भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

१४२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र रूपकका उपयोग अपने ग्रंथमें किया है (फीड्रस २४६)। भगवद्गीतामें, यह दृष्टान्त प्रत्यक्ष रूपसे नहीं पाया जाता। तथापि इस विषयके संदर्भकी ओर जो ध्यान देगा, उसे यह बात अवश्य मालूम हो जायगी, कि गीताके उपर्युक्त श्लोकोंमें इंद्रियनिग्रहका वर्णन इस दृष्टान्तको लक्ष्य करकेही किया गया है। सामान्यतः अर्थात् जब शास्त्रीय सूक्ष्म भेद करनेकी आवश्यकता होती है, तब उसीको मनोनिग्रह कहते हैं। परंतु जब 'मन' और 'बुद्धि'में - जैसा कि ऊपर कह आये हैं - भेद किया जाता है, तब निग्रह करनेका कार्य मनको नहीं, किंतु व्यवसाया- त्मिका बुद्धिकोही करना पड़ता है। इस व्यवसायात्मिका बुद्धिको शुद्ध करनेके लियं - पातंजल-योगकी समाधि से, भक्तिसे, ज्ञानसे अथवा ध्यानसे परमेश्वरके यथार्थ स्वरूपको पहचान कर - यह तत्त्व पूर्णतया बुद्धिमें जम जाना चाहिये, कि "सब प्राणियोंमें एकही आत्मा है।" इसीको आत्मनिष्ठ बुद्धि कहते हैं। इस प्रकार जब व्यवसायात्मिका बुद्धि आत्मनिष्ठ हो जाती है और मनोनिग्रहकी सहा- यतासे मन और इंद्रियाँ उसकी अधीनतामें रह कर आज्ञानुसार आचरण करना सीख जाती हैं, तब इच्छा, वासना आदि मनोधर्म (अर्थात् वासनात्मक बुद्धि) आप-ही-आप शुद्ध और पवित्र हो जाते हैं; और शुद्ध सात्त्विक कर्मोंकी ओर देहेंद्रि- योंकी सहजही प्रवृत्ति होने लगती है। अध्यात्म दृष्टिसे यही सब सदाचरणोंकी जड़ अर्थात् कर्मयोगशास्त्रका रहस्य है। ऊपर किये गये विवेचनसे पाठक समझ जावेंगे, कि हमारे शास्त्रकारोंने मन और बुद्धिकी स्वाभाविक वृत्तियोंके अतिरिक्त सदसद्विवेक-शक्तिरूप स्वतंत्र देवताका अस्तित्व क्यों नहीं माना है। उनके मतानुसारभी मन या बुद्धिका गौरव करनेके लिये उन्हें 'देवता' कहनेमें कोई हर्ज नहीं है; परंतु तात्त्विक दृष्टिसे विचार करके उन्होंने निश्चित सिद्धान्त किया है, कि जिसे हम मन या बुद्धि कहते हैं, उससे भिन्न और स्वयंभू 'सदसद्विवेक' नामक किसी तीसरे देवताका अस्तित्व होही नहीं सकता। "सतां हि सन्देहपदेषु०" वचनके 'सतां' पदकी उपयुक्तता और महत्ताभी अब भली भाँति प्रकट हो जाती है। जिनके मन शुद्ध और आत्म- निष्ठ हैं, वे यदि अपने अंतःकरणकी गवाही लें, तो कोई अनुचित बात न होगी; अथवा यहभी कहा जा सकता है, कि किसी कामको करनेके पहले उनके लिये यही उचित है, कि वे अपने मनको अच्छी तरह शुद्ध करके उसीकी गवाही लिया करें। परंतु यदि कोई धूर्त कहने लगे, कि "मैंभी इसी प्रकार आचरण करता हूँ" तो यह कदापि उचित न होगा। क्योंकि, दोनोंकी सदसद्विवेचन-शक्ति एकही-सी नहीं होती। सत्पुरुषोंकी बुद्धि सात्त्विक और चोरोंकी तामसी होती है। सारांश, आधिदैवत पक्षवालोंका 'सदसद्विवेक-देवता' तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे स्वतंत्र देवता सिद्ध नहीं होता; किंतु हमारे शास्त्रकारोंका सिद्धान्त है, कि वह तो व्यवसाया- त्मिका बुद्धिके स्वरूपोंहीमेंसे एक आत्मनिष्ठ अर्थात् सात्त्विक स्वरूप है। और जब