भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 202

कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५५ मतका निर्णय कई अध्यायोंमें किया गया है। परंतु उनमें वेदान्त-मतोंकाभी मिश्रण हो गया है; इसलिये कपिलके शुद्ध सांख्य-मतको जाननेके लिये दूसरे ग्रंथोंकोभी देखनेकी आवश्यकता होती है। इस कामके लिये उक्त सांख्यकारिकाकी अपेक्षा कोईभी अधिक प्राचीन ग्रंथ इस समय उपलब्ध नहीं है। भगवानने भगवद्गीतामें कहा है, कि "सिद्धानां कपिलो मुनिः" (गीता १०.२६) - सिद्धोंमेंसे कपिलमुनि मैं हूँ; - इससे कपिलकी योग्यता भली भाँति सिद्ध होती है। तथापि यह बात मालूम नहीं, कि कपिल ऋषि कहाँ और कब हुए। शांतिपर्व (मभा. शां. ३४०.६७) में एक जगह लिखा है, कि सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सन, सनत्सुजात, सनातन और कपिल ये सातों ब्रह्मदेवके मानसपुत्र हैं और इन्हें जन्महीसे ज्ञान हो गया था। दूसरे स्थान (मभा. शां. २१८) में कपिलके शिष्य आसुरि और उसके चेले पंचशिखने जनकको सांख्यशास्त्रका जो उपदेश दिया था उसका उल्लेख है। इसी प्रकार शांतिपर्व (मभा. शां. ३०१.१०८, १०९) में भीष्मने कहा है, कि सांख्योंने सृष्टि-रचना इत्यादिके बारेमें एक बार जो ज्ञान प्रचलित कर दिया है, वही "पुराण, इतिहास, अर्थशास्त्र" आदि सबमें पाया जाता है। वही क्यों; यहाँतक कहा गया है, कि "ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किंचित् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन्" - अर्थात् इस जगतका सब ज्ञान सांख्योंसेही प्राप्त हुआ है (मभा. शां. ३०१.१०९)। यदि इस बातपर ध्यान दिया जाय, कि वर्तमान समयमें पश्चिमी ग्रंथकार उत्क्रांतिवादका उपयोग सब जगह कैसे किया करते हैं; तो यह बात आश्चर्यजनक नहीं मालूम होती, कि इस देशके निवासियोंनेभी उत्क्रांतिवादकी बराबरीके संख्याशास्त्रका सर्वत्र कुछ अंशमें स्वीकार किया है। 'गुरुत्वाकर्षण' सृष्टिरचनाके 'उत्क्रांतितत्त्व'* या 'ब्रह्मात्मैक्य'के समान उदात्त विचार सैकड़ों बरसोंके बादही किसी महात्माके ध्यानमें आया करते हैं। इसलिये यह बात सामान्यतः सभी देशोंके ग्रंथोंमें पाई जाती है, कि जिस समय जो सामान्य सिद्धान्त या व्यापक तत्त्व समाजमें प्रचलित रहता है, उसके आधारपरही किसी ग्रंथके विषयका प्रतिपादन किया जाता है। आजकल कापिलसांख्यशास्त्रका अभ्यास प्रायः लुप्त हो गया है, इसीलिये यह प्रस्तावना करनी पड़ी। अब हम यह देखेंगे, कि इस शास्त्रके मुख्य सिद्धान्त कौन-से हैं। सांख्यशास्त्रका पहला सिद्धान्त यह है, कि इस संसारमें कोईभी नई वस्तु उत्पन्न नहीं होती। क्योंकि, शून्यसे - अर्थात् जो पहले थाही नहीं उससे -

  • Evolution Theory के अर्थमें 'उत्क्रांति-तत्त्व' का उपयोग आजकल किया जाता है, इसलिये हमनेभी यहाँ उसी शब्दका प्रयोग किया है। परंतु संस्कृतमें 'उत्क्रांति' शब्द का अर्थ मृत्यु है। इस कारण 'उत्क्रांति'के बदले गुणविकास, गुणोत्कर्ष, या गुणपरिणाम आदि सांख्यवादियोंके शब्दोंका उपयोग करना हमारी समझमें अधिक योग्य होगा।