श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र संदेह नहीं, कि जिन बातोंका या विषयोंका सार-असार विवेक करके निर्णय करना पड़ता है, वे अनेक हो सकते हैं। जैसे व्यापार, लड़ाई, फौजदारी या दीवानी मुक़दमे, साहुकारी, कृषि आदि अनेक व्यवसायोंमें हर अवसरपर सार-असार- विवेक करना पड़ता है। परंतु इतनेहीसे यह नहीं कहा जा सकता, कि इनमें व्यवसायात्मिका बुद्धियाँभी भिन्न भिन्न अथवा कई प्रकारकी होती हैं। सार- असार-विवेक नामकी क्रिया सर्वत्र एकही है; और इसी कारण विवेक अथवा निर्णय करनेवाली बुद्धिभी एकही होनी चाहिये। परंतु मनके सदृश बुद्धिभी शरीरका धर्म है। अतएव पूर्वकर्मके अनुसार - पूर्वपरंपरागत या आनुवंशिक संस्कारोंके कारण, अथवा शिक्षा आदि अन्य कारणोंसे - यह बुद्धि कम या अधिक सात्त्विकी, राजसी या तामसी हो सकती है। यही कारण है, कि जो बात किसी एककी बुद्धिमें ग्राह्य प्रतीत होती है वही दूसरेकी बुद्धिमें अग्राह्य जँचती है। इतनेहीसे यह नहीं समझ लेना चाहिये, कि बुद्धि नामकी इंद्रियही प्रत्येक समय भिन्न भिन्न रहती है। आँख ही का उदाहरण लीजिये। किसीकी आँखें तिरछी रहती हैं, तो किसीकी भद्दी और किसीकी कानी; किसीकी दृष्टि मंद और किसीकी साफ़ रहती है। इससे हम यह कभी नहीं कहते, कि नेत्रेंद्रिय एक नहीं, अनेक हैं। यही न्याय बुद्धिके विषयमेंभी उपयुक्त होना चाहिये। जिस बुद्धिसे चावल अथवा गेहूँ जाने जाते हैं; जिस बुद्धिसे पत्थर और हीरेका भेद जाना जाता है; जिस बुद्धिसे काले-गोरे वा मीठे-कड़वेका ज्ञान होता है; वही इन सब बातोंके तारतम्यका विचार करके अंतिम निर्णयभी किया करती है, कि भय किसमें है, और किसमें नहीं; लाभ या हानि, धर्म अथवा अधर्म और कार्य अथवा अकार्यमें क्या भेद है, इत्यादि। साधारण व्यवहारमें 'मनोदेवता' कह कर उसका चाहे जितना गौरव किया जाय, तथापि तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे वह एकही व्यवसाया- त्मिका बुद्धि है। इसी अभिप्रायकी ओर ध्यान दे कर गीताके अठारहवें अध्यायमें एकही बुद्धिके तीन भेद (सात्त्विक, राजस और तामस) करके भगवानने अर्जुनको पहले यह बतलाया है कि :- प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ अर्थात् "सात्त्विक बुद्धि वह है, कि जिसे इन बातोंका यथार्थ ज्ञान है :- कौन-सा काम करना चाहिये और कौन-सा नहीं, काम करने योग्य है और कौन-सा अयोग्य, किस बातसे डरना चाहिये और किस बातसे नहीं, किसमें बंधन है और किसमें मोक्ष" (गीता १८. ३०)। इसके बाद यह बतलाया है कि - यया धर्ममधर्मं च कार्यं च अकार्यमेव च। अयथावत् प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