श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र करुणावृत्ति जागृत न हो, तो उसे गरीबोंकी सहायता करनेकी इच्छा कभी होगीही नहीं। अथवा, यदि धैर्यका अभाव हो, तो युद्ध करनेकी इच्छा होनेपरभी वह नहीं लड़ेगा। तात्पर्य यह है, कि बुद्धि सिर्फ़ यही बतलाया करती है, कि जिस बात- को करनेकी हम इच्छा करते हैं, उसका परिणाम क्या होगा। परंतु इच्छा अथवा धैर्य आदि गुण बुद्धिके धर्म नहीं है, इसलिये बुद्धि, स्वयं (अर्थात् बिना मनकी सहायता लियेही) कभी इंद्रियोंको प्रेरित नहीं कर सकती। इसके विरुद्ध क्रोध आदि वृत्तियोंके वशमें होकर स्वयं मन चाहे इंद्रियोंको प्रेरितभी कर सके; तोभी यह नहीं कहा जा सकता, कि बुद्धिके सार-असार-विचारके बिना केवल मनोवृत्तियोंकी प्रेरणासे किया गया काम नीतिकी दृष्टिमे शुद्धही होगा। उदाहरणार्थ, यदि बुद्धिका उपयोग न कर केवल करुणावृत्तिसे कुछ दान किया जाता है, तो संभव है, कि वह किसी अपात्रको दिया जावे; और उसका परिणामभी बुरा हो। सारांश यह है, कि बुद्धिकी सहायताके बिना केवल मनोवृत्तियाँ अंधी हैं, अतएव मनुष्यका कोई काम शुद्ध तभी हो सकता है, जब कि बुद्धि शुद्ध हो - अर्थात् वह भले-बुरेका अचूक निर्णय कर सके; मन बुद्धिके अनुरोधसे आचरण करें; और इंद्रियाँ मनके अधीन रहें। बुद्धि और मनके सिवा 'अंतःकरण' और 'चित्त' ये दोनों शब्दभी प्रचलित हैं। इनमेंसे 'अंतःकरण' शब्दका धात्वर्थ 'भीतरी करण अर्थात् इंद्रिय' है। इसलिये उसमें मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि सभीका सामान्यतः समावेश किया जाता है और जब 'मन' पहले पहल बाह्य-विषयोंका ग्रहण अर्थात् चिंतन करने लगता है, तब वही 'चित्त' हो जाता है (मभा. शां. २७४. १७)। परंतु सामान्य व्यवहारमें इन सब शब्दोंका अर्थ एकही-सा माना जाता है। इसमे समझमें नही आता, कि किस स्थानपर कौन-सा अर्थ विवक्षित है। इस गड़बड़ीको दूर करनेके लिये ही, उक्त अनेक शब्दोंमेंसे मन और बुद्धि, इन्ही दो शब्दोंका उपयोग शास्त्रीय परिभाषामें ऊपर कहे गये निश्चित अर्थ में किया जाता है। जब इस तरह मन और बुद्धिका भेद एक बार निश्चित कर दिया गया, तब न्यायाधीशके नाते बुद्धिको मनसे श्रेष्ठ मानना पड़ता है; और मन उस न्याया- धीश (बुद्धि) का मुंशी बन जाता है। “मनसस्तु परा बुद्धिः” - इस गीता- वाक्यका भावार्थभी यही है, कि मनकी अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ एवं उसके परे है (गीता ३. ४२)। तथापि, जैसा कि ऊपर कह आये हैं, उस मुंशीकोभी दो प्रकारके काम करने पड़ते हैं:- (१) ज्ञानेंद्रियों द्वारा अथवा बाहरसे आए हुये संस्कारोंकी व्यवस्था करके उनको बुद्धिके सामने निर्णयके लिये उपस्थित करना; और (२) बुद्धिका निर्णय हो जानेपर उसकी आज्ञा अथवा डाक कर्मेंद्रियोंके पास भेज कर बुद्धिका हेतु सफल करनेके लिये आवश्यक बाह्यक्रिया करवाना। जिस तरह दूकानके लिये माल खरीदनेका काम और दूकानमें बैठ कर बेचनेका कामभी कहीं कहीं उस दूकानके एकही नौकरको करना पड़ता है, उसी तरह मनकोभी दोनों