्तोंका परिचय प्रथमही होना चाहिये । इसमें संदेह नहीं, कि वेदान्तमें सांख्यशास्त्रके बहुतसे सिद्धान्त पाये जाते हैं; परंतु स्मरण रहे, कि सांख्य और वेदान्तके अंतिम सिद्धान्त एक दूसरेसे बहुत भिन्न हैं। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है, कि वेदान्त और सांख्यके जो सिद्धान्त आपसमें मिलते जुलते हैं, उन्हें पहले किसने निकाला था – वेदान्तियोंने या सांख्यवादियोंने ? परंतु इस ग्रंथमे इतने गहन विचारमें प्रवेश करनेकी आवश्यकता नहीं। फिरभी इस प्रश्नका उत्तर तीन प्रकारसे दिया

  • "प्रकृति और पुरुष दोनोंको अनादि जानो।"

कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५१ जा सकता है। पहला यह, कि शायद उपनिषद् (वेदान्त) और सांख्य दोनोंकी वृद्धि, दो सगे भाइयोंके समान, साथही साथ हुई हो; और उपनिषदोंमें जो सिद्धान्त सांख्योंके मतोंके समान दीख पड़ते हैं, उन्हें उपनिषत्कारोंने स्वतंत्र रीतिसे खोज निकाला हो। दूसरा यह, कि कदाचित् कुछ सिद्धान्त सांख्यशास्त्रसे लेकर वेदान्तियोंने उन्हें वेदान्तके अनुकूल स्वरूप दे दिया हो। तीसरा यह कि प्राचीन वेदान्तके सिद्धान्तोंमेंही कपिलाचार्यने अपने मतके अनुसार कुछ परिवर्तन और सुधार करके सांख्यशास्त्रकी उपपत्ति कर दी हो। इन तीनोंमेंसे तीसरी बातही अधिक विश्वसनीय ज्ञात होती है; क्योंकि, यद्यपि वेदान्त और सांख्य दोनों बहुत प्राचीन हैं, तथापि उनमें वेदान्त या उपनिषद् सांख्यसेभी अधिक प्राचीन ( श्रौत ) है। अस्तु; यदि पहले हम न्याय और सांख्यके सिद्धान्तोंको अच्छी तरह समझ लें तो फिर वेदान्तके - विशेषतः गीता-प्रतिपादित वेदान्तके - तत्त्व जल्दी समझमें आ जायेंगें । इसलिये पहले हमें इस बातका विचार करना चाहिये, कि इन दो स्मार्त शास्त्रोंका, क्षर-अक्षर-सृष्टिकी रचनाके विषयमें क्या मत है। बहुतेरे लोक न्यायशास्त्रका यही उपयोग समझते हैं, कि किसी विवक्षित अथवा गृहीत बातसे तर्कके द्वारा कौन-कौन-से अनुमान निकाले जावें और कैसे ? और यह निर्णय कैसे किया जावें, कि इन अनुमानोंमेंसे कौन-से सही हैं और कौन-से गलत हैं। परंतु यह भूल है। अनुमानादि प्रमाणखंड न्यायशास्त्रका एक भाग है सही; पर क्यों ? परंतु यही उसका प्रधान विषय नहीं है, तो प्रमाणोंके अतिरिक्त, सृष्टिकी अनेक वस्तुओंका यानी प्रमेय पदार्थोंका वर्गीकरण करके नीचेके वर्गसे ऊपरके वर्गकी ओर चढ़ते जानेसे सृष्टिके सब पदार्थोंके मूल वर्ग कितने हैं, उनके गुण-धर्म क्या हैं, उनसे अन्य पदार्थोंकी उत्पत्ति कैसे हुई है, और ये बातें किस प्रकार सिद्ध हो सकती हैं, इत्यादि अनेक प्रश्नोंकाभी विचार न्यायशास्त्रमें किया गया है। अतः यही कहना उचित होगा, कि यह शास्त्र केवल अनुमानखंडका विचार करनेके लिये नहीं; वरन् उक्त प्रश्नोंका विचार करनेहीके लिये निर्माण किया गया है। कणादके न्यायसूत्रोंका आरंभ और आगेकी रचनाभी इसी प्रकारकी है। कणादके अनुयायियोंको कणाद कहते हैं। इन दोनोंका कहना है, कि जगतका मूल कारण परमाणुही है। परमाणुके विषयमें कणादकी और पश्चिमी भौतिक- शास्त्रज्ञोंकी व्याख्या एक-सी समानही है। किसीभी पदार्थका विभाग करते करते अंतमें जब विभाग नहीं