भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 206

कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १५९ कार्यका प्रवर्तक है। ये तीनों गुण कभी अलग अलग नहीं रह सकते। सब पदार्थोंमें सत्त्व, रज और तम इन तीनोंका मिश्रण रहताही है; और यह मिश्रण हमेशा इन तीनोंका परस्पर न्यूनाधिकतासे हुआ करता है। इसलिये यद्यपि मूलद्रव्य एक ही है, तोभी गुणभेदके कारण एक मूलद्रव्यकेही सोना, लोहा, मिट्टी, जल, आकाश, मनुष्यका शरीर इत्यादि भिन्न भिन्न अनेक विकार हो जाते हैं। जिसे हम सात्त्विक गुणका पदार्थ कहते हैं, उसमें रज और तमकी अपेक्षा, सत्त्वगुणका जोर या परिमाण अधिक रहता है, इस कारण उस पदार्थमें हमेशा रहनेवाले रज औरतम - दोनों गुण दब जाते हैं और वे हमें दीख नहीं पड़ते। वस्तुतः, सत्त्व, रज और तम - तीनों गुण अन्य पदार्थोंके समान, सात्त्विक पदार्थमेंभी विद्यमान रहते हैं। केवल सत्त्वगुणका, केवल रजोगुणका, या केवल तमोगुणका कोई पदार्थही नहीं है। प्रत्येक पदार्थमें तीनोंका रगड़ा-झगड़ा चलाही करता है; और इस झगड़ेमें जो गुण प्रबल हो जाता है, उसीके अनुसार हम प्रत्येक पदार्थको सात्त्विक, राजस या तामस कहा करते हैं (सां. का. १२; महा. अश्व - अनुगीता - ३६ और शां. ३०५) । उदाहरणार्थ, हमारे शरीरमें जब रज और तम गुणोंपर सत्त