श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रज्ञविचार १४५ इन सबसे न्यारी है। उसे धृति कहते हैं (गीता १८. ३३)। इन सब बातोंको एकत्र करनेसे जो समुच्चय-रूपी पदार्थ बनता है, उसे शास्त्रोंमें सविकार शरीर अथवा क्षेत्र कहा है; और व्यवहारमें इसे चलता-फिरता (सविकार) मनुष्य शरीर अथवा पिंड कहते हैं। क्षेत्र शब्दकी यह व्याख्या गीताके आधारपर की गई है; परंतु इच्छा-द्वेष आदि गुणोंकी गणना करते समय कभी इस व्याख्यामें कुछ कुछ हेरफेरभी कर दिया जाता है। उदाहरणार्थ, शांति-पर्वके जनक-सुलभा- संवादमें (मभा. शां. ३२०) शरीरकी व्याख्या करते समय पंचकर्मेंद्रियोंके बदले काल, सदसद्भाव, विधि, शुक्र और बलका समावेश किया गया है। इस गणनाके अनुसार पंचकर्मेंद्रियोंको पंचमहाभूतोंहीमें शामिल करना पड़ता है; और यह मानना पड़ता है, कि गीताकी गणनाके अनुसार कालका अंतर्भाव आकाशमें और विधि-शुक्र-बल आदियोंका अंतर्भाव अन्य महाभूतोंमें अथवा प्रकृतिमें किया गया है। कुछभी हो; इसमें संदेह नही, कि क्षेत्र शब्दसे सब लोगोंको एकही अर्थ अभिप्रेत है। अर्थात्, मानसिक और शारीरिक सब द्रव्यों और गुणोंका प्राणरूपी विशिष्ट चेतनायुक्त जो समुदाय है, उसीको क्षेत्र कहते हैं। शरीर शब्दका उपयोग मृत देहके लियेभी किया जाता है, अतएव उस विषयका विचार करते समय 'क्षेत्र' शब्दहीका अधिक उपयोग किया जाता है; क्योंकि वह शरीर शब्दसे भिन्न है। 'क्षेत्र'का मूल अर्थ खेत है; परंतु प्रस्तुत प्रकरणमें 'सविकार और सजीव मनुष्य-देह' के अर्थमें उसका लाक्षणिक उपयोग किया गया है। पहले जिसे हमने 'बड़ा कारखाना' कहा है, वह यही "सविकार और सजीव मनुष्य देह" हैं। बाहरका माल इस कारखानेके भीतर लेनेके लिये और कारखानेके भीतरका माल बाहर भेजनेके लिये, ज्ञानेंद्रियाँ उस कारखानेके यथाक्रम द्वार हैं; और मन, बुद्धि, अहंकार एवं चेतना उस कारखानेमें काम करनेवाले नौकर हैं। ये नौकर जो कुछ व्यवहार कराते हैं या करते हैं, उन्हें इस क्षेत्रके व्यापार, विकार अथवा धर्म कहते हैं। इस प्रकार 'क्षेत्र' शब्दका अर्थ निश्चित हो जानेपर यह प्रश्न सहजही उठता है, कि यह क्षेत्र अथवा खेत है किसका ? इस कारखानेका कोई स्वामीभी है या नहीं ? आत्मा शब्दका उपयोग बहुधा मन, अंतःकरण तथा स्वयं अपने लियेभी किया जाता है। परंतु उसका प्रधान 'अर्थ' 'क्षेत्रज्ञ' अथवा "शरीरका स्वामी" ही है। मनुष्यके जितने व्यापार हुआ करते हैं - चाहे वे मानसिक हों या शारीरिक - वे सब उसकी बुद्धि आदि अंतरिंद्रियाँ, चक्षु आदि ज्ञानेंद्रियाँ तथा हस्त-पाद आदि कर्मेंद्रियांही किया करती हैं। इंद्रियोंके इस समूहमें बुद्धि और मन सबसे श्रेष्ठ हैं। परंतु, यद्यपि वे श्रेष्ठ हैं, तथापि अन्य इंद्रियोंके समान वेभी मूलतः जड़ देह वा प्रकृतिकेही विकार हैं (अगला प्रकरण देखो)। अतएव, यद्यपि मन और बुद्धि सर्वश्रेष्ठ हैं, तथापि उन्हें अपने अपने विशिष्ट व्यापारोंके गी. र. १०
१४६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अतिरिक्त और कुछ करते धरते नहीं बनता; और कर सकना संभव भी नहीं है। यह सच है, कि मन चिंतन करता है और बुद्धि निश्चय करती है। परंतु इससे यह निर्णय नहीं होता कि इन कामोंको बुद्धि और मन किनके लिये करते हैं; अथवा भिन्न भिन्न समयपर मन और बुद्धिके जो पृथक् पृथक् व्यापार हुआ करते हैं, उनका एकत्र ज्ञान होनेके लिये जो एकता करनी पड़ती है, वह एकता या एकीकरण कौन करता है; तथा उसीके अनुसार आगे सब इंद्रियोंको अपना अपना व्यापार तदनुकूल करनेकी दिशा कौन दिखाता है? यह नहीं कहा जा सकता, कि यह सब काम मनुष्यका जड़ शरीरही किया करता है। इसका कारण यह है, कि जब शरीरकी चेतना अथवा हलचल करनेके सब व्यापार नष्ट हो जाते हैं, तब जड़ शरीरके बने रहने परभी वह इन कामोंको नहीं कर सकता; और जड़ शरीरके घटकावयव जैसे मांस, स्नायु इत्यादि तो अन्नके परिणाम हमेशा घिस जीर्ण होकर नित्य नये हो जाया करते हैं। इसलिये, “कल मैंने जिस अमुक एक बात देखी थी, वही मैं आज दूसरी देख रहा हूँ” इस प्रकारकी एकत्व-बुद्धिके विषयमें यह नहीं कहा जा सकता, कि वह नित्य बदलने- वाले जड़ शरीरकाही धर्म है। अच्छा; अब जड़ देह छोड़कर चेतनाकोही स्वामी मानें, तो यह आपत्ति दीख पड़ती है, कि गाढ निद्रामें प्राणादि वायुके श्वासोच्छ्वास प्रभृति व्यापार अथवा रुधिराभिसरण आदि व्यापार — अर्थात् चेतना — के स्थिर रहते हुएभी, 'मैं'का ज्ञान नहीं रहता (बृ. २. १. १५-१८)। अतएव यह सिद्ध होता है, कि चेतना — अथवा प्राण प्रभृतिका व्यापार — भी जड़ पदार्थमें उत्पन्न एक प्रकारका विशिष्ट गुण है और वह इंद्रियोंके सब व्यापारोंकी एकता करनेवाली मूल शक्ति या स्वामी नहीं है (कठ. ५. ५)। 'मेरा' और 'पराया' इन संबंधकारक शब्दोंसे केवल अहंकाररूपी गुणका बोध होता है; परंतु इस बातका निर्णय नहीं होता, कि 'अहं' अर्थात् 'मैं' कौन हूँ। यदि इस 'मैं' या 'अहं'को केवल भ्रम मान लें, तो प्रत्येककी प्रतीति अथवा अनुभव वैसा नहीं है; और इस अनुभवको छोड़ कर किसी अन्य बातकी कल्पना करना मानों श्रीसमर्थ रामदास स्वामीके निम्न वचनोंकी सार्थकताही कर दिखाना है — “प्रतीतिके बिना कोईभी कथन अच्छा नहीं लगता। वह कथन ऐसा होता है, जैसे कुत्ता मूंह फैला कर रो गया हो!” (दा. ९. ५. १५)। उक्त अनुभवके विपरीत किसी बातको मान लेनेपरभी इंद्रियोंके व्यापारोंकी एकताकी उपपत्तिका कुछभी पता नहीं लगता। कई लोंगोंकी राय है, कि 'मैं' कोई भिन्न पदार्थ नहीं है, 'क्षेत्र' शब्दमें जिन — मन, बुद्धि, चेतना, जड़ देह आदि — तत्त्वोंका समावेश किया जाता है, उन सबके संघात या समुच्चयकोही 'मैं' कहना चाहिये। पर यह बात हम प्रत्यक्ष देखा करते हैं, कि लकड़ीपर लकड़ी रख देनेसेही संदूक नहीं बन जाता; अथवा किसी घड़ीके सब कील-पुर्जोंको एक स्थानमें रख देनेसेही उनमें गति उत्पन्न
नहीं हो जाती । अतएव यह नहीं कहा जा सकता, कि केवल संघात या समुच्चयसेही कर्तृत्व उत्पन्न होता है। कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि क्षेत्रके सब व्यापार योंही - सिड़ी सरीखे नहीं होते । किंतु उनमें कोई विशिष्ट दिशा, उद्देश्य या हेतु रहता है। तो फिर इस क्षेत्ररूपी कारखानेमें काम करनेवाले मन, बुद्धि आदि सब नौकरोंको इस विशिष्ट दिशा या उद्देश्यकी ओर कौन प्रवृत्त करता है ? संघातका अर्थ केवल समूह है। सब पदार्थोंको एकत्र करके उनके जोड़नेके लिये उनमें धागा डालना पड़ता है, नहीं तो वे फिर कभी-न-कभी अलग हो जायेंगे। अब हमें सोचना चाहिये, कि यह धागा कौन-सा है ? यह बात नही है, कि गीताको संघात मान्य न हो; परंतु उसकी गणना क्षेत्रहीमें की जाती है ( गीता १३. ६) । संघातसे इस बातका निर्णय नहीं होता, कि क्षेत्रका स्वामी अर्थात् क्षेत्रज्ञ कौन है। कुछ लोग समते हैं, कि समुच्चयमें कोई नया गुण उत्पन्न हो जाता है। परंतु पहले तो यह मतही सत्य नहीं; क्योंकि तत्त्वज्ञोंने पूर्ण विचार करके सिद्धान्त कर दिया है, कि जो पहले किसीभी रूपमें अस्तित्वमें नहीं था, वह इस जगतमें नया उत्पन्न नहीं होता ( गीता २. १६) । यदि हम इस