हो सकता, तब उसे परमाणु (आधिपरम + अणु) कहना चाहिये। जैसे जैसे ये परमाणु एकत्र होते जाते हैं, वैसे वैसे संयोगके कारण उनमें नये नये गुण उत्पन्न होते हैं; और भिन्न भिन्न पदार्थ बनते जाते हैं। मन और शरीरकेभी परमाणु होते हैं; और जब वे एकत्र होते हैं तब चैतन्यकी उत्पत्ति होती है। पृथ्वी, जल, तेज और वायुके परमाणु स्वभावहीसे पृथक् पृथक् हैं। पृथ्वीके मूलपरमाणुमें चार गुण ( रूप, रस, गंध, स्पर्श ) हैं;

१५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पानीके परमाणुमें तीन गुण हैं, तेजके परमाणुमें दो गुण हैं और वायुके परमाणुमें एकही गुण है। इस प्रकार सब जगत् पहलेसेही सूक्ष्म और नित्य परमाणुओंमे भरा हुआ है। परमाणुओंके सिवा संसारका मूल कारण और कुछभी नहीं है। जब सूक्ष्म और नित्य परमाणुओंके परस्पर संयोगका 'आरंभ' होता है, तब सृष्टिके व्यक्त पदार्थ बनने लगते हैं। नैयायिकों द्वारा प्रतिपादित व्यक्त सृष्टिकी उत्पत्तिके संबंधकी इस कल्पनाको 'आरंभ-वाद' कहते हैं और कुछ नैयायिक इसके आगे कभी नहीं बढ़ते । एक नैयायिकके बारेमें कहा जाता है, कि मृत्युके समय जब उससे ईश्वरका नाम लेनेको कहा गया, तब वह “पीलवः ! पीलवः ! पीलवः ! ” - परमाणु ! परमाणु ! परमाणु ! - चिल्ला उठा । तथापि, कुछ दूसरे नैयायिक यह मानते हैं, कि परमाणुओंके संयोगका निमित्तकारण ईश्वर है ! इस प्रकार वे सृष्टिकी कारण-परंपराकी शृंखलाको पूर्ण कर लेते हैं। ऐसे नैयायिकोंको 'सेश्वर' कहते हैं। वेदान्तसूत्रके दूसरे अध्यायके दूसरे पादमें इस परमाणुवादका ( २. २. ११-१७ ) और इसके साथही साथ “ ईश्वर केवल निमित्तकारण है ” इस मतकाभी ( २. २. ३७-३९ ) खंडन किया गया है। उल्लिखित परमाणुवादका वर्णन पढ़कर अंग्रेजी पढ़े-लिखे पाठकोंको अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञ डाल्टनके परमाणुवादका अवश्यही स्मरण होगा । परंतु पश्चिमी देशोंमें प्रसिद्ध सृष्टिशास्त्रज्ञ डार्विनके उत्क्रान्तिवादने जिस प्रकार डाल्टनके परमाणुवादकी जड़ही उखाड़ दी है, उसी प्रकार हमारे देशमेंभी प्राचीन समयमें सांख्य-मतने कणादके मतकी बुनियाद हिला डाली थी। कणाद और उसके अनुयायी यह नहीं बतला सकते, कि मूल परमाणुको गति कैसे मिली। इसके अतिरिक्त वे लोग इस बातकाभी यथोचित निर्णय नहीं कर सकते, कि वृक्ष, पशु, मनुष्य इत्यादि सचेतन प्राणियोंकी क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियाँ कैसे बनी; और अचेतनको सचेतनता कैसे प्राप्त हुई। यह निर्णय पश्चिमी देशोंमें उन्नीसवी सदीमें लामार्क और डार्विनने, तथा हमारे यहाँ प्राचीन समयमें कपिलमुनिने किया है। दोनों मतोंका यही तात्पर्य है, कि एकही मूलपदार्थके गुणोंका विकास हुआ; और फिर धीरे धीरे सब सृष्टिकी रचना होती गई। इस कारण पहले हिंदुस्थानमें, और अब सब पश्चिमी देशोंमेंभी, परमाणुवादपर विश्वास नहीं रहा है। अब तो आधुनिक पदार्थशास्त्रज्ञोंने यहभी सिद्ध कर दिखाया है, कि परमाणु आविभाज्य नहीं हैं। आजकल जैसे सृष्टिके अनेक पदार्थोंका पृथक्करण और परीक्षण करके अनेक सृष्टिशास्त्रोंके आधारपर परमाणुवाद या उत्क्रांतिवादको सिद्ध कर दे सकते हैं, वैसे प्राचीन समयमें नहीं कर सकते थे। सृष्टिके पदार्थोंपर नये नये और भिन्न भिन्न प्रयोग करना, अथवा अनेक प्रकारसे उनका पृथक्करण करके गुण-धर्म निश्चित करना, या सजीव सृष्टिके नये पुराने अनेक प्राणियोंके शारीरिक अवयवोंकी एकत्र तुलना करना इत्यादि आधिभौतिक शास्त्रोंकी अर्वाचीन युक्तियाँ

कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५३ कणाद या कपिलको मालूम नहीं थीं। उस समय उनकी दृष्टिके सामने जितनी सामग्री थी, उसीके आधारपर उन्होंने अपने अपने सिद्धान्त ढूंढ निकाले हैं। तथापि, यह आश्चर्यकी बात है, कि सृष्टिकी वृद्धि और उसकी घटनाके विषयमें सांख्य- शास्त्रकारोंके तात्त्विक सिद्धान्तमें और अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रकारोंके तात्त्विक सिद्धान्तमें, बहुत-सा भेद नहीं है। इसमें संदेह नहीं, कि सृष्टिशास्त्रके ज्ञानकी वृद्धिके कारण वर्तमान समयमें इस मतकी आधिभौतिक उपपत्तिका वर्णन अधिक नियमबद्ध प्रणालीसे किया जा सकता है; और आधिभौतिक ज्ञानकी वृद्धिके कारण हमें व्यवहारकी दृष्टिसेभी बहुत लाभ हुआ है। परंतु आधि- भौतिक शास्त्रकारभी "एकही अव्यक्त प्रकृतिसे अनेक प्रकारकी व्यक्त सृष्टि कैसे हुई" इस विषयमें कपिलकी अपेक्षा कुछ अधिक नहीं बतला सकते। इस बातको भली भांति समझा देनेके लियेही हमने आगे चल कर, बीचमें स्थान-स्थान- पर, कपिलके सिद्धान्तोंके साथ साथ, हेकेलके सिद्धान्तोंकाभी, तुलनाके लिये संक्षिप्त वर्णन किया है। हेकेलने अपने ग्रंथमें साफ साफ़ लिख दिया है, कि मैंने ये सिद्धान्त कुछ नये सिरेसे नहीं खोजे हैं; वरन्, डार्विन, स्पेन्सर इत्यादि पिछले आधिभौतिक पंडितोंके ग्रंथोंके आधारसेही मैं अपने सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करता हूँ। तथापि पहले पहल उसीने इन सब सिद्धान्तोंको ठीक ठीक नियमानुसार लिख कर सरलतापूर्वक इनका एकत्र वर्णन "विश्वको पहेली"* नामक ग्रंथमें किया है। इस कारण, सुभीतेके लिये, हमने उसीही सब आधिभौतिक तत्त्वज्ञोंका मुखिया माना है; और उसीके मतोंका इस प्रकरणमें तथा अगले प्रकरणमें विशेष उल्लेख किया है। कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि यह उल्लेख बहुतही संक्षिप्त है; परंतु इससे अधिक इन सिद्धान्तोंका विवेचन इस ग्रंथमें नहीं किया जा सकता। जिन्हें इस विषयका विस्तृत वर्णन पढ़ना हो, उन्हें स्पेन्सर, डार्विन, हेकेल आदि पंडितोंके मूल ग्रंथोंका अवलोकन करना चाहिये। कपिलके सांख्यशास्त्रका विचार करनेके पहले यह कह देना उचित होगा, कि 'सांख्य' शब्दके दो भिन्न भिन्न अर्थ होते हैं। पहला अर्थ कपिलाचार्य द्वारा प्रतिपादित 'सांख्यशास्त्र' है। उसीका उल्लेख इस प्रकरणमें, तथा एक बार भगवद्- गीता (गीता १८. १३) मेंभी किया गया है। परंतु इस विशिष्ट अर्थके सिवा सब प्रकारके तत्त्वज्ञानकोभी सामान्यतः 'सांख्य'ही कहनेकी परिपाटी है; और इसी 'सांख्य' शब्दमें वेदान्तशास्त्रकाभी समावेश होता है। 'सांख्यनिष्ठा'। अथवा 'सांख्ययोग' शब्दोंमें 'सांख्य'का यही सामान्य अर्थ अभीष्ट है। इस निष्ठाके ज्ञानी पुरुषोंकोभी भगवद्गीतामें जहाँ (गीता २. ३९; ३. ३; ५. ४, ५; और १३. २४)

