भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 203

१५६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र शून्यको छोड़ और कुछभी प्राप्त हो नहीं सकता । इसलिये यह बात सदा ध्यानमें रखनी चाहिये, कि उत्पन्न वस्तुमें - अर्थात् कार्यमें - जो गुण दीख पड़ते हैं, वे गुण जिससे यह वस्तु उत्पन्न हुई है, उसमें ( अर्थात् कारणमें ) सूक्ष्म रीतिसे तो अवश्य होनेही चाहिये ( सां. का. ९)। बौद्ध और काणाद यह मानते हैं, कि पदार्थका नाश हो कर उससे दूसरा नया पदार्थ बनता है। उदाहरणार्थ, बीजका नाश होनेके बाद उससे अंकुर और अंकुरका नाश होनेके बाद उससे पेड़ होता है। परंतु सांख्य- शास्त्रियों और वेदान्तियोंको यह मत पसंद नहीं है। वे कहते हैं, कि वृक्षके बीजमें जो 'द्रव्य' हैं उनका नाश नहीं होता; किंतु वेही द्रव्य जमीनसे और वायुसे दूसरे द्रव्योंको खींच लिया करते हैं; और इसी कारणसे बीजको अंकुरका नया स्वरूप या अवस्था प्राप्त हो जाती है (वे. सू. शां. भा. २. १. १८)। इसी प्रकार जब लकड़ी जलती है, तब उसकेही राख या धुआँ आदि रूपांतर हो जाते हैं। लकड़ीके मूल 'द्रव्यों'का नाश हो कर धुआँ नामक कोई नया पदार्थ उत्पन्न नहीं होता। छांदोग्योपनिषद् (छां. ६. २. १) में कहा है, "कथमसतः सज्जायेत" - जो है ही नहीं - उससे जो है - वह कैसे प्राप्त हो सकता है? जगतके मूल कारणके लिये 'असत्' शब्दका उपयोग कभी कभी उपनिषदोंमें किया गया है, (छां. ३. १९. १; तै. २. ७. १); परंतु यहाँ 'असत्'का अर्थ 'अभाव नहीं' नहीं है; किंतु वेदान्तसूत्रों (वे. सू. २. १. १६, १७) में यह निश्चय किया गया है, कि 'असत्' शब्दसे केवल नामरूपात्मक व्यक्त स्वरूप या अवस्थाका अभावही विवक्षित है। दूधसेही दही बनता है, पानीसे नहीं; तिलसेही तेल निकलता है, बालूसे नहीं; इत्यादि प्रत्यक्ष देखे हुए अनुभवोंसेभी यही सिद्धान्त प्रकट होता है। यदि हम यह मान लें, कि 'कारण' में जो गुण नहीं हैं, वे 'कार्य'में स्वतंत्र रीतिसे उत्पन्न होते हैं; तो फिर हम इसका कारण नहीं बतला सकते, कि पानीसे दही क्यों नहीं बनता ? सारांश यह है, कि जो मूलमें हैही नहीं, उससे अभी जो अस्तित्वमें है, वह उत्पन्न नहीं हो सकता। इसलिये सांख्यवादियोंने यह सिद्धान्त निकाला है, कि किसी कार्यके वर्तमान द्रव्यांश और गुण मूल कारणमेंभी किसी न किसी रूपसे स्थिर रहते हैं। इसी सिद्धान्तको 'सत्कार्यवाद' कहते हैं। अर्वाचीन पदार्थ- विज्ञानके ज्ञाताओंनेभी यही सिद्धान्त ढूंढ़ निकाला है, कि पदार्थोंके जड़ द्रव्य और कर्मशक्ति दोनों सर्वदा स्थिर रहते हैं। और किसी पदार्थके चाहे जितने रूपांतर हो जायें; तोभी अन्तमें सृष्टिके कुल द्रव्यांशका और कर्मशक्तिका जोड़ हमेशा एकसा बना रहता है। उदाहरणार्थ, जब हम दीपकको जलता देखते हैं, तब तेलभी धीरे धीरे कम होता जाता है; और अंतमें वह नष्ट हुआसा दीख पड़ता है। यद्यपि यह सब तेल जल जाता है, तथापि उसके परमाणुओंका बिलकुलही नाश नहीं हो जाता। उन परमाणुओंका अस्तित्व धुएँ या काजल या अन्य सूक्ष्म द्रव्योंके रूपमें बना रहता है। यदि हम इन सूक्ष्म द्रव्योंको एकत्र करके तौलें तो मालूम