श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 204, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ेंकापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५७ होगा, कि उनका तौल या वज़न तेल और तेलके जलते समय उसमें मिले हुए वायुके पदार्थोंके तौलके बराबर होता है। अब तो यहभी सिद्ध हो चुका है, कि उक्त नियम कर्मशक्तिके विषयमेंभी लगाया जा सकता है। यह बात याद रखनी चाहिये, कि यद्यपि आधुनिक पदार्थविज्ञानशास्त्रका और सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त दिखनेमें एक-सा है, फिरभी सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त केवल एक पदार्थसे दूसरे पदार्थकी उत्पत्तिके विषयमें - अर्थात् सिर्फ कार्य-कारण-भावहीके संबंधमें उपयुक्त होता है। परंतु, अर्वाचीन पदार्थविज्ञानशास्त्रका सिद्धान्त इससे अधिक व्यापक है। 'कार्य'का कोईभी गुण 'कारण'के बाहरके गुणोंसे उत्पन्न नहीं हो सकता। इतनाही नहीं; किंतु जब कारणको कार्यका स्वरूप प्राप्त होता है, तब उस कार्यमें रहनेवाले द्रव्यांश और कर्म-शक्तिका कुछभी नाश नहीं होता और पदार्थकी भिन्न भिन्न अवस्थाओंके द्रव्यांश और कर्मशक्तिके जोड़का वज़नभी सदैव एकही-सा रहता है - न तो वह घटता है और न बढ़ता है। यह बात प्रत्यक्ष प्रयोगसे गणितके द्वारा सिद्ध कर दी गई है और यही उक्त दोनों सिद्धान्तोंकी महत्त्वकी विशेषता है। इस प्रकार जब हम विचार करते हैं, तो हमें जान पड़ता है, कि भगवद्गीताके "नासतो विद्यते भावः" - जो रही नहीं, उसका कभीभी अस्तित्व हो नहीं सकता - इत्यादि सिद्धान्त जो दूसरे अध्यायके आरंभमें दिये हैं (गीता २. १६), वे यद्यपि देखनेमें सत्कार्यवादके समान दीख पड़े, तोभी उनकी समता केवल कार्यकारणात्मक सत्कार्यवादकी अपेक्षा अर्वाचीन पदार्थ-विज्ञानशास्त्रके सिद्धान्तोंके साथ अधिक है। छांदोग्योपनिषद्के उपर्युक्त वचनकाभी यही भावार्थ है। सारांश, सत्कार्यवादका सिद्धान्त वेदान्तियोंको मान्य है; परंतु अद्वैत वेदान्तशास्त्रका मत है, कि इस सिद्धान्तका उपयोग सगुण सृष्टिके परे नहीं किया जा सकता। और निर्गुणसे सगुणकी उत्पत्ति कैसे दीख पड़ती है इस बातकी उपपत्ति औरही प्रकारसे लगानी चाहिये। इस वेदान्त-मतका विचार आगे चलकर अध्यात्म-प्रकरणमें विस्तृत रीतिसे किया जायगा। इस समय तो हमें सिर्फ यही विचार करना है, कि सांख्यवादियोंकी पहुँच कहाँतक है। इसलिये अब हम इस बातका विचार करेंगे, कि सत्कार्यवादका सिद्धान्त मानकर सांख्योंने क्षर-अक्षर शास्त्रमें उसका उपयोग कैसे किया है। सांख्यमतानुसार जब सत्कार्यवाद सिद्ध हो जाता है तब यह मत आप-ही-आप गिर जाता है, कि दृश्यसृष्टिकी उत्पत्ति शून्यसे अर्थात् किसी पदार्थके पहले न रहते हुई है। क्योंकि, शून्यसे अर्थात् जो कुछभी नहीं है, उससे जो "अस्तित्वमें है" वह उत्पन्न नही हो सकता। इस बातसे यह साफ़ साफ़ सिद्ध होता है, कि सृष्टि किसी- न-किसी पदार्थसे उत्पन्न हुई है और इस समय सृष्टिमें जो गुण हमें दीख पड़ते हैं, वेही इसके मूलपदार्थमेंभी होने चाहिये। अब यदि हम सृष्टिकी ओर देखें, तो हमें वृक्ष, पशु, मनुष्य, पत्थर, सोना, चांदी, हीरा, जल, वायु इत्यादि अनेक पदार्थ दीख पड़ते हैं, और इन सबके रूप तथा गुणभी भिन्न भिन्न हैं। सांख्यवादियोंका सिद्धान्त है, कि