सिद्धान्तको क्षणभरके लिये एक ओर धर दें, तोभी यह प्रश्न सहजही उपस्थित हो जाता है, कि संघातमें उत्पन्न होने- वाला यह नया गुणही क्षेत्रका स्वामी क्यों न माना जाय। इसपर कई अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंका कथन है, कि द्रव्य और उसके गुण भिन्न भिन्न नहीं रह सकते; गुणके लिये किसी-न-किसी अधिष्ठानकी आवश्यकता होती है। इसी कारण समुच्चयोत्पन्न गुणके बदले हम समुच्चयहीको उस क्षेत्रका स्वामी मानते हैं। ठीक है; परंतु व्यवहारमेंभी 'अग्नि' शब्दके बदले लकड़ी, 'विद्युत्'के बदले मेघ, अथवा पृथ्वीकी 'आकर्षण-शक्ति'के बदले पृथ्वीही क्यों नहीं कहा जाता ? यदि यह बात निर्विवाद सिद्ध है, कि क्षेत्रके सब व्यापार व्यवस्थापूर्वक और उचित रीतिसे मिल-जुलकर चलते रहनेके लिये - मन और बुद्धिके सिवा - किसी भिन्न शक्तिका अस्तित्व अत्यंत आवश्यक है। और यदि यह बात सच हो, कि उस शक्तिका अधिष्ठान अबतक हमारे लिये अगम्य है; अथवा उस शक्ति या अधिष्ठानका पूर्ण-स्वरूप ठीक ठीक नहीं बतलाया जा सकता है; तो यह कहना न्यायोचित कैसे हो सकता है, कि वह शक्ति हैही नहीं ? जैसे कोईभी मनुष्य अपनेही कंधेपर बैठ नहीं सकता, वैसेही यहभी नहीं कहा जा सकता, कि संघातसंबंधी ज्ञान स्वयं संघातही प्राप्त कर लेता है। अतएव तर्ककी दृष्टिसेभी यही दृढ़ अनुमान किया जाता है, कि देहेंद्रिय आदि संघातके व्यापार जिसके उपभोग लाभके लिये हुआ करते हैं, वह संघातसे भिन्नही है। यह तत्त्व - जो कि संघातसे भिन्न है - स्वयं सब बातोंको जानता है। इसलिये यह बात सच है, कि सृष्टिके अन्य पदार्थोंके सदृश्य यह स्वयं अपनेही लिये 'ज्ञेय' अर्थात् गोचर हो नहीं सकता। परंतु उससे इसके अस्तित्वमें कुछ बाधा नहीं पड़
१४८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र सकती। क्योंकि यह नियम नहीं है, कि सब पदार्थोंको एकही श्रेणी या वर्ग - जैसे ज्ञेय - में शामिल कर देना चाहिये। सब पदार्थोंके दो वर्ग या विभाग होते हैं; जैसे ज्ञाता और ज्ञेय - अर्थात् जाननेवाला और जाननेकी वस्तु। और जब कोई वस्तु दूसरे वर्ग (ज्ञेय) में शामिल नहीं होती, तब उसका समावेश पहले वर्ग (ज्ञाता) में हो जाता है। एवं उसका अस्तित्वभी ज्ञेय वस्तुके समानही पूर्णतया सिद्ध होता है। इतनाही नहीं; किंतु यहभी कहा जा सकता है, कि संघातके परे जो आत्म- तत्त्व है, वह स्वयं ज्ञाता है। इसलिये उसको होनेवाले ज्ञानका यदि वह स्वयं विषय न हो, तो कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। इसी अभिप्रायसे बृहदारण्यकोपनिषदमें याज्ञवल्क्यने कहा है, "अरे! जो सब बातोंको जानता है, उसको जाननेवाला दूसरा कहाँसे आ सकता है?" - विज्ञातारमरे केन विजानीयात् (बृ. २. ४. १४)। अतएव, अंतमें यही सिद्धान्त कहना पड़ता है, कि इस चेतना-विशिष्ट सजीव शरीर अर्थात् क्षेत्रमें एक ऐसी शक्ति रहती है, जो हाथ-पैर आदि इंद्रियोंसे लेकर प्राण, चेतना, मन और बुद्धि जैसे परतंत्र एवं एकदेशीय नौकरोंकेभी परे है, और जो उन सबके व्यापारोंकी एकता करती है, और उनके कार्योंकी दिशा बतलाती है; अथवा जो उनके कर्मोंकी नित्य साक्षी रहकर उनसे भिन्न अधिक व्यापक और समर्थ है। सांख्य और वेदान्तशास्त्रोंको यह सिद्धान्त मान्य है; और अर्वाचीन समयमें जर्मन तत्त्वज्ञ कांटनेभी कहा है, कि बुद्धिके व्यापारोंका सूक्ष्म परीक्षण करनेसे यही तत्त्व निष्पन्न होता है। मन, बुद्धि, अहंकार और चेतना, ये सब शरीरके अर्थात् क्षेत्रके गुण अथवा अवयव हैं। इनका प्रवर्तक उससे भिन्न, स्वतंत्र और उसके परे है - "यो बुद्धेः परतस्तु सः" (गीता ३. ४२)। सांख्य- शास्त्रमें इसीका नाम पुरुष है। वेदान्ती इसीको क्षेत्रज्ञ अर्थात् क्षेत्रको जाननेवाला आत्मा कहते हैं। "मैं हूँ" यह प्रत्येक मनुष्यको होनेवाली उसकी प्रतीतिही उस आत्माके अस्तित्वका सर्वोत्तम प्रमाण है (वे. सू. शां. भा. ३. ३. ५३, ५४)। किसीको यह नहीं मालूम होता, कि "मैं नहीं हूँ"! इतनाही नहीं; किंतु मुखसे "मैं नहीं हूँ" शब्दोंका उच्चारण करते समयभी "नहीं हूँ" इस क्रियापदके कर्ताका - अर्थात् 'मैं'का - अथवा आत्माका अस्तित्व वह प्रत्यक्ष रीतिसे मानाही करता है। इस प्रकार 'मैं' इस अहंकारयुक्त सगुण रूपसे शरीरमें, स्वयं अपनेहीको व्यक्त होनेवाले आत्मतत्त्वके अर्थात् क्षेत्रज्ञके असली, शुद्ध और गुणविरहित स्वरूपका यथाशक्ति निर्णय करनेके लियेही वेदान्तशास्त्रकी उत्पत्ति हुई है। (गीता १३. ४)। तथापि यह निर्णय केवल शरीर अर्थात् क्षेत्रकाही विचार करके नहीं किया जाता। पहले कहा जा चुका है, कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञके विचारके अतिरिक्त यहभी सोचना पड़ता है, कि बाह्यसृष्टि अर्थात् ब्रह्मांडका विचार करनेसे कौन-सा तत्त्व निष्पन्न होता है। ब्रह्मांडके इस विचारकाही नाम 'क्षर-अक्षर-विचार' है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारसे इस बातका निर्णय होता है, कि क्षेत्रमें (अर्थात् शरीर
आधिदैवतपक्ष और क्षेत्रक्षेत्रज्ञविचार १४९ या पिंडमें) कौन-सा मूलतत्त्व (क्षेत्रज्ञ या आत्मा) है; और क्षर-अक्षर-विचारसे बाह्य सृष्टिके अर्थात् ब्रह्मांडके मूल तत्त्वका ज्ञान होता है। जब इस प्रकार पिंड और ब्रह्मांडके मूल तत्त्वोंका पहले पृथक् पृथक् निर्णय हो जाता है, (आगे अधिक विचार किया जाएगा), वेदान्तशास्त्रमें यह सिद्धान्त किया जाता है,* कि ये दोनों तत्त्व एकरूप अर्थात् एकही हैं-यानी "जो पिंडमें है, वही ब्रह्मांडमें है। यही चराचर सृष्टिका अंतिम सत्य है।" पश्चिमी देशोंमेंभी इन बातोंकी चर्चा की गई है; औट कांट जैसे कुछ पश्चिमी तत्त्वज्ञोंके सिद्धान्त हमारे वेदान्तशास्त्रके सिद्धान्तोंसे बहुत कुछ मिलते-जुलतेभी हैं-जब हम इस बातपर ध्यान देते हैं, और जब हम यहभी देखते हैं, कि वर्तमान समयकी नाईं प्राचीन कालमें आधि- भौतिक शास्त्रकी उन्नति नहीं हुई थी; तब ऐसी अवस्थामें जिन लोगोंने अपनी अंतर्दृष्टिसे वेदान्तके अपूर्व सिद्धान्तोंको ढूंढ निकाला, उनके अलौकिक बुद्धिवैभवके बारेमें आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। और केवल आश्चर्यही नहीं होना चाहिये, किंतु हमें उनपर उचित अभिमानभी होना चाहिये।
- हमारे शास्त्रोंके क्षर-अक्षर-विचार और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारके वर्गीकरणसे ग्रीनसाहब परिचित न थे। तथापि, उन्होंने अपने Prolegomena to Ethics ग्रंथके आरंभमें अध्यात्मका जो विवेचन किया है, उसमें पहले Spiritual Principle in Nature और Spiritual Principle in Man इन दोनों तत्त्वोंका विचार किया है और फिर उनकी एकता दिखाई है। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें Psychology आदि मानस- शास्त्रोंका, और क्षर-अक्षर-विचारमें Physics, Metaphysics आदि शास्त्रोंका समावेश होता हैँ। इस बातको पश्चिमी पंडितभी मानते हैं, कि उक्त सब शास्त्रोंका विचार कर लेनेपरही आत्मस्वरूपका निर्णय करना पड़ता है।