  • The Riddle of the Universe, by Ernst Haeckel इस ग्रंथकी R. P. A. Cheap reprint आवृत्तिकाही हमने सर्वत्र उपयोग किया है।

१५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'सांख्य' कहा है, वहाँ सांख्यका अर्थ केवल कापिल सांख्यमार्गीही नहीं है; वरन् उसमें, आत्म-अनात्म-विचारसे सब कर्मोंका संन्यास करके ब्रह्मज्ञानहीमें निमग्न रहनेवाले वेदान्तियोंकाभी समावेश किया जाता है। शब्दशास्त्रज्ञोंका कथन है, कि 'सांख्य' शब्द 'संख्या' धातुसे बना है। इसलिये इसका पहला अर्थ 'गिननेवाला' है, और कापिलशास्त्रके मूल तत्त्व इनेगिने 'पचीस' ही हैं। इसलिये उन्हें 'गिननेवालेके' अर्थमें यह विशिष्ट 'सांख्य' नाम पहले दिया गया। अनंतर 'सांख्य' शब्दका अर्थ बहुत व्यापक हो गया; और उसमें सब प्रकारके तत्त्वज्ञानका समावेश होने लगा। यही कारण है, कि जब पहले पहल कापिल - भिक्षुओंको 'सांख्य' कहनेकी परिपाटी प्रचलित हो गई, तब वेदान्ती संन्यासियोंकोभी यही नाम दिया जाने लगा होगा। कुछभी हो; इस प्रकरणका, हमने जानबूझकर, यह लंबा-चौड़ा 'कापिलसांख्यशास्त्र' नाम इसलिये रखा है, कि सांख्य शब्दके उक्त अर्थभेदके कारण कुछ गड़बड़ी न हो। कापिलसांख्यशास्त्रमेंभी कणादके न्यायशास्त्रके समान सूत्र हैं। परंतु गौडपादाचार्य या शारीर-भाष्यकार श्री शंकराचार्यने इन सूत्रोंका आधार अपने ग्रंथोंमें नहीं लिया है। इसलिये बहुतेरे विद्वान् समझते हैं, कि ये सूत्र कदाचित् प्राचीन न हों। ईश्वरकृष्णकी 'सांख्यकारिका' उक्त सूत्रोंसे प्राचीन मानी जाती है; और उसपर श्री शंकराचार्यके दादागुरु गौडपादने भाष्य लिखा है। शांकर-भाष्यमेंभी इसी कारिकाके कुछ अवतरण लिये हैं। सन ५७० ईसवीसे पहले इस ग्रंथका जो अनुवाद चीनी भाषामें हुआ था, वह इस समय उपलब्ध है।* ईश्वरकृष्णने अपनी 'कारिका'के अंतमें कहा है, कि 'षष्टितंत्र' नामक साठ प्रकरणोंके एक प्राचीन और विस्तृत ग्रंथका भावार्थ (कुछ प्रकरणोंको छोड़) सत्तर आर्या-पद्योंमें इस ग्रंथमें दिया गया है। यह षष्टितंत्र ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है। इसीलिये उन कारिकाओंके आधारपरही कापिल- सांख्यशास्त्रके मूल सिद्धान्तोंका विवेचन हमने यहाँ किया है। महाभारतमें सांख्य- * अब बौद्ध ग्रंथोंसे ईश्वरकृष्णका बहुत कुछ हाल जाना जा सकता है। बौद्ध पंडित वसुबंधुका गुरु ईश्वरकृष्णका समकालीन प्रतिपक्षी था। वसुबंधुका जो जीवन चरित, परमार्थने (सन ई. ४९९-५६९ में) चीनी भाषामें लिखा था, वह अब प्रकाशित हुआ है। इसमे डॉक्टर टककमूने यह अनुमान किया है, कि ईश्वरकृष्णका समय सन ४५० ई. के लगभग है। Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain & Ireland, 1905, pp. 33-53. परंतु डॉक्टर विन्सेंट स्मिथकी राय है कि, स्वयं वमुबंधुका समयही चौथी सदीमें (लगभग २८०-३६०) होना चाहिये। क्योंकि उसके ग्रंथोंका अनुवाद सन ४०४ ईसवीमें चीनी भाषामें हुआ है। वमुबंधुका समय इस प्रकार जब पीछे हट जाता है, तब उसी प्रकार ईश्वरकृष्णका समयभी करीब २०० वर्ष पीछे हटाना पड़ता है; अर्थात् सन २६० ईसवीके लगभग ईश्वरकृष्णका समय आ पहुँचता है। Vincent Smith's Early History of India, 3rd. Ed., P. 328.