भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 184

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १३७ काम करने पड़ते हैं। मान लो, कि हमें एक मित्र दीख पडा; और उसे पुकारने- की इच्छासे हमने उसे 'अरे' कहा। अब देखिये कि उतने समयमें अंतःकरणमें कितने व्यापार होते हैं। पहले आँखोंने अर्थात् ज्ञानेंद्रियोंने यह संस्कार मनके द्वारा बुद्धिको भेजा, कि हमारा मित्र पासही है; और बुद्धिके द्वारा उस संस्कारका ज्ञान आत्माको हुआ। यह हुई ज्ञान होनेकी क्रिया। जब आत्मा बुद्धिके द्वारा यह निश्चय करता है, कि मित्रको पुकारना चाहिये; और बुद्धिके इस हेतुके अनुसार कार्रवाई करनेके लिये मनमें बोलनेकी इच्छा उत्पन्न होती है; तब मन हमारी जिव्हा (कर्मेंद्रिय) मे 'अरे' शब्दका उच्चारण करवाता है। पाणिनीके शिक्षा-ग्रंथमें शब्दोच्चारण-क्रियाका वर्णन उसी बातको ध्यानमे रखकर किया गया है :- आत्मा बुद्ध्या समेत्याऽर्थान् मनो युंक्ते विवक्षया । मनः कायाग्निमाहन्ति स प्रेरयति मारुतम् । मारुतस्तूरसि चरन् मन्द्रं जनयति स्वरम् ॥ अर्थात् “पहले आत्मा बुद्धिके द्वारा सब बातोंका आकलन करके मनमें बोलनेकी इच्छा उत्पन्न करता है; और जब कायाग्निको उकसाता है, तब कायाग्नि वायुको प्रेरित करती है। तदनंतर यह वायु छातीमें प्रवेश करके मंद्र स्वर उत्पन्न करता है। यही स्वर आगे कंठ-तालू आदिके वर्ण-भेद-रूपमे मुखके बाहर आता है। उक्त श्लोकके अंतिम दो चरण मैत्र्युपनिषदमेंभी मिलते हैं (मैत्र्यु. ७. ११) ; और इसमे प्रतीत होता है, कि ये श्लोक पाणिनिसेभी प्राचीन हैं।* आधु- निक शारीरशास्त्रोंमें कायाग्निको मज्जातंतु कहते हैं। परंतु पश्चिमी शारीर- शास्त्रज्ञोंके कथनानुसार मनभी दो हैं। क्योकि बाहरके पदार्थोंका ज्ञान भीतर लाने- वाले और मनके द्वारा बुद्धिकी आज्ञा कर्मेंद्रियोंको बतलानेवाले शरीरके मज्जा- तंतु भिन्न भिन्न हैं। हमारे शास्त्रकार दो मन नहीं मानते; उन्होंने मन और बुद्धिको भिन्न बतला कर सिर्फ यह कहा है, कि मन उभयात्मक है - अर्थात् वह कर्मेंद्रियोंके साथ कर्मेंद्रियोंके समान और ज्ञानेंद्रियोंके साथ ज्ञानेंद्रियोंके समान काम करता है। दोनोंका तात्पर्य एकही है। दोनोंकी दृष्टिसे यही प्रकट है, कि बुद्धि निश्चयकर्ता न्यायाधीश है; और मन पहले ज्ञानेंद्रियोंके साथ संकल्प-विकल्पात्मक हो जाया करता है; तथा फिर कर्मेंद्रियोके साथ व्याकरणात्मक या कार्रवाई करने- वाला अर्थात् कर्मेंद्रियोंका साक्षात् प्रवर्तक हो जाता है। किसी बातका 'व्याकरण' करने समय कभी कभी मन यह संकल्प-विकल्पभी किया करता है, कि बुद्धिकी आज्ञाका पालन किस प्रकार किया जाय। इसीलिये मनकी व्याख्या करते समय

  • मैक्समूलर साहबने लिखा है, कि मैत्र्युपनिषद् पाणिनिकी अपेक्षा प्राचीन होना चाहिये। Sacred Books of the East Series. Vol. XV. pp. xlvii-li. इसपर परिशिष्ट प्रकरणमें अधिक विचार किया गया है।