सातवाँ प्रकरण कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि । * — गीता १३. १९ पिछले प्रकरणमें यह बात बतला दी गई है, कि शरीर और शरीरके स्वामी या अधिष्ठाता – क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ – के विचारके साथही साथ दृश्य सृष्टि और उसके मूलतत्त्व – क्षर और अक्षर – काभी विचार करनेके पश्चात् फिर आत्माके स्वरूपका निर्णय करना पड़ता है। इस क्षर-अक्षर सृष्टिका योग्य रीतिसे वर्णन करनेवाले तीन शास्त्र हैं। पहला न्यायशास्त्र और दूसरा कापिलसांख्य- शास्त्र । परंतु इन दोनों शास्त्रोंके सिद्धान्तोंको अपूर्ण ठहरा कर वेदान्तशास्त्रने ब्रह्म- स्वरूपका निर्णय एक तीसरीही रीतिसे किया है। इस कारण वेदान्तप्रतिपादित उपपत्तिका विचार करनेके पहले हमें न्याय और सांख्यशास्त्रोंके सिद्धान्तोंपर विचार करना चाहिये । बादरायणाचार्यके वेदान्तसूत्रोंमें इसी पद्धतिसे काम लिया गया है; और न्याय तथा सांख्यके मतोंका दूसरे अध्यायमें खंडन किया गया है। यद्यपि इस विषयका यहाँपर विस्तृत वर्णन नहीं कर सकते, तथापि हमने उन बातोंका उल्लेख इस प्रकरणमें और अगले प्रकरणमें स्पष्ट कर दिया है, जिनकी भगवद्गीताका रहस्य समझनेमें आवश्यकता है। नैयायिकोंके सिद्धान्तोंकी अपेक्षा सांख्यवादियोंके सिद्धान्त अधिक महत्त्वके हैं। इसका कारण यह है, कि कणादके न्यायमतोंको किसीभी प्रमुख वेदान्ती ने स्वीकार नहीं किया है, परंतु कापिलसांख्यशास्त्रके बहुतसे सिद्धान्तोंका उल्लेख मनु आदिके स्मृति- ग्रंथोंमें तथा गीतामेंभी पाया जाता है। यही बात बादरायणाचार्यनेभी (वे. सू. २. १. १२ और २. २. १७) कही है। इस कारण पाठकोंको सांख्यके सिद्धान्तोंका परिचय प्रथमही होना चाहिये । इसमें संदेह नहीं, कि वेदान्तमें सांख्यशास्त्रके बहुतसे सिद्धान्त पाये जाते हैं; परंतु स्मरण रहे, कि सांख्य और वेदान्तके अंतिम सिद्धान्त एक दूसरेसे बहुत भिन्न हैं। यहाँ एक प्रश्न उपस्थित होता है, कि वेदान्त और सांख्यके जो सिद्धान्त आपसमें मिलते जुलते हैं, उन्हें पहले किसने निकाला था – वेदान्तियोंने या सांख्यवादियोंने ? परंतु इस ग्रंथमे इतने गहन विचारमें प्रवेश करनेकी आवश्यकता नहीं। फिरभी इस प्रश्नका उत्तर तीन प्रकारसे दिया
- "प्रकृति और पुरुष दोनोंको अनादि जानो।"
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५१ जा सकता है। पहला यह, कि शायद उपनिषद् (वेदान्त) और सांख्य दोनोंकी वृद्धि, दो सगे भाइयोंके समान, साथही साथ हुई हो; और उपनिषदोंमें जो सिद्धान्त सांख्योंके मतोंके समान दीख पड़ते हैं, उन्हें उपनिषत्कारोंने स्वतंत्र रीतिसे खोज निकाला हो। दूसरा यह, कि कदाचित् कुछ सिद्धान्त सांख्यशास्त्रसे लेकर वेदान्तियोंने उन्हें वेदान्तके अनुकूल स्वरूप दे दिया हो। तीसरा यह कि प्राचीन वेदान्तके सिद्धान्तोंमेंही कपिलाचार्यने अपने मतके अनुसार कुछ परिवर्तन और सुधार करके सांख्यशास्त्रकी उपपत्ति कर दी हो। इन तीनोंमेंसे तीसरी बातही अधिक विश्वसनीय ज्ञात होती है; क्योंकि, यद्यपि वेदान्त और सांख्य दोनों बहुत प्राचीन हैं, तथापि उनमें वेदान्त या उपनिषद् सांख्यसेभी अधिक प्राचीन ( श्रौत ) है। अस्तु; यदि पहले हम न्याय और सांख्यके सिद्धान्तोंको अच्छी तरह समझ लें तो फिर वेदान्तके - विशेषतः गीता-प्रतिपादित वेदान्तके - तत्त्व जल्दी समझमें आ जायेंगें । इसलिये पहले हमें इस बातका विचार करना चाहिये, कि इन दो स्मार्त शास्त्रोंका, क्षर-अक्षर-सृष्टिकी रचनाके विषयमें क्या मत है। बहुतेरे लोक न्यायशास्त्रका यही उपयोग समझते हैं, कि किसी विवक्षित अथवा गृहीत बातसे तर्कके द्वारा कौन-कौन-से अनुमान निकाले जावें और कैसे ? और यह निर्णय कैसे किया जावें, कि इन अनुमानोंमेंसे कौन-से सही हैं और कौन-से गलत हैं। परंतु यह भूल है। अनुमानादि प्रमाणखंड न्यायशास्त्रका एक भाग है सही; पर क्यों ? परंतु यही उसका प्रधान विषय नहीं है, तो प्रमाणोंके अतिरिक्त, सृष्टिकी अनेक वस्तुओंका यानी प्रमेय पदार्थोंका वर्गीकरण करके नीचेके वर्गसे ऊपरके वर्गकी ओर चढ़ते जानेसे सृष्टिके सब पदार्थोंके मूल वर्ग कितने हैं, उनके गुण-धर्म क्या हैं, उनसे अन्य पदार्थोंकी उत्पत्ति कैसे हुई है, और ये बातें किस प्रकार सिद्ध हो सकती हैं, इत्यादि अनेक प्रश्नोंकाभी विचार न्यायशास्त्रमें किया गया है। अतः यही कहना उचित होगा, कि यह शास्त्र केवल अनुमानखंडका विचार करनेके लिये नहीं; वरन् उक्त प्रश्नोंका विचार करनेहीके लिये निर्माण किया गया है। कणादके न्यायसूत्रोंका आरंभ और आगेकी रचनाभी इसी प्रकारकी है। कणादके अनुयायियोंको कणाद कहते हैं। इन दोनोंका कहना है, कि जगतका मूल कारण परमाणुही है। परमाणुके विषयमें कणादकी और पश्चिमी भौतिक- शास्त्रज्ञोंकी व्याख्या एक-सी समानही है। किसीभी पदार्थका विभाग करते करते अंतमें जब विभाग नहीं हो सकता, तब उसे परमाणु (आधिपरम + अणु) कहना चाहिये। जैसे जैसे ये परमाणु एकत्र होते जाते हैं, वैसे वैसे संयोगके कारण उनमें नये नये गुण उत्पन्न होते हैं; और भिन्न भिन्न पदार्थ बनते जाते हैं। मन और शरीरकेभी परमाणु होते हैं; और जब वे एकत्र होते हैं तब चैतन्यकी उत्पत्ति होती है। पृथ्वी, जल, तेज और वायुके परमाणु स्वभावहीसे पृथक् पृथक् हैं। पृथ्वीके मूलपरमाणुमें चार गुण ( रूप, रस, गंध, स्पर्श ) हैं;
१५२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र पानीके परमाणुमें तीन गुण हैं, तेजके परमाणुमें दो गुण हैं और वायुके परमाणुमें एकही गुण है। इस प्रकार सब जगत् पहलेसेही सूक्ष्म और नित्य परमाणुओंमे भरा हुआ है। परमाणुओंके सिवा संसारका मूल कारण और कुछभी नहीं है। जब सूक्ष्म और नित्य परमाणुओंके परस्पर संयोगका 'आरंभ' होता है, तब सृष्टिके व्यक्त पदार्थ बनने लगते हैं। नैयायिकों द्वारा प्रतिपादित व्यक्त सृष्टिकी उत्पत्तिके संबंधकी इस कल्पनाको 'आरंभ-वाद' कहते हैं और कुछ नैयायिक इसके आगे कभी नहीं बढ़ते । एक नैयायिकके बारेमें कहा जाता है, कि मृत्युके समय जब उससे ईश्वरका नाम लेनेको कहा गया, तब वह “पीलवः ! पीलवः ! पीलवः ! ” - परमाणु ! परमाणु ! परमाणु ! - चिल्ला उठा । तथापि, कुछ दूसरे नैयायिक यह मानते हैं, कि परमाणुओंके संयोगका निमित्तकारण ईश्वर है ! इस प्रकार वे सृष्टिकी कारण-परंपराकी शृंखलाको पूर्ण कर लेते हैं। ऐसे नैयायिकोंको 'सेश्वर' कहते हैं। वेदान्तसूत्रके दूसरे अध्यायके दूसरे पादमें इस परमाणुवादका ( २. २. ११-१७ ) और इसके साथही साथ “ ईश्वर केवल निमित्तकारण है ” इस मतकाभी ( २. २. ३७-३९ ) खंडन किया गया है। उल्लिखित परमाणुवादका वर्णन पढ़कर अंग्रेजी पढ़े-लिखे पाठकोंको अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञ डाल्टनके परमाणुवादका अवश्यही स्मरण होगा । परंतु पश्चिमी देशोंमें प्रसिद्ध सृष्टिशास्त्रज्ञ डार्विनके उत्क्रान्तिवादने जिस प्रकार डाल्टनके परमाणुवादकी जड़ही उखाड़ दी है, उसी प्रकार हमारे देशमेंभी प्राचीन समयमें सांख्य-मतने कणादके मतकी बुनियाद हिला डाली थी। कणाद और उसके अनुयायी यह नहीं बतला सकते, कि मूल परमाणुको गति कैसे मिली। इसके अतिरिक्त वे लोग इस बातकाभी यथोचित निर्णय नहीं कर सकते, कि वृक्ष, पशु, मनुष्य