श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र इन दोनों तत्त्वोंका फिरसे विचार करने पर प्रकट होता है, कि ये दोनों तत्त्व जिससे निष्पन्न हुए हैं और इन दोनोंके परे जो सबका मूलभूत एकतत्त्व है, उसीको 'परमात्मा' अथवा 'पुरुषोत्तम' कहते हैं (गीता ८. २०) । इन बातोंका विचार भगवद्गीतामें किया गया है; और अंतमें कर्मयोगशास्त्रकी उपपत्ति बतलानेके लिये यह दिखलाया गया है, कि मूलभूत परमात्मरूपी तत्त्वके ज्ञानसे बुद्धि किस प्रकार शुद्ध हो जाती है । अतएव उस उपपत्तिका अच्छी तरह समझ लेनेके लिये हमेंभी उन्हीं मार्गोंका अनुकरण करना चाहिये । इन मार्गोंमेंसे ब्रह्मांड-ज्ञान अथवा क्षर-अक्षर-विचारका विवेचन अगले प्रकरणमें किया जायगा । इस प्रकरणमें, सदसद्विवेक-देवताके यथार्थ स्वरूपका निर्णय करनेके लिये, पिंड-ज्ञान अथवा क्षेत्र-क्षेत्रज्ञका जो विवेचन आरंभ किया गया था, वह अधूराही रह गया है । इसलिये अब उसे पूरा कर लेना चाहिये । पाँचभौतिक स्थूल देह, पाँच कर्मेंद्रियां, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, इन ज्ञानेंद्रियोंके शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंधात्मक पाँच विषय, संकल्प-विकल्पात्मक मन और व्यव- सायात्मिका बुद्धि - इन सब विषयोंका विवेचन हो चुका । परंतु, इतनेहीसे शरीर- संबंधी विचारकी पूर्णता हो नहीं जाती । मन और बुद्धि केवल विचारके साधन अथवा इंद्रियाँ हैं। यदि जड शरीरमें इनके अतिरिक्त प्राणरूपी चेतना अर्थात् हलचल न हो, तो मन और बुद्धिका होना न होना बराबरही - अर्थात् किसी कामका नहीं - समझा जायगा । अर्थात्, शरीरमें उपर्युक्त बातोंके अतिरिक्त चेतना नामक एक और तत्त्वका भी समावेश होना चाहिये । कई बार 'चेतना' शब्दका अर्थ 'चैतन्य' किया जाता है पर, यह ध्यान रखना चाहिये कि यहाँपर 'चेतना' शब्दका अर्थ 'चैतन्य' नहीं माना गया है; वरन् "जड़ देहमें दृग्गोचर होनेवाली प्राणोंकी हलचल, चेष्टा या जीवितावस्थाका व्यवहार" सिर्फ यही अर्थ विवक्षित है। जिस चिद्शक्तिके द्वारा जड़ पदार्थोंमेंभी हलचल अथवा व्यापार उत्पन्न हुआ करता है, उसको चैतन्य कहते हैं; और अब इसी शक्तिके विषयमें विचार करना है। शरीरमें दृग्गोचर होनेवाले सजीवताके व्यापार अथवा चेतनाके अतिरिक्त जिस कारण 'मेरा-तेरा' यह भेद उत्पन्न होता है, वहभी एक भिन्न गुण है। उसका कारण यह है, कि उपर्युक्त विवेचनके अनुसार बुद्धि सार-असारका विचार करके केवल निर्णय करनेवाली एक इंद्रिय है; अतएव 'मेरा-तेरा' इस भेद-भावके मूलको अर्थात् अहंकारको उस बुद्धिसे पृथकही मानना पड़ता है। इच्छा, द्वेष, सुख-दुःख आदि द्वंद्व मनही के गुण हैं; परंतु नैयायिक इन्हें आत्माके गुण समझते हैं। इसीलिये इस भ्रमको हटानेके लिये वेदान्तशास्त्रने इसका समावेश मनहीं में किया है। इसी प्रकार जिन मूल तत्त्वोंसे पंचमहाभूत उत्पन्न हुए हैं, उन प्रकृतिरूप तत्त्वोंकाभी समावेश शरीरहीमें किया जाता है (गीता १३. ५, ६)। जिस शक्तिके द्वारा ये तत्त्व स्थिर रहते हैं, वहभी