भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 956 में से

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पृष्ठ 205

१५८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र यह भिन्नता या नानात्व मूलमें - अर्थात् मूल पदार्थमें - नहीं है; किंतु मूलमें सब वस्तुओंका द्रव्य एकही है। अर्वाचीन रसायनशास्त्रज्ञोंने भिन्न भिन्न द्रव्योंका पृथक्करण करके पहले ६२ मूलतत्त्व ढूंढ़ निकाले थे; परंतु अब पश्चिमी विज्ञानवेत्ताओंनेभी यह निश्चय कर लिया है, कि ये ६२ मूल तत्त्व स्वतंत्र या स्वयंसिद्ध नहीं हैं। किंतु इन सबकी जड़में कोई-न-कोई एकही पदार्थ है; और उस पदार्थहीसे सूर्य, चंद्र, तारागण, पृथ्वी इत्यादि सारी सृष्टि उत्पन्न हुई है। इसलिये अब उक्त सिद्धान्तका अधिक विवेचन आवश्यक नहीं है। जगतके सब पदार्थोंका जो यह मूलद्रव्य है, उसेही सांख्यशास्त्रमें 'प्रकृति' कहते हैं। प्रकृतिका अर्थ 'मूलधर्म, है। इस प्रकृतिसे आगे जो पदार्थ बनते हैं, उन्हें 'विकृति' अर्थात् मूलद्रव्यके विकार कहते हैं। परंतु यद्यपि सब पदार्थोंमें मूल द्रव्य एकही है, तथापि यदि इस मूल द्रव्यमें गुणभी एकही हो, तो सत्कार्यवादानुसार इस एकही गुणसे अनेक गुणोंका उत्पन्न होना संभव नहीं है। और इधर तो जब हम इस जगतके पत्थर, मिट्टी, पानी, सोना इत्यादि भिन्न भिन्न पदार्थोंकी ओर देखते हैं, तब उनमें भिन्न भिन्न अनेक गुण पाये जाते हैं। इसलिये पहले सब पदार्थोंके गुणोंका निरीक्षण करके सांख्यवादियोंने इन गुणोंके सत्त्व, रज और तम ये तीन भेद या वर्ग कर दिये हैं। इसका कारण यही है, कि जब हम किसीभी पदार्थको देखते हैं, तब स्वभावतः उसकी दो भिन्न भिन्न अवस्थाएँ दीख पड़ती हैं; - पहली शुद्ध, निर्मल या पूर्णावस्था और दूसरी उसके विरुद्ध निकृष्टावस्था। परंतु साथही साथ निकृष्टावस्थासे पूर्णावस्थाकी ओर बढ़नेकी उस पदार्थकी प्रवृत्तिभी दृष्टिगोचर हुआ करती है; यही तीसरी अवस्था है। इन तीनों अवस्थाओंमेंसे शुद्धा- वस्था या पूर्णावस्थाको सात्त्विक, निकृष्टावस्थाको तामसिक और प्रवर्तकावस्थाको राजसिक कहते हैं। इस प्रकार सांख्यवादी कहते हैं, कि सत्त्व, रज और तम तीनों गुण सब पदार्थोंके मूलद्रव्यमें अर्थात् उनकी प्रकृतिमें आरंभसेही रहा करते हैं। इसलिये यदि यह कहा जाय, कि इन तीन गुणोंहीको प्रकृति कहते हैं, तो अनुचित नहीं होगा। इन तीनों गुणोंमेंसे प्रत्येक गुणका जोर आरंभमें समान या बराबर रहता है, इसीलिये पहले पहल यह प्रकृति साम्यावस्थामें रहती है। यह साम्यावस्था जगतके आरंभमें थी; और जगत्‌का लय हो जानेपर वैसीही फिर हो जायगी। साम्यावस्थामें कुछभी हल- चल नहीं होती, सब कुछ स्तब्ध रहता है। परंतु जब उक्त तीनों गुण न्यूनाधिक होने लगते हैं, तब प्रवृत्त्यात्मक रजोगुणके कारण मूल प्रकृतिसे भिन्न भिन्न पदार्थ उत्पन्न होने लगते हैं; और सृष्टिका आरंभ होने लगता है। अब यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है, कि यदि पहले सत्त्व, रज और तम ये दोनों गुण साम्यावस्थामें थे, तो इनमें न्यूनाधिकता कैसे उत्पन्न हुई है ? इस प्रश्नका सांख्यवादी यही उत्तर देते हैं, कि यह प्रकृतिका मूलभूत धर्मही है (सां. का. ६१)। यद्यपि प्रकृति जड़ है, तथापि वह आप-ही-आप ये सब व्यवहार करती रहती है। इन तीनों गुणोंमेंसे सत्त्वगुणका लक्षण ज्ञान अर्थात् जानना और तमोगुणका लक्षण अज्ञान है। रजोगुण बुरे या भले

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