भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 188

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १४१ अर्थात् “ धर्म और अधर्म, अथवा कार्य और अकार्यका यथार्थ निर्णय जो बुद्धि नहीं कर सकती, यानी जो बुद्धि हमेशा भूल किया करती है, वह राजसी है ” ( गीता १८. ३१ )। और अंतमें कहा है कि :- अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता । सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धि : सा पार्थ तामसी ॥ अर्थात् “ अधर्मकोही धर्म माननेवाली, अथवा सब बातोंका विपरीत या उलटा निर्णय करनेवाली बुद्धि तामसी कहलाती है ” ( गीता १८. ३२ )। इस विवेचनसे स्पष्ट हो जाता है, कि केवल भले-बुरेका निर्णय करनेवाली, अर्थात् सद- सद्विवेक-बुद्धिरूप स्वतंत्र और भिन्न देवता गीताको संमत नहीं है। उसका अर्थ यह नहीं है, कि सदैव ठीक निर्णय करनेवाली बुद्धि होही नहीं सकती। उपर्युक्त श्लोकोंका भावार्थ यही है, कि बुद्धि एकही है, और ठीक ठीक निर्णय करनेका सात्त्विक गुण इसी एक बुद्धिमें पूर्वसंस्कारोंके कारण, शिक्षासे तथा इंद्रियनिग्रह अथवा आहार आदिके कारण उत्पन्न हो जाता है; और इन पूर्वसंस्कार-प्रभृति कारणोंके अभावसेही - वही बुद्धि जैसे कार्य-अकार्य-निर्णयके विषयमें वैसेही अन्य दूसरी बातोंमेंभी - राजसी अथवा तामसो हो सकती है। इस सिद्धान्तकी सहा- यतासे यह भली भांति मालूम हो जाता है, कि चोर और साहकी बुद्धिमें, तथा भिन्न भिन्न देशोंके मनुष्योंकी बुद्धिमें भिन्नता क्यों हुआ करती है। परंतु जब हम सदसद्विवेचन-शक्तिको स्वतंत्र देवता मानते हैं, तब उस विषयकी उपपत्ति ठीक ठीक सिद्ध नहीं होती। प्रत्येक मनुष्यका कर्तव्य है, कि वह अपनी बुद्धिको सात्त्विक बनावे और यह काम इंद्रियनिग्रहके बिना हो नहीं सकता। जबतक व्यवसाया- त्मिका बुद्धि यह जाननेमें समर्थ नहीं है, कि मनुष्यका हित किस बातमें है; और जबतक वह उस बातका निर्णय परीक्षा किये बिनाही इंद्रियोंकी इच्छानुसार आचरण करती रहती है, तबतक वह बुद्धि 'शुद्ध' नहीं कही जा सकती। अतएव बुद्धिको मन और इंद्रियोंके अधीन नहीं होने देना चाहिये। किंतु ऐसा उपाय करना चाहिये, कि जिससे मन और इंद्रियां बुद्धिके अधीन रहें। भगवद्गीता ( गीता २. ६७, ६८; ३. ७, ४१; ६. २४-२६ ) में यही सिद्धान्त अनेक स्थानोंमें बत- लाया गया है; और यही कारण है, कि कठोपनिषद्में शरीरको रथकी उपमा दी गई है; तथा यह रूपक बांधा गया है, कि उस शरीररूपी रथमें जुते हुए इंद्रियाँरूपी घोड़ोंको विषयभोगके मार्गमें अच्छी तरह चलानेके लिये ( व्यवसाया- त्मिका ) बुद्धिरूपी सारथीको मनोमय लगाम धीरतासे खींचे रहना चाहिये - ( कठ. ३. ३-९ )। महाभारत ( मभा. वन. २१०. २५; स्त्री. ७. १३; अश्व. ५१. ५ ) मेंभी वही रूपक दो-तीन स्थानोंमें कुछ हेरफे-के साथ लिया गया है। इंद्रियनिग्रहके इस कार्यका वर्णन करनेके लिये उक्त दृष्टान्त इतना अच्छा है, कि ग्रीसके प्रसिद्ध तत्त्ववेत्ता प्लेटोनेभी इंद्रियनिग्रहका वर्णन करते समय इसी