भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 956 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 192

आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रज्ञविचार १४५ इन सबसे न्यारी है। उसे धृति कहते हैं (गीता १८. ३३)। इन सब बातोंको एकत्र करनेसे जो समुच्चय-रूपी पदार्थ बनता है, उसे शास्त्रोंमें सविकार शरीर अथवा क्षेत्र कहा है; और व्यवहारमें इसे चलता-फिरता (सविकार) मनुष्य शरीर अथवा पिंड कहते हैं। क्षेत्र शब्दकी यह व्याख्या गीताके आधारपर की गई है; परंतु इच्छा-द्वेष आदि गुणोंकी गणना करते समय कभी इस व्याख्यामें कुछ कुछ हेरफेरभी कर दिया जाता है। उदाहरणार्थ, शांति-पर्वके जनक-सुलभा- संवादमें (मभा. शां. ३२०) शरीरकी व्याख्या करते समय पंचकर्मेंद्रियोंके बदले काल, सदसद्भाव, विधि, शुक्र और बलका समावेश किया गया है। इस गणनाके अनुसार पंचकर्मेंद्रियोंको पंचमहाभूतोंहीमें शामिल करना पड़ता है; और यह मानना पड़ता है, कि गीताकी गणनाके अनुसार कालका अंतर्भाव आकाशमें और विधि-शुक्र-बल आदियोंका अंतर्भाव अन्य महाभूतोंमें अथवा प्रकृतिमें किया गया है। कुछभी हो; इसमें संदेह नही, कि क्षेत्र शब्दसे सब लोगोंको एकही अर्थ अभिप्रेत है। अर्थात्, मानसिक और शारीरिक सब द्रव्यों और गुणोंका प्राणरूपी विशिष्ट चेतनायुक्त जो समुदाय है, उसीको क्षेत्र कहते हैं। शरीर शब्दका उपयोग मृत देहके लियेभी किया जाता है, अतएव उस विषयका विचार करते समय 'क्षेत्र' शब्दहीका अधिक उपयोग किया जाता है; क्योंकि वह शरीर शब्दसे भिन्न है। 'क्षेत्र'का मूल अर्थ खेत है; परंतु प्रस्तुत प्रकरणमें 'सविकार और सजीव मनुष्य-देह' के अर्थमें उसका लाक्षणिक उपयोग किया गया है। पहले जिसे हमने 'बड़ा कारखाना' कहा है, वह यही "सविकार और सजीव मनुष्य देह" हैं। बाहरका माल इस कारखानेके भीतर लेनेके लिये और कारखानेके भीतरका माल बाहर भेजनेके लिये, ज्ञानेंद्रियाँ उस कारखानेके यथाक्रम द्वार हैं; और मन, बुद्धि, अहंकार एवं चेतना उस कारखानेमें काम करनेवाले नौकर हैं। ये नौकर जो कुछ व्यवहार कराते हैं या करते हैं, उन्हें इस क्षेत्रके व्यापार, विकार अथवा धर्म कहते हैं। इस प्रकार 'क्षेत्र' शब्दका अर्थ निश्चित हो जानेपर यह प्रश्न सहजही उठता है, कि यह क्षेत्र अथवा खेत है किसका ? इस कारखानेका कोई स्वामीभी है या नहीं ? आत्मा शब्दका उपयोग बहुधा मन, अंतःकरण तथा स्वयं अपने लियेभी किया जाता है। परंतु उसका प्रधान 'अर्थ' 'क्षेत्रज्ञ' अथवा "शरीरका स्वामी" ही है। मनुष्यके जितने व्यापार हुआ करते हैं - चाहे वे मानसिक हों या शारीरिक - वे सब उसकी बुद्धि आदि अंतरिंद्रियाँ, चक्षु आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा हस्त-पाद आदि कर्मेंद्रियांही किया करती हैं। इंद्रियोंके इस समूहमें बुद्धि और मन सबसे श्रेष्ठ हैं। परंतु, यद्यपि वे श्रेष्ठ हैं, तथापि अन्य इंद्रियोंके समान वेभी मूलतः जड़ देह वा प्रकृतिकेही विकार हैं (अगला प्रकरण देखो)। अतएव, यद्यपि मन और बुद्धि सर्वश्रेष्ठ हैं, तथापि उन्हें अपने अपने विशिष्ट व्यापारोंके गी. र. १०