श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सामान्यतः सिर्फ़ यही कहा जाता है, कि “संकल्प-विकल्पात्मकं मनः”। परंतु, ध्यान रहे, कि उस समयभी इस व्याख्यामें मनके दोनों व्यापारोंका समावेश किया जाता है। ‘बुद्धि’का जो अर्थ ऊपर किया गया है, कि यह निर्णय करनेवाली इंद्रिय है; वह अर्थ केवल शास्त्रीय और सूक्ष्म-विवेचनके लिये उपयोगी है। परंतु इन शास्त्रीय अर्थोंका निर्णय हमेशा पीछेमे किया जाता है। अतएव यहाँ ‘बुद्धि’ शब्दके उन व्यावहारिक अर्थोंकाभी विचार करना आवश्यक है, जो, इस शब्दका शास्त्रीय अर्थ निश्चित होनेके पहलेही, प्रचलित हो गये हैं। जबतक व्यवसाया- त्मिका बुद्धि किसी बातका पहले निर्णय नहीं करती, तबतक हमें उसका ज्ञान नहीं होता; और जबतक ज्ञान नहीं होता, तबतक उसके प्राप्त करनेकी इच्छा या वासनाभी नहीं हो सकती। अतएव, जिस प्रकार व्यवहारमें आमके पेड़ और फलके लिये 'आम' इस एकही शब्दका प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार व्यवसायात्मिका बुद्धिके लिये और उस बुद्धिकी वासना आदि फलोंके लियेभी ‘बुद्धि’ इस एकही शब्दका उपयोग व्यवहारमें कई बार किया जाता है। उदाहरणार्थ, जब हम कहते हैं, कि अमुक मनुष्यकी बुद्धि खोटी है; तब हमारे इस बोलनेका यह अर्थ होता है, कि उसकी ‘वासना’ खोटी है। शास्त्रके अनुसार इच्छा या वासना मनके धर्म होनेके कारण उन्हें ‘बुद्धि’ शब्दसे संबोधित करना युक्त नहीं है। परंतु बुद्धि शब्दकी शास्त्रीय जाँच होनेके पहलेहीसे सर्वसाधारण लोगोंके व्यवहारमें 'बुद्धि' इस एकही शब्दका उपयोग इन दोनों अर्थोंमें होता चला आया है:— (१) निर्णय करने- वाली इंद्रिय; और (२) उस इंद्रियके व्यापारसे मनुष्यके मनमें उत्पन्न होने- वाली वासना या इच्छा। अतएव, आमके दो अर्थोंका भेद बतलानेके समय जिस प्रकार 'पेड़' और 'फल' इन शब्दोंको जोड़ दिया जाता है, उसी प्रकार जब बुद्धिके उक्त दोनों अर्थोंकी भिन्नता व्यक्त करनी होती है, तब निर्णय करनेवाली अर्थात् शास्त्रीय बुद्धिको 'व्यवसायात्मिका' विशेषण जोड़ दिया जाता है; और वासनाको केवल 'बुद्धि' अथवा 'वासनात्मक' बुद्धि कहते हैं। गीता (गीता २. ४१, ४८, ४९; और ३. ३२) में 'बुद्धि' शब्दका उपयोग उपर्युक्त दोनों अर्थोंमें किया गया है। और कर्मयोगके विवेचनको ठीक ठीक समझ लेनेके लिये 'बुद्धि' शब्दके उपर्युक्त दोनों अर्थोंपर हमेशा ध्यान रखना चाहिये। जब मनुष्य कुछ काम करने लगता है, तब उसके मनोव्यापारका क्रम इस प्रकार होता है:—पहले वह 'व्यव- सायात्मिका' बुद्धींद्रियसे विचार करता है, कि यह कार्य अच्छा है या बुरा, करनेके योग्य है या नहीं; और फिर उस कर्मके करनेकी इच्छा या वासना (अर्थात् वासनात्मक बुद्धि) उत्पन्न होती है; और तब वह उक्त काम करनेके लिये प्रवृत्त हो जाता है। कार्य-अकार्यका निर्णय करना जिस (व्यवसायात्मिका) बुद्धींद्रियका व्यापार है, वह यदि स्वस्थ और शांत हो, तो मनमें निरर्थक अन्य वासनाएँ