इत्यादि सचेतन प्राणियोंकी क्रमशः बढ़ती हुई श्रेणियाँ कैसे बनी; और अचेतनको सचेतनता कैसे प्राप्त हुई। यह निर्णय पश्चिमी देशोंमें उन्नीसवी सदीमें लामार्क और डार्विनने, तथा हमारे यहाँ प्राचीन समयमें कपिलमुनिने किया है। दोनों मतोंका यही तात्पर्य है, कि एकही मूलपदार्थके गुणोंका विकास हुआ; और फिर धीरे धीरे सब सृष्टिकी रचना होती गई। इस कारण पहले हिंदुस्थानमें, और अब सब पश्चिमी देशोंमेंभी, परमाणुवादपर विश्वास नहीं रहा है। अब तो आधुनिक पदार्थशास्त्रज्ञोंने यहभी सिद्ध कर दिखाया है, कि परमाणु आविभाज्य नहीं हैं। आजकल जैसे सृष्टिके अनेक पदार्थोंका पृथक्करण और परीक्षण करके अनेक सृष्टिशास्त्रोंके आधारपर परमाणुवाद या उत्क्रांतिवादको सिद्ध कर दे सकते हैं, वैसे प्राचीन समयमें नहीं कर सकते थे। सृष्टिके पदार्थोंपर नये नये और भिन्न भिन्न प्रयोग करना, अथवा अनेक प्रकारसे उनका पृथक्करण करके गुण-धर्म निश्चित करना, या सजीव सृष्टिके नये पुराने अनेक प्राणियोंके शारीरिक अवयवोंकी एकत्र तुलना करना इत्यादि आधिभौतिक शास्त्रोंकी अर्वाचीन युक्तियाँ
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५३ कणाद या कपिलको मालूम नहीं थीं। उस समय उनकी दृष्टिके सामने जितनी सामग्री थी, उसीके आधारपर उन्होंने अपने अपने सिद्धान्त ढूंढ निकाले हैं। तथापि, यह आश्चर्यकी बात है, कि सृष्टिकी वृद्धि और उसकी घटनाके विषयमें सांख्य- शास्त्रकारोंके तात्त्विक सिद्धान्तमें और अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रकारोंके तात्त्विक सिद्धान्तमें, बहुत-सा भेद नहीं है। इसमें संदेह नहीं, कि सृष्टिशास्त्रके ज्ञानकी वृद्धिके कारण वर्तमान समयमें इस मतकी आधिभौतिक उपपत्तिका वर्णन अधिक नियमबद्ध प्रणालीसे किया जा सकता है; और आधिभौतिक ज्ञानकी वृद्धिके कारण हमें व्यवहारकी दृष्टिसेभी बहुत लाभ हुआ है। परंतु आधि- भौतिक शास्त्रकारभी "एकही अव्यक्त प्रकृतिसे अनेक प्रकारकी व्यक्त सृष्टि कैसे हुई" इस विषयमें कपिलकी अपेक्षा कुछ अधिक नहीं बतला सकते। इस बातको भली भांति समझा देनेके लियेही हमने आगे चल कर, बीचमें स्थान-स्थान- पर, कपिलके सिद्धान्तोंके साथ साथ, हेकेलके सिद्धान्तोंकाभी, तुलनाके लिये संक्षिप्त वर्णन किया है। हेकेलने अपने ग्रंथमें साफ साफ़ लिख दिया है, कि मैंने ये सिद्धान्त कुछ नये सिरेसे नहीं खोजे हैं; वरन्, डार्विन, स्पेन्सर इत्यादि पिछले आधिभौतिक पंडितोंके ग्रंथोंके आधारसेही मैं अपने सिद्धान्तोंका प्रतिपादन करता हूँ। तथापि पहले पहल उसीने इन सब सिद्धान्तोंको ठीक ठीक नियमानुसार लिख कर सरलतापूर्वक इनका एकत्र वर्णन "विश्वको पहेली"* नामक ग्रंथमें किया है। इस कारण, सुभीतेके लिये, हमने उसीही सब आधिभौतिक तत्त्वज्ञोंका मुखिया माना है; और उसीके मतोंका इस प्रकरणमें तथा अगले प्रकरणमें विशेष उल्लेख किया है। कहनेकी आवश्यकता नहीं, कि यह उल्लेख बहुतही संक्षिप्त है; परंतु इससे अधिक इन सिद्धान्तोंका विवेचन इस ग्रंथमें नहीं किया जा सकता। जिन्हें इस विषयका विस्तृत वर्णन पढ़ना हो, उन्हें स्पेन्सर, डार्विन, हेकेल आदि पंडितोंके मूल ग्रंथोंका अवलोकन करना चाहिये। कपिलके सांख्यशास्त्रका विचार करनेके पहले यह कह देना उचित होगा, कि 'सांख्य' शब्दके दो भिन्न भिन्न अर्थ होते हैं। पहला अर्थ कपिलाचार्य द्वारा प्रतिपादित 'सांख्यशास्त्र' है। उसीका उल्लेख इस प्रकरणमें, तथा एक बार भगवद्- गीता (गीता १८. १३) मेंभी किया गया है। परंतु इस विशिष्ट अर्थके सिवा सब प्रकारके तत्त्वज्ञानकोभी सामान्यतः 'सांख्य'ही कहनेकी परिपाटी है; और इसी 'सांख्य' शब्दमें वेदान्तशास्त्रकाभी समावेश होता है। 'सांख्यनिष्ठा'। अथवा 'सांख्ययोग' शब्दोंमें 'सांख्य'का यही सामान्य अर्थ अभीष्ट है। इस निष्ठाके ज्ञानी पुरुषोंकोभी भगवद्गीतामें जहाँ (गीता २. ३९; ३. ३; ५. ४, ५; और १३. २४)
- The Riddle of the Universe, by Ernst Haeckel इस ग्रंथकी R. P. A. Cheap reprint आवृत्तिकाही हमने सर्वत्र उपयोग किया है।
१५४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र 'सांख्य' कहा है, वहाँ सांख्यका अर्थ केवल कापिल सांख्यमार्गीही नहीं है; वरन् उसमें, आत्म-अनात्म-विचारसे सब कर्मोंका संन्यास करके ब्रह्मज्ञानहीमें निमग्न रहनेवाले वेदान्तियोंकाभी समावेश किया जाता है। शब्दशास्त्रज्ञोंका कथन है, कि 'सांख्य' शब्द 'संख्या' धातुसे बना है। इसलिये इसका पहला अर्थ 'गिननेवाला' है, और कापिलशास्त्रके मूल तत्त्व इनेगिने 'पचीस' ही हैं। इसलिये उन्हें 'गिननेवालेके' अर्थमें यह विशिष्ट 'सांख्य' नाम पहले दिया गया। अनंतर 'सांख्य' शब्दका अर्थ बहुत व्यापक हो गया; और उसमें सब प्रकारके तत्त्वज्ञानका समावेश होने लगा। यही कारण है, कि जब पहले पहल कापिल - भिक्षुओंको 'सांख्य' कहनेकी परिपाटी प्रचलित हो गई, तब वेदान्ती संन्यासियोंकोभी यही नाम दिया जाने लगा होगा। कुछभी हो; इस प्रकरणका, हमने जानबूझकर, यह लंबा-चौड़ा 'कापिलसांख्यशास्त्र' नाम इसलिये रखा है, कि सांख्य शब्दके उक्त अर्थभेदके कारण कुछ गड़बड़ी न हो। कापिलसांख्यशास्त्रमेंभी कणादके न्यायशास्त्रके समान सूत्र हैं। परंतु गौडपादाचार्य या शारीर-भाष्यकार श्री शंकराचार्यने इन सूत्रोंका आधार अपने ग्रंथोंमें नहीं लिया है। इसलिये बहुतेरे विद्वान् समझते हैं, कि ये सूत्र कदाचित् प्राचीन न हों। ईश्वरकृष्णकी 'सांख्यकारिका' उक्त सूत्रोंसे प्राचीन मानी जाती है; और उसपर श्री शंकराचार्यके दादागुरु गौडपादने भाष्य लिखा है। शांकर-भाष्यमेंभी इसी कारिकाके कुछ अवतरण लिये हैं। सन ५७० ईसवीसे पहले इस ग्रंथका जो अनुवाद चीनी भाषामें हुआ था, वह इस समय उपलब्ध है।* ईश्वरकृष्णने अपनी 'कारिका'के अंतमें कहा है, कि 'षष्टितंत्र' नामक साठ प्रकरणोंके एक प्राचीन और विस्तृत ग्रंथका भावार्थ (कुछ प्रकरणोंको छोड़) सत्तर आर्या-पद्योंमें इस ग्रंथमें दिया गया है। यह षष्टितंत्र ग्रंथ अब उपलब्ध नहीं है। इसीलिये उन कारिकाओंके आधारपरही कापिल- सांख्यशास्त्रके मूल सिद्धान्तोंका विवेचन हमने यहाँ किया है। महाभारतमें सांख्य- * अब बौद्ध ग्रंथोंसे ईश्वरकृष्णका बहुत कुछ हाल जाना जा सकता है। बौद्ध पंडित वसुबंधुका गुरु ईश्वरकृष्णका समकालीन प्रतिपक्षी था। वसुबंधुका जो जीवन चरित, परमार्थने (सन ई. ४९९-५६९ में) चीनी भाषामें लिखा था, वह अब प्रकाशित हुआ है। इसमे डॉक्टर टककमूने यह अनुमान किया है, कि ईश्वरकृष्णका समय सन ४५० ई. के लगभग है। Journal of the Royal Asiatic Society of Great Britain & Ireland, 1905, pp. 33-53. परंतु डॉक्टर विन्सेंट स्मिथकी राय है कि, स्वयं वमुबंधुका समयही चौथी सदीमें (लगभग २८०-३६०) होना चाहिये। क्योंकि उसके ग्रंथोंका अनुवाद सन ४०४ ईसवीमें चीनी भाषामें हुआ है। वमुबंधुका समय इस प्रकार जब पीछे हट जाता है, तब उसी प्रकार ईश्वरकृष्णका समयभी करीब २०० वर्ष पीछे हटाना पड़ता है; अर्थात् सन २६० ईसवीके लगभग ईश्वरकृष्णका समय आ पहुँचता है। Vincent Smith's Early History of India, 3rd. Ed., P. 328.
