श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३९ (बुद्धि) उत्पन्न नहीं होने पाती और मनभी बिगड़ने नहीं पाता। अतएव गीता (गीता २. ४१) में कर्मयोगशास्त्रका प्रथम सिद्धान्त यह है, कि पहले व्यवसाया- त्मिका बुद्धिको शुद्ध और स्थिर रखना चाहिये। केवल गीताहीमें नहीं, किंतु कांटने * भी बुद्धिके इसी प्रकार दो भेद किये हैं, और शुद्ध अर्थात् व्यवसायात्मिका बुद्धिके एवं व्यावहारिक अर्थात् वासनात्मक बुद्धिके व्यापारोंका विवेचन दो स्वतंत्र ग्रंथोंमें किया है। वस्तुतः देखनेसे तो यही प्रतीत होता है, कि व्यवसाया- त्मिका बुद्धिको स्थिर करना पातंजल योगशास्त्रहीका विषय है; कर्मयोगशास्त्रका नहीं। किंतु गीताका सिद्धान्त है, कि कर्मका विचार करते समय उसकी परि- णामकी ओर ध्यान देनेके पहले सिर्फ यही देखना चाहिये, कि कर्म करनेवालेकी वासना अर्थात् वासनात्मक बुद्धि कैसी है (गीता २.४९)। और इस प्रकार जब वासनाके विषयमें विचार किया जाता है, तब प्रतीत होता है, कि जिसकी व्यवसायात्मिका बुद्धि स्थिर और शुद्ध नहीं रहती, उसके मनमें वासनाओंकी भिन्न भिन्न तरंगें उत्पन्न हुआ करती हैं। और इसी कारण कहा नहीं जा सकता, कि वे वासनाएँ सदैव शुद्ध और पवित्रही होंगी (गीता २.४१)। जब कि वासनाएँही शुद्ध नहीं हैं, तब आगे कर्मभी शुद्ध कैसे हो सकता है? इसीलिये कर्मयोग शास्त्रमेंभी व्यवसायात्मिका कौनसे बुद्धिको शुद्ध, रखनेके लिये साधन अथवा उपाय हैं, इस बातका विस्तारपूर्वक विचार करनेकी आवश्यकता है; और इसी कारण भगवद्गीताके छठे अध्यायमें बुद्धिको शुद्ध करनेके लिये एक साधनके तौरपर पातंजलयोगका विवेचन किया गया है। परंतु इस संबंधपर ध्यान न दे कर कुछ सांप्रदायिक टीकाकारोंने गीताका यह तात्पर्य निकाला है, कि गीतामें केवल पातंजलयोगकाही प्रतिपादन किया गया है। अब पाठकोंके ध्यानमें यह बात आ जायगी, कि गीताशास्त्रमें 'बुद्धि' शब्दके उपर्युक्त दोनों अर्थोंपर और उन अर्थोंके परस्परसंबंधपर ध्यान देना कितने महत्त्व का है। इस बातका वर्णन हो चुका, कि मनुष्यके अंतःकरणके व्यापार किस प्रकार हुआ करते हैं तथा उन व्यापारोंको देखते हुए मन और बुद्धिके कार्य कौन कौनसे हैं, और बुद्धि शब्दके कितने अर्थ होते हैं। मन और व्यवसायात्मिका बुद्धिको इस प्रकार पृथक् कर देनेपर अब देखना चाहिये, कि सदसद्विवेक-देवताका यथार्थ रूप क्या है? इस देवताका काम सिर्फ भले-बुरेका चुनाव करना है, अतएव इसका समावेश 'मन'में नहीं किया जा सकता; और किसीभी बातका विचार करके निर्णय करनेवाली व्यवसायात्मिका बुद्धि केवल एकही है; इसलिये सदसद्विवेक-रूप 'देवता'के लिये कोई स्वतंत्र स्थान नहीं रह जाता। हाँ, इसमें
- कांटने व्यवसायात्मिका बुद्धिको Pure Reason और वासनात्मक बुद्धिको Practical Reason कहा है।