श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १४३ यह सिद्धान्त स्थिर हो जाता है, तब आधिदैवत पक्ष अपने आपही कमज़ोर हो जाता है ! जब सिद्ध हो गया, कि आधिभौतिक-पक्ष एकदेशीय तथा अपूर्ण है; और आधिदैवत पक्षका सहल युक्तिवादभी किसी कामका नहीं, तब यह जानना आवश्यक है, कि कर्मयोगशास्त्रकी उपपत्ति ढूंढनेके लिये कोई अन्य मार्ग है या नहीं । और उत्तरभी यह मिलता है, कि हाँ, मार्ग है; और उसीको आध्यात्मिक मार्ग कहते हैं । इसका कारण यह है, कि यद्यपि बाह्य कर्मोंकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, तथापि जब सदसद्विवेक-बुद्धि नामक स्वतंत्र और स्वयंभू देवताका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता, तब कर्मयोगशास्त्रमेंभी इन प्रश्नोंका विचार करना आवश्यक हो जाता है, कि शुद्ध कर्म करनेके लिये बुद्धिको किस प्रकार शुद्ध रखना चाहिये ; शुद्ध बुद्धि किसे कहते हैं; अथवा बुद्धि किस प्रकार शुद्ध की जा सकती है । और यह विचार केवल बाह्य सृष्टिका विचार करनेवाले आधिभौतिकशास्त्रोंको छोड़े बिना तथा अध्यात्मज्ञानमें प्रवेश किये बिना पूर्ण नहीं हो सकता । इस विषयमें हमारे शास्त्रकारोंका अंतिम सिद्धान्त यही है, कि जिस बुद्धिको आत्माका अथवा परमे- श्वरके सर्वव्यापी यथार्थ स्वरूपका पूर्ण ज्ञान नहीं हुआ है, वह बुद्धि शुद्ध नहीं है । गीतामें अध्यात्मशास्त्रका निरूपण यही बतलानेके लिये किया गया है, कि आत्म- निष्ठ बुद्धि किसे कहना चाहिये । परंतु इस पूर्वापर-संबंधकी ओर ध्यान न दे कर, गीताके कुछ सांप्रदायिक टीकाकारोंने यह निश्चय किया है, कि गीताका मुख्य प्रतिपाद्य विषय वेदान्तही है । आगे चल कर यह बात विस्तारपूर्वक बतलाई जायगी, कि गीताके प्रतिपाद्य विषयके संबंधमें उक्त टीकाकारोंका यह निर्णय ठीक नहीं है । यहाँपर सिर्फ़ यही बतलाया है, कि बुद्धिको शुद्ध रखनेके लिये आत्माकाभी अवश्य विचार करना पड़ता है । आत्माके विषयमें यह विचार दो प्रकारोंसे किया जाता है :- (१) स्वयं अपने पिंड, क्षेत्र अथवा शरीरके और मनके व्यापारोंका निरीक्षण करके यह विवेचन करना, कि उस निरीक्षणसे क्षेत्रज्ञ- रूपी आत्मा कैसे उत्पन्न होता है ( गीता अ. १३ ) । इसीको शारीरक अथवा क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार कहते हैं; और इसी कारण वेदान्तसूत्रोंको शारीरक ( शरीरका विचार करनेवाले ) सूत्र कहते हैं । स्वयं अपने शरीर और मनका इस प्रकार विचार होनेपर, (२) यह जानना होगा कि उस विवेचनसे निष्पन्न होनेवाला तत्त्व – और हमारे चारों ओर की दृश्यसृष्टि अर्थात् ब्रह्मांडके निरीक्षणसे निष्पन्न होनेवाला तत्त्व – दोनों एकही हैं अथवा भिन्न भिन्न हैं । इस प्रकार किये गये सृष्टिके निरीक्षणको क्षर-अक्षर-विचार अथवा व्यक्त-अव्यक्त विचार कहते हैं । सृष्टिके सब नाशवान् पदार्थोंको 'क्षर' या 'व्यक्त' कहते हैं; और सृष्टिके उन नाशवान् पदार्थोंमें जो सारभूत नित्य तत्त्व है, उसे 'अक्षर' या 'अव्यक्त' कहते हैं ( गीता ८. २१; १५. १६ ) । क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार और क्षर-अक्षर-विचारसे प्राप्त होनेवाले