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५५ मतका निर्णय कई अध्यायोंमें किया गया है। परंतु उनमें वेदान्त-मतोंकाभी मिश्रण हो गया है; इसलिये कपिलके शुद्ध सांख्य-मतको जाननेके लिये दूसरे ग्रंथोंकोभी देखनेकी आवश्यकता होती है। इस कामके लिये उक्त सांख्यकारिकाकी अपेक्षा कोईभी अधिक प्राचीन ग्रंथ इस समय उपलब्ध नहीं है। भगवानने भगवद्गीतामें कहा है, कि "सिद्धानां कपिलो मुनिः" (गीता १०.२६) - सिद्धोंमेंसे कपिलमुनि मैं हूँ; - इससे कपिलकी योग्यता भली भाँति सिद्ध होती है। तथापि यह बात मालूम नहीं, कि कपिल ऋषि कहाँ और कब हुए। शांतिपर्व (मभा. शां. ३४०.६७) में एक जगह लिखा है, कि सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सन, सनत्सुजात, सनातन और कपिल ये सातों ब्रह्मदेवके मानसपुत्र हैं और इन्हें जन्महीसे ज्ञान हो गया था। दूसरे स्थान (मभा. शां. २१८) में कपिलके शिष्य आसुरि और उसके चेले पंचशिखने जनकको सांख्यशास्त्रका जो उपदेश दिया था उसका उल्लेख है। इसी प्रकार शांतिपर्व (मभा. शां. ३०१.१०८, १०९) में भीष्मने कहा है, कि सांख्योंने सृष्टि-रचना इत्यादिके बारेमें एक बार जो ज्ञान प्रचलित कर दिया है, वही "पुराण, इतिहास, अर्थशास्त्र" आदि सबमें पाया जाता है। वही क्यों; यहाँतक कहा गया है, कि "ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन्" - अर्थात् इस जगतका सब ज्ञान सांख्योंसेही प्राप्त हुआ है (मभा. शां. ३०१.१०९)। यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि वर्तमान समयमें पश्चिमी ग्रंथकार उत्क्रांतिवादका उपयोग सब जगह कैसे किया करते हैं; तो यह बात आश्चर्यजनक नहीं मालूम होती, कि इस देशके निवासियोंनेभी उत्क्रांतिवादकी बराबरीके संख्याशास्त्रका सर्वत्र कुछ अंशमें स्वीकार किया है। 'गुरुत्वाकर्षण' सृष्टिरचनाके 'उत्क्रांतितत्त्व'* या 'ब्रह्मात्मैक्य'के समान उदात्त विचार सैकड़ों बरसोंके बादही किसी महात्माके ध्यानमें आया करते हैं। इसलिये यह बात सामान्यतः सभी देशोंके ग्रंथोंमें पाई जाती है, कि जिस समय जो सामान्य सिद्धान्त या व्यापक तत्त्व समाजमें प्रचलित रहता है, उसके आधारपरही किसी ग्रंथके विषयका प्रतिपादन किया जाता है। आजकल कापिलसांख्यशास्त्रका अभ्यास प्रायः लुप्त हो गया है, इसीलिये यह प्रस्तावना करनी पड़ी। अब हम यह देखेंगे, कि इस शास्त्रके मुख्य सिद्धान्त कौन-से हैं। सांख्यशास्त्रका पहला सिद्धान्त यह है, कि इस संसारमें कोईभी नई वस्तु उत्पन्न नहीं होती। क्योंकि, शून्यसे - अर्थात् जो पहले थाही नहीं उससे -
- Evolution Theory के अर्थमें 'उत्क्रांति-तत्त्व' का उपयोग आजकल किया जाता है, इसलिये हमनेभी यहाँ उसी शब्दका प्रयोग किया है। परंतु संस्कृतमें 'उत्क्रांति' शब्द का अर्थ मृत्यु है। इस कारण 'उत्क्रांति'के बदले गुणविकास, गुणोत्कर्ष, या गुणपरिणाम आदि सांख्यवादियोंके शब्दोंका उपयोग करना हमारी समझमें अधिक योग्य होगा।
१५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शून्यको छोड़ और कुछभी प्राप्त हो नहीं सकता । इसलिये यह बात सदा ध्यानमें रखनी चाहिये, कि उत्पन्न वस्तुमें - अर्थात् कार्यमें - जो गुण दीख पड़ते हैं, वे गुण जिससे यह वस्तु उत्पन्न हुई है, उसमें ( अर्थात् कारणमें ) सूक्ष्म रीतिसे तो अवश्य होनेही चाहिये ( सां. का. ९)। बौद्ध और काणाद यह मानते हैं, कि पदार्थका नाश हो कर उससे दूसरा नया पदार्थ बनता है। उदाहरणार्थ, बीजका नाश होनेके बाद उससे अंकुर और अंकुरका नाश होनेके बाद उससे पेड़ होता है। परंतु सांख्य- शास्त्रियों और वेदान्तियोंको यह मत पसंद नहीं है। वे कहते हैं, कि वृक्षके बीजमें जो 'द्रव्य' हैं उनका नाश नहीं होता; किंतु वेही द्रव्य जमीनसे और वायुसे दूसरे द्रव्योंको खींच लिया करते हैं; और इसी कारणसे बीजको अंकुरका नया स्वरूप या अवस्था प्राप्त हो जाती है (वे. सू. शां. भा. २. १. १८)। इसी प्रकार जब लकड़ी जलती है, तब उसकेही राख या धुआँ आदि रूपांतर हो जाते हैं। लकड़ीके मूल 'द्रव्यों'का नाश हो कर धुआँ नामक कोई नया पदार्थ उत्पन्न नहीं होता। छांदोग्योपनिषद् (छां. ६. २. १) में कहा है, "कथमसतः सज्जायेत" - जो है ही नहीं - उससे जो है - वह कैसे प्राप्त हो सकता है? जगतके मूल कारणके लिये 'असत्' शब्दका उपयोग कभी कभी उपनिषदोंमें किया गया है, (छां. ३. १९. १; तै. २. ७. १); परंतु यहाँ 'असत्'का अर्थ 'अभाव नहीं' नहीं है; किंतु वेदान्तसूत्रों (वे. सू. २. १. १६, १७) में यह निश्चय किया गया है, कि 'असत्' शब्दसे केवल नामरूपात्मक व्यक्त स्वरूप या अवस्थाका अभावही विवक्षित है। दूधसेही दही बनता है, पानीसे नहीं; तिलसेही तेल निकलता है, बालूसे नहीं; इत्यादि प्रत्यक्ष देखे हुए अनुभवोंसेभी यही सिद्धान्त प्रकट होता है। यदि हम यह मान लें, कि 'कारण' में जो गुण नहीं हैं, वे 'कार्य'में स्वतंत्र रीतिसे उत्पन्न होते हैं; तो फिर हम इसका कारण नहीं बतला सकते, कि पानीसे दही क्यों नहीं बनता ? सारांश यह है, कि जो मूलमें हैही नहीं, उससे अभी जो अस्तित्वमें है, वह उत्पन्न नहीं हो सकता। इसलिये सांख्यवादियोंने यह सिद्धान्त निकाला है, कि किसी कार्यके वर्तमान द्रव्यांश और गुण मूल कारणमेंभी किसी न किसी रूपसे स्थिर रहते हैं। इसी सिद्धान्तको 'सत्कार्यवाद' कहते हैं। अर्वाचीन पदार्थ- विज्ञानके ज्ञाताओंनेभी यही सिद्धान्त ढूंढ़ निकाला है, कि पदार्थोंके जड़ द्रव्य और कर्मशक्ति दोनों सर्वदा स्थिर रहते हैं। और किसी पदार्थके चाहे जितने रूपांतर हो जायें; तोभी अन्तमें सृष्टिके कुल द्रव्यांशका और कर्मशक्तिका जोड़ हमेशा एकसा बना रहता है। उदाहरणार्थ, जब हम दीपकको जलता देखते हैं, तब तेलभी धीरे धीरे कम होता जाता है; और अंतमें वह नष्ट हुआसा दीख पड़ता है। यद्यपि यह सब तेल जल जाता है, तथापि उसके परमाणुओंका बिलकुलही नाश नहीं हो जाता। उन परमाणुओंका अस्तित्व धुएँ या काजल या अन्य सूक्ष्म द्रव्योंके रूपमें बना रहता है। यदि हम इन सूक्ष्म द्रव्योंको एकत्र करके तौलें तो मालूम
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५७ होगा, कि उनका तौल या वज़न तेल और तेलके जलते समय उसमें मिले हुए वायुके पदार्थोंके तौलके बराबर होता है। अब तो यहभी सिद्ध हो चुका है, कि उक्त नियम कर्मशक्तिके विषयमेंभी लगाया जा सकता है। यह बात याद रखनी चाहिये, कि यद्यपि आधुनिक पदार्थविज्ञानशास्त्रका और सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त दिखनेमें एक-सा है, फिरभी सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त केवल एक पदार्थसे दूसरे पदार्थकी उत्पत्तिके विषयमें - अर्थात् सिर्फ कार्य-कारण-भावहीके संबंधमें उपयुक्त होता है। परंतु, अर्वाचीन पदार्थविज्ञानशास्त्रका सिद्धान्त इससे अधिक व्यापक है। 'कार्य'का कोईभी गुण 'कारण'के बाहरके गुणोंसे उत्पन्न नहीं हो सकता। इतनाही नहीं; किंतु जब कारणको कार्यका स्वरूप प्राप्त होता है, तब उस कार्यमें रहनेवाले द्रव्यांश और कर्म-शक्तिका कुछभी नाश नहीं होता और पदार्थकी भिन्न भिन्न अवस्थाओंके द्रव्यांश और कर्मशक्तिके जोड़का वज़नभी सदैव एकही-सा रहता है - न तो वह घटता है और न बढ़ता है। यह बात प्रत्यक्ष प्रयोगसे गणितके द्वारा सिद्ध कर दी गई है और यही उक्त दोनों सिद्धान्तोंकी महत्त्वकी विशेषता है। इस प्रकार जब हम विचार करते हैं, तो हमें जान पड़ता है, कि भगवद्गीताके "नासतो विद्यते भावः" - जो रही नहीं, उसका कभीभी अस्तित्व हो नहीं सकता - इत्यादि सिद्धान्त जो दूसरे अध्यायके आरंभमें दिये हैं (गीता २. १६), वे यद्यपि देखनेमें सत्कार्यवादके समान दीख पड़े, तोभी उनकी समता केवल कार्यकारणात्मक सत्कार्यवादकी अपेक्षा अर्वाचीन पदार्थ-विज्ञानशास्त्रके सिद्धान्तोंके साथ अधिक है। छांदोग्योपनिषद्के उपर्युक्त वचनकाभी यही भावार्थ है। सारांश, सत्कार्यवादका सिद्धान्त वेदान्तियोंको मान्य है; परंतु अद्वैत वेदान्तशास्त्रका मत है, कि इस सिद्धान्तका उपयोग सगुण सृष्टिके परे नहीं किया जा सकता। और निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति कैसे दीख पड़ती है इस बातकी उपपत्ति औरही प्रकारसे लगानी चाहिये। इस वेदान्त-मतका विचार आगे चलकर अध्यात्म-प्रकरणमें विस्तृत रीतिसे किया जायगा। इस समय तो हमें सिर्फ यही विचार करना है, कि सांख्यवादियोंकी पहुँच कहाँतक है। इसलिये अब हम इस बातका विचार करेंगे, कि सत्कार्यवादका सिद्धान्त मानकर सांख्योंने क्षर-अक्षर शास्त्रमें उसका उपयोग कैसे किया है। सांख्यमतानुसार जब सत्कार्यवाद सिद्ध हो जाता है तब यह मत आप-ही-आप गिर जाता है, कि दृश्यसृष्टिकी उत्पत्ति शून्यसे अर्थात् किसी पदार्थके पहले न रहते हुई है। क्योंकि, शून्यसे अर्थात् जो कुछभी नहीं है, उससे जो "अस्तित्वमें है" वह उत्पन्न नही हो सकता। इस बातसे यह साफ़ साफ़ सिद्ध होता है, कि सृष्टि किसी- न-किसी पदार्थसे उत्पन्न हुई है और इस समय सृष्टिमें जो गुण हमें दीख पड़ते हैं, वेही इसके मूलपदार्थमेंभी होने चाहिये। अब यदि हम सृष्टिकी ओर देखें, तो हमें वृक्ष, पशु, मनुष्य, पत्थर, सोना, चांदी, हीरा, जल, वायु इत्यादि अनेक पदार्थ दीख पड़ते हैं, और इन सबके रूप तथा गुणभी भिन्न भिन्न हैं। सांख्यवादियोंका सिद्धान्त है, कि
१५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यह भिन्नता या नानात्व मूलमें - अर्थात् मूल पदार्थमें - नहीं है; किंतु मूलमें सब वस्तुओंका द्रव्य एकही है। अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञोंने भिन्न भिन्न द्रव्योंका पृथक्करण करके पहले ६२ मूलतत्त्व ढूंढ़ निकाले थे; परंतु अब पश्चिमी विज्ञानवेत्ताओंनेभी यह निश्चय कर लिया है, कि ये ६२ मूल तत्त्व स्वतंत्र या स्वयंसिद्ध नहीं हैं। किंतु इन सबकी जड़में कोई-न-कोई एकही पदार्थ है; और उस पदार्थहीसे सूर्य, चंद्र, तारागण, पृथ्वी इत्यादि सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। इसलिये अब उक्त सिद्धान्तका अधिक विवेचन आवश्यक नहीं है। जगतके सब पदार्थोंका जो यह मूलद्रव्य है, उसेही सांख्यशास्त्रमें 'प्रकृति' कहते हैं। प्रकृतिका अर्थ 'मूलधर्म, है। इस प्रकृतिसे आगे जो पदार्थ बनते हैं, उन्हें 'विकृति' अर्थात् मूलद्रव्यके विकार कहते हैं। परंतु यद्यपि सब पदार्थोंमें मूल द्रव्य एकही है, तथापि यदि इस मूल द्रव्यमें गुणभी एकही हो, तो सत्कार्यवादानुसार इस एकही गुणसे अनेक गुणोंका उत्पन्न होना संभव नहीं है। और इधर तो जब हम इस जगतके पत्थर, मिट्टी, पानी, सोना इत्यादि भिन्न भिन्न पदार्थोंकी ओर देखते हैं, तब उनमें भिन्न भिन्न अनेक गुण पाये जाते हैं। इसलिये पहले सब पदार्थोंके गुणोंका निरीक्षण करके सांख्यवादियोंने इन गुणोंके सत्त्व, रज और तम ये तीन भेद या वर्ग कर दिये हैं। इसका कारण यही है, कि जब हम किसीभी पदार्थको देखते हैं, तब स्वभावतः उसकी दो भिन्न भिन्न अवस्थाएँ दीख पड़ती हैं; - पहली शुद्ध, निर्मल या पूर्णावस्था और दूसरी उसके विरुद्ध निकृष्टावस्था। परंतु साथही साथ निकृष्टावस्थासे पूर्णावस्थाकी ओर बढ़नेकी उस पदार्थकी प्रवृत्तिभी दृष्टिगोचर हुआ करती है; यही तीसरी अवस्था है। इन तीनों अवस्थाओंमेंसे शुद्धा- वस्था या पूर्णावस्थाको सात्त्विक, निकृष्टावस्थाको तामसिक और प्रवर्तकावस्थाको राजसिक कहते हैं। इस प्रकार सांख्यवादी कहते हैं, कि सत्त्व, रज और तम तीनों गुण सब पदार्थोंके मूलद्रव्यमें अर्थात् उनकी प्रकृतिमें आरंभसेही रहा करते हैं। इसलिये यदि यह कहा जाय, कि इन तीन गुणोंहीको प्रकृति कहते हैं, तो अनुचित नहीं होगा। इन तीनों गुणोंमेंसे प्रत्येक गुणका जोर आरंभमें समान या बराबर रहता है, इसीलिये पहले पहल यह प्रकृति साम्यावस्थामें रहती है। यह साम्यावस्था जगतके आरंभमें थी; और जगत्का लय हो जानेपर वैसीही फिर हो जायगी। साम्यावस्थामें कुछभी हल- चल नहीं होती, सब कुछ स्तब्ध रहता है। परंतु जब उक्त तीनों गुण न्यूनाधिक होने लगते हैं, तब प्रवृत्त्यात्मक रजोगुणके कारण मूल प्रकृतिसे भिन्न भिन्न पदार्थ उत्पन्न होने लगते हैं; और सृष्टिका आरंभ होने लगता है। अब यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है, कि यदि पहले सत्त्व, रज और तम ये दोनों गुण साम्यावस्थामें थे, तो इनमें न्यूनाधिकता कैसे उत्पन्न हुई है ? इस प्रश्नका सांख्यवादी यही उत्तर देते हैं, कि यह प्रकृतिका मूलभूत धर्मही है (सां. का. ६१)। यद्यपि प्रकृति जड़ है, तथापि वह आप-ही-आप ये सब व्यवहार करती रहती है। इन तीनों गुणोंमेंसे सत्त्वगुणका लक्षण ज्ञान अर्थात् जानना और तमोगुणका लक्षण अज्ञान है। रजोगुण बुरे या भले
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५९ कार्यका प्रवर्तक है। ये तीनों गुण कभी अलग अलग नहीं रह सकते। सब पदार्थोंमें सत्त्व, रज और तम इन तीनोंका मिश्रण रहताही है; और यह मिश्रण हमेशा इन तीनोंका परस्पर न्यूनाधिकतासे हुआ करता है। इसलिये यद्यपि मूलद्रव्य एक ही है, तोभी गुणभेदके कारण एक मूलद्रव्यकेही सोना, लोहा, मिट्टी, जल, आकाश, मनुष्यका शरीर इत्यादि भिन्न भिन्न अनेक विकार हो जाते हैं। जिसे हम सात्त्विक गुणका पदार्थ कहते हैं, उसमें रज और तमकी अपेक्षा, सत्त्वगुणका जोर या परिमाण अधिक रहता है, इस कारण उस पदार्थमें हमेशा रहनेवाले रज औरतम - दोनों गुण दब जाते हैं और वे हमें दीख नहीं पड़ते। वस्तुतः, सत्त्व, रज और तम - तीनों गुण अन्य पदार्थोंके समान, सात्त्विक पदार्थमेंभी विद्यमान रहते हैं। केवल सत्त्वगुणका, केवल रजोगुणका, या केवल तमोगुणका कोई पदार्थही नहीं है। प्रत्येक पदार्थमें तीनोंका रगड़ा-झगड़ा चलाही करता है; और इस झगड़ेमें जो गुण प्रबल हो जाता है, उसीके अनुसार हम प्रत्येक पदार्थको सात्त्विक, राजस या तामस कहा करते हैं (सां. का. १२; महा. अश्व - अनुगीता - ३६ और शां. ३०५) । उदाहरणार्थ, हमारे शरीरमें जब रज और तम गुणोंपर सत्त्वका प्रभाव जम जाता है, तब हमारे अंतःकरणमें ज्ञान उत्पन्न होता है, सत्यका परिचय होने लगता है, और चित्तवृत्ति शांत हो जाती है। यह नहीं समझना चाहिये, कि उस समय हमारे शरीरमें रजोगुण और तमोगुण बिलकुलही नहीं होते; बल्कि वे सत्त्वगुणके प्रभावसे दब जाते हैं, इसलिये उनका कुछ अधिकार चलने नहीं पाता (गीता १४. १०)। यदि सत्त्वके बदले रजोगुण प्रबल हो जाय, तो हमारे अंतःकरणमें लोभ जागृत हो जाता है, लालच बढ़ने लगता है, और वह हमें अनेक बुरे कामोंमें प्रवृत्त करता है। इसी प्रकार जब सत्त्व और रजकी अपेक्षा तमोगुण प्रबल हो जाता है, तब निद्रा, आलस्य, स्मृतिभ्रंश, इत्यादि दोष शरीरमें उत्पन्न हो जाते हैं। तात्पर्य यह है, कि इस जगत्के पदार्थोंमें सोना, लोहा, पारा इत्यादि जो अनेकता या भिन्नता दीख पड़ती है, वह प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंकीही परस्पर-न्यूनाधिकता या संघर्षका फल है। मूल प्रकृति यद्यपि एकही है, तोभी यह अनेकता या भिन्नता कैसे उत्पन्न हो जाती है - बस, इसीके विचारको 'विज्ञान' कहते हैं। इसीमें सब आधिभौतिक शास्त्रोंकाभी समावेश हो जाता है। उदाहरणार्थ, रसायनशास्त्र, विद्युच्छास्त्र, पदार्थ विज्ञानशास्त्र, ये सब विविध ज्ञान विज्ञानही हैं। साम्यावस्थामें रहनेवाली प्रकृतिको सांख्यशास्त्रमें 'अव्यक्त' अर्थात् इंद्रियोंको गोचर न होनेवाली कहा है। इस प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंकी पर- स्पर-न्यूनाधिकतासे उत्पन्न जो अनेक पदार्थ हमारी इंद्रियोंको गोचर होते हैं, अर्थात् जिन्हें हम देखते हैं, चखते हैं, सूंघते हैं, या स्पर्श करते हैं, उन्हें सांख्यशास्त्रमें 'व्यक्त' कहा है। स्मरण रहे, कि जो पदार्थ हमारी इंद्रियोंको स्पष्ट रीतिसे गोचर हो सकते हैं, वे सब 'व्यक्त' कहलाते हैं। चाहे फिर वे पदार्थ अपनी आकृतिके कारण, रूपके
१६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण, गंधके कारण, या किसी अन्य गुणके कारण व्यक्त होते हों। व्यक्त पदार्थ अनेक हैं और उनमेंसे कुछ, जैसे पत्थर, पेड़, पशु इत्यादि स्थूल कहलाते हैं; और कुछ, जैसे मन, बुद्धि, आकाश इत्यादि - यद्यपि ये इंद्रिय-गोचर अर्थात् व्यक्त हैं, तथापि - सूक्ष्म कहलाते हैं। यहाँ 'सूक्ष्म' से छोटेका मतलब नहीं है। क्योंकि आकाश यद्यपि सूक्ष्म है, तथापि वह सारे जगतमें सर्वत्र व्याप्त है। इसलिये, सूक्ष्म शब्दसे 'स्थूलके विरुद्ध' या वायुसेभी अधिक महीन, यही अर्थ लेना चाहिये। 'स्थूल' और 'सूक्ष्म' शब्दोंसे किसी वस्तुकी शरीररचनाका ज्ञान होता है; और 'व्यक्त' एवं 'अव्यक्त' शब्दोंसे हमें यह बोध होता है, कि उस वस्तुका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें हो सकता है या नहीं। अतएव भिन्न भिन्न पदार्थोंमेंसे (चाहे वे दोनों सूक्ष्म हों तोभी) एक व्यक्त और दूसरा अव्यक्त हो सकता है। उदाहरणार्थ, यद्यपि हवा सूक्ष्म है, तथापि हमारी स्पर्शेंद्रियको उसका ज्ञान होता है, इसलिये उसे व्यक्त कहते हैं। और सब पदार्थोंकी मूल प्रकृति (या मूल द्रव्य) वायुसेभी अत्यंत सूक्ष्म है और उसका ज्ञान हमारी किसी इंद्रियको नहीं होता; इसलिये अव्यक्त कहते हैं। अब यहाँ प्रश्न हो सकता है, कि यदि इस प्रकृतिका ज्ञान किसीभी इंद्रियको नहीं होता, तो उसका अस्तित्व सिद्ध करनेके लिये प्रमाण है? इस प्रश्नका उत्तर सांख्यवादी इस प्रकार देते हैं, कि अनेक व्यक्त पदार्थोंके क्या अवलोकनसे सत्कार्यवादके अनुसार यही अनुमान सिद्ध होता है, कि इन सब पदार्थोंका मूलरूप (प्रकृति) यद्यपि इंद्रियोंको प्रत्यक्ष गोचर न हो, तथापि उसका अस्तित्व सूक्ष्म रूपसे अवश्य होनाही चाहिये (सां. का. ८)। वेदान्तियोंनेभी ब्रह्मका अस्तित्व सिद्ध करनेके लिये इसी युक्तिवादका स्वीकार किया है (कठ. ६. १२, १३ पर शांकरभाष्य देखो)। यदि हम प्रकृतिको इस प्रकार अत्यंत सूक्ष्म और अव्यक्त मान लें, तो नैयायिकोंके परमाणुकी जड़ही उखड़ जाती है। क्योंकि परमाणु यद्यपि अव्यक्त और असंख्य हो सकते हैं, तथापि प्रत्येक परमाणुके स्वतंत्र व्यक्ति या अवयव हो जानेके कारण यह प्रश्नभी शेष रह जाता है, कि दो परमाणुओंके बीचमें कौनसा पदार्थ है? इसी कारण सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त है, कि प्रकृतिमें परमाणुरूप अवयव- भेद नहीं है?। किंतु वह सदैव एकसे एक लगीं हुई - बीचमें थोड़ाभी अंतर न छोड़ती हुई - एकही समान है; अथवा यों कहिये कि वह अव्यक्त (अर्थात् इंद्रियोंको गोचर न होनेवाले) और निरवयवरूपसे निरंतर और सर्वत्र है। परब्रह्मका वर्णन करते हुए दासबोध (दा. २०.२.३) में श्रीसमर्थ रामदासस्वामी कहते हैं, "जिधर देखिये, उधरही वह अपार है, उसका किसी ओर पार नहीं है। वह एकही प्रकारका और स्वतंत्र है, उसमें द्वैत (या और कुछ) नहीं है।"* सांख्यवादियोंके 'प्रकृति' विषयमेंभी यही वर्णन उपयुक्त है। त्रिगुणात्मक प्रकृति अव्यक्त, स्वयंभू और एकही प्रकारकी है; और चारों ओर निरंतर व्याप्त है। आकाश, वायु, आदि भेद पीछेसे
- हिंदी दासबोध, पृष्ठ ४८१ (चित्रशाला, पूना)।
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हुए; और यद्यपि वे सूक्ष्म हैं, तथापि व्यक्त हैं, और इन सबकी मूल प्रकृति एकही-सी तथा सर्वव्यापी और अव्यक्त है। स्मरण रहे, कि वेदान्तियोंके 'परब्रह्म' में और सांख्य- वादियोंकी 'प्रकृति'में आकाश-पातालका अंतर है। उसका कारण यह है, कि परब्रह्म चैतन्यरूप और निर्गुण है; परंतु प्रकृति जडरूप और सत्त्वरजतमोमयी अर्थात् सगुण है। इस विषयपर अधिक विचार आगे किया जायगा। यहाँ सिर्फ़ यही विचार करना है कि, सांख्यवादियोंका मत क्या है। जब हम इस प्रकार 'सूक्ष्म' और 'स्थूल', 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' शब्दोंका अर्थ समझने लगे, तब कहना पड़ेगा कि सृष्टिके आरंभमें प्रत्येक पदार्थ सूक्ष्म और अव्यक्त प्रकृतिके रूपमें रहता है। फिर वह (चाहे सूक्ष्म हो या स्थूल हो) व्यक्त अर्थात् इंद्रियगोचर होता है, और जब प्रलय- कालमें इस व्यक्त स्वरूपका नाश होता है, तब फिर वह पदार्थ अव्यक्त प्रकृतिमें मिलकर अव्यक्त हो जाता है। गीतामेंभी यही मत दीख पड़ता है (गीता २. २८ और ८. १८)। सांख्यशास्त्रमें इस अव्यक्त प्रकृतिहीको 'अक्षर'भी कहते हैं; और प्रकृतिसे होनेवाले सब पदार्थोंको 'क्षर' कहते हैं। यहाँ 'क्षर' शब्दका अर्थ, संपूर्ण नाश नहीं है; किंतु सिर्फ़ व्यक्त स्वरूपका नाशही अपेक्षित है। प्रकृतिके औरभी अनेक नाम हैं - जैसे प्रधान, गुण-क्षोभिणी, बहुधानक, प्रसवधर्मिणी इत्यादि। सृष्टिके सब पदार्थोंका मुख्य मूल होनेके कारण उसे (प्रकृतिको) प्रधान कहते हैं। तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग स्वयं आपही करती है, इसलिये उसे गुण-क्षोभिणी कहते हैं। गुणत्रयीरूपी पदार्थभेदके बीज प्रकृतिमें हैं; इसलिये उसे बहुधानक कहते हैं। और प्रकृतिसेही सब पदार्थ उत्पन्न होते हैं, इसलिये उसे प्रसवधर्मिणीभी कहते हैं। इस प्रकृतिहीको वेदान्तशास्त्रमें 'माया' अर्थात् मायावी दिखावा कहते हैं। सृष्टिके सब पदार्थोंको 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' या 'क्षर' और 'अक्षर' इन दो विभागोंमें बाँटनेके बाद अब यह सोचना चाहिये कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें बतलाये गये आत्मा, मन, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियोंको सांख्यमतके अनुसार, किस विभाग या वर्गमें रखना चाहिये। क्षेत्र और इंद्रियाँ तो जड़ही हैं; इस कारण उनका समावेश व्यक्त पदार्थोंमें हो सकता है। परंतु मन, अहंकार, बुद्धि और विशेष करके आत्माके विषयमें क्या कहा जा सकता है? यूरोपके वर्तमान समयके प्रसिद्ध सृष्टि- शास्त्रज्ञ हेकेलने अपने ग्रंथमें लिखा है कि मन, बुद्धि, और आत्मा ये सब शरीरकेही धर्म हैं। उदाहरणार्थ, हम देखते हैं, कि जब मनुष्यका मस्तिष्क बिगड़ जाता है, तब उसकी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है; और वह पागलभी हो जाता है। इसी प्रकार सिरमें चोट लगनेसे जब मस्तिष्कका कोई भाग संज्ञारहित हो जाता है, तबभी उस भागकी मानसिक शक्ति नष्ट हो जाती है। सारांश यह है कि मनोधर्मभी जड़ मस्तिष्ककेही गुण हैं; अतएव ये जड़ वस्तुसे कभी अलग नहीं किये जा सकते; और इसीलिये मस्तिष्कके साथ साथ मनोधर्म और आत्माको 'व्यक्त' पदार्थोंके वर्गमें शामिल करना चाहिये। यदि यह जड़वाद मान लिया जाय, तो
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१६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अंतमें केवल अव्यक्त और जड़ प्रकृतिही शेष रह जाती है। क्योंकि सब व्यक्त पदार्थ इस मूल अव्यक्त-प्रकृतिसेही बने हैं। ऐसी अवस्थामें प्रकृतिके सिवा जगतका कर्ता या उत्पादक दूसरा कोईभी नहीं हो सकता। तब तो यही कहना होगा, कि मूल प्रकृतिकी शक्ति धीरे धीरे बढ़ती गई और अंतमें उसीको चैतन्य या आत्माका स्वरूप प्राप्त हो गया। सत्कार्यवादके समान, इस मूलप्रकृतिके कुछ कायदे या नियम बने हुए हैं। और उन्हीं नियमोंके अनुसार सब जगत् और साथही साथ मनुष्यभी कैदीके समान बर्ताव किया करते है। जड़ प्रकृतिके सिवा आत्मा कोई भिन्न वस्तु हैही नहीं; तब कहना नहीं होगा, कि आत्मा न तो अविनाशी है; और न स्वतंत्र। तब मोक्ष या मुक्तिकी आवश्यकताही क्या है ? प्रत्येक मनुष्य सोचता है, कि मैं अपनी इच्छाके अनुसार अमुक काम कर लूंगा; परंतु वह सब केवल भ्रम है। प्रकृति जिस ओर खींचेगी, उसी ओर मनुष्यको झुकना पड़ेगा। अथवा कै. शंकर मोरो रानडेके अनुसार कहना चाहिये, कि "यह सारा विश्व एक बहुत बड़ा कारागार है, प्राणिमात्र कैदी हैं; और पदार्थोंके गुण-धर्म बेड़ियां हैं! इन बेड़ियोंको कोई तोड़ नहीं सकता।" इस प्रकार सारी सजीव और निर्जीव सृष्टिका व्यवहार चल रहा है-बस यही हेकेलके मतका सारांश है। उसके मतानुसार सारी सृष्टिका मूलकारण एक जड़ और अव्यक्त प्रकृतिही है। इसलिये उसने अपने सिद्धान्तको सिर्फ़ * 'अद्वैत' कहा है। परंतु यह अद्वैत जड़मूलक है, अर्थात् अकेली जड़ प्रकृतिमेंही सब बातोंका समावेश करता है; इस कारण हम इसे जड़ाद्वैत या आधिभौतिक- शास्त्राद्वैत कहेंगे। हमारे सांख्यशास्त्रकार इस जड़ाद्वैतको नहीं मानते। वे यह मानते हैं, कि मन, बुद्धि और अहंकार पंचमहाभूतात्मक जड़ प्रकृतिहीके धर्म हैं; और सांख्य- शास्त्रमेंभी यही लिखा है, कि अव्यक्त प्रकृतिसे ही बुद्धि, अहंकार इत्यादि गुण क्रमसे उत्पन्न होते जाते हैं। परंतु उनका कथन है, कि जड़ प्रकृतिसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इतनाही नहीं; वरन् जिस प्रकार कोई मनुष्य अपनेही कंधोंपर बैठ नहीं सकता, उसी प्रकार प्रकृतिको जाननेवाला या देखनेवाला जब- तक प्रकृतिसे भिन्न न हो, तबतक वह "मैं यह जानता हूँ-वह जानता हूँ" इत्यादि व्यवहारका उपयोग करही नहीं सकता। और इस जगत्के व्यवहारोंकी ओर देखनेसे तो सब लोगोंका यही अनुभव जान पड़ता है, कि "मैं जो कुछ देखता हूँ, या जानता हूँ, वह मुझसे भिन्न है।" इसलिये सांख्यशास्त्रवालोंने कहा है, कि ज्ञाता और ज्ञेय, देखनेवाला और देखनेकी वस्तु या प्रकृतिको देखनेवाला और जड़ प्रकृति, इन दोनोंको मूलताही पृथक् पृथक् मानना चाहिये (सां. का. १७)।
- हेकेलका मूल शब्द monism है। और इस विषयपर उसने स्वतंत्र ग्रंथभी लिखा है।
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६३ पिछले प्रकरणमें जिसे क्षेत्रज्ञ या आत्मा कहा है, वही यह देखनेवाला, ज्ञाता या उपभोग करनेवाला है; और इसे ही सांख्यशास्त्रमें 'पुरुष' या 'ज्ञ' (ज्ञाता) कहा गया हैं। यह ज्ञाता प्रकृतिसे भिन्न है। इस कारण निसर्गसेही प्रकृतिके तीनों ( सत्त्व, रज और तम ) गुणोंके परे रहता है। अर्थात् यह निर्विकार और निर्गुण है; और जानने या देखनेके सिवा कुछभी नहीं करता। इससे यहभी मालूम हो जाता है, कि जगत्में जो घटनाएँ होती रहती हैं, वे सब प्रकृतिकेही खेल हैं। सारांश यह है, कि प्रकृति अचेतन या जड़ है; तो पुरुष सचेतन है। प्रकृति सब काम किया करती है; तो पुरुष उदासीन और अकर्ता है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है; तो पुरुष निर्गुण है। प्रकृति अंधी है; तो पुरुष साक्षी है। इस प्रकार इस सृष्टिमें ये दो भिन्न भिन्न तत्त्व अनादिसिद्ध, स्वतंत्र और स्वयंभू हैं - यही सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त है। इस बातको ध्यानमें रक्खेही भगवद्गीतामें पहले कहा गया है, कि “प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादि उभावपि” – प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं (गीता १३. १९)। इसके बाद उनका वर्णन इस प्रकार किया है। “कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ” अर्थात् देह और इंद्रियोंका व्यापार प्रकृति करती है; और “पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते” – अर्थात् पुरुष सुखदुःखोंका उपभोग करनेके लिये, कारण है। यद्यपि गीतामेंभी प्रकृति और पुरुष अनादि माने गये हैं, तथापि यह बात ध्यानमें रखनी चाहिये, कि सांख्यवादियोंके समान, गीतामें ये दोनों तत्त्व स्वतंत्र या स्वयंभू नहीं माने गये हैं। कारण यह है, कि गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने प्रकृतिको अपनी 'माया' कहा है (गीता ७. १४; १४. ३), और पुरुषके विषयमेंभी यही कहा है, कि “ममैवांशो जीवलोके” (गीता १५. ७) अर्थात् वह मेराही अंश है। इससे मालूम हो जाता है, कि गीता सांख्यशास्त्रसेभी बढ़ गई है। परंतु अभी इस बातकी ओर ध्यान न दे कर हम देखेंगे कि सांख्यशास्त्र आगे क्या कहता है। सांख्यशास्त्रके अनुसार सृष्टिके सब पदार्थोंके तीन वर्ग होते हैं। पहला अव्यक्त (मूल प्रकृति), दूसरा व्यक्त (प्रकृतिके विकार) और तीसरा पुरुष अर्थात् (ज्ञ)। परंतु इनमेंसे प्रलयकालके समय व्यक्त पदार्थोंका स्वरूप नष्ट हो जाता है, इसलिये अब मूलमें केवल प्रकृति और पुरुष ये दोही तत्त्व शेष रह जाते हैं। ये दोनों मूलतत्त्व, सांख्यवादियोंके मतानुसार अनादि और स्वयंभू हैं। वे लोग इसलिये सांख्योंको द्वैतवादी (दो मूल तत्त्व माननेवाले) कहते हैं। वे लोग प्रकृति और पुरुषके परे ईश्वर, काल, स्वभाव या अन्य किसीभी मूल तत्त्वको नहीं मानते।* इसका कारण यह है कि सगुण ईश्वर, काल या स्वभाव, ये सब व्यक्त होनेके कारण अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले व्यक्त पदार्थोंमेंही शामिल हैं।
- ईश्वरकृष्ण कट्टर निरीश्वरवादी था। उसने अपनी सांख्यकारिका की अंतिम उपसंहारात्मक तीन आर्याओंमें कहा है, कि मूल विषयपर ७० आर्याएँ थीं।
प्रकरण ४-६: सुख-दुःख विवेक, ज्ञान-कर्म समुच्चय व क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ
१६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और, यदि ईश्वरको निर्गुण मानें, तो सत्कार्यवादानुसार निर्गुण मूलतत्त्वसे त्रिगुणा- त्मक प्रकृति कभी उत्पन्न नहीं हो सकती। इसलिये, उन्होंने यह निश्चित सिद्धान्त किया है, कि प्रकृति और पुरुषको छोड़ कर इस सृष्टिका और कोई तीसरा मूल कारण नहीं है। इस प्रकार जब उन लोगोंने दोही मूल तत्त्व निश्चित कर लिये, तब उन्होंने अपने मतके अनुसार इस बातकोभी सिद्ध कर दिया है, कि इन दोनों मूलतत्त्वोंसे सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई है। वे कहते हैं, कि यद्यपि निर्गुण पुरुष स्वयं कुछभी कर नहीं सकता, तथापि जब प्रकृतिके साथ उसका संयोग होता है, तब जिस प्रकार गाय अपने बछड़ेके लिये दूध देती है, या लोहचुंबकके पास होनेसे लोहमें आकर्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार मूल अव्यक्त प्रकृति अपने गुणों ( सूक्ष्म और स्थूल ) का व्यक्त फैलाव पुरुषके सामने फैलाने लगती है ( सां. का. ५७)। यद्यपि पुरुष सचेतन और ज्ञाता है, तथापि केवल अर्थात् निर्गुण होनेके कारण स्वयं कर्म करनेके कोई साधन उसके पास नहीं हैं; और प्रकृति यद्यपि काम करने- वाली है, तथापि जड़ या अचेतन होनेके कारण वह नही जानती, कि क्या करना परंतु कोलब्रुक और विल्सनके अनुवादके साथ बंबईमें श्रीयुत तुकाराम तात्याने जो पुस्तक मुद्रित की है, उसमें मूल विषयपर केवल ६९ आर्याएँ हैं। इसलिये विल्सन साहबने अपने अनुवादमें यह संदेह प्रकट किया है, कि ७० वीं आर्या कौनसी है। परंतु वह आर्या उनको नहीं मिली; और उनकी शंकाका समाधान नहीं हुआ। हमारा मत है, कि वह वर्तमान ६१ वीं आर्याके आगे होगी। कारण यह है, कि ६१ वीं आर्यापर गौडपादाचार्यका जो भाष्य है, वह कुछ एकही आर्यापर नहीं है; किंतु दो आर्याओपर है और यदि इस भाष्यके प्रतीक पदोंको लेकर आर्या बनाई जाय तो वह इस प्रकार होगी :- कारणमीश्वरमेके ब्रुवते कालं परे स्वभावं वा । प्रजाः कथं निर्गुणतो व्यक्तः कालः स्वभावश्च ॥ यह आर्या पिछले और अगले संदर्भ ( अर्थ या भाव ) के अनुसारभी है। इस आर्यामें निरीश्वरमतका प्रतिपादन है, इसलिये जान पड़ता है, कि किसीने इसे पीछेसे निकाल डाला होगा। परंतु इस आर्याका शोधन करनेवाला मनुष्य इसका भाष्यभी निकाल डालना भूल गया। इसलिये अब हम इस आर्याका ठीक ठीक पता लगा सकते हैं; और इसीसे उस मनुष्यको धन्यवादही देना चाहिये। श्वेताश्वेत- रोपनिषद्के छठे अध्यायके पहले मंत्रमें प्रकट होता है, कि प्राचीन समयमें कुछ लोग स्वभाव और कालको - और वेदान्ती तो उसकेभी आगे बढ़कर ईश्वरको - जगत्का मूलकारण मानते थे। वह मंत्र यह है :- स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैषः महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ परंतु ईश्वरकृष्णने उपर्युक्त आर्याको वर्तमान ६१ वीं आर्याके बाद सिर्फ़ यह बतलानेके लिये रखा है, कि तीनों मूलकारण (अर्थात् स्वभाव, काल और ईश्वर) सांख्यवादियोंको मान्य नहीं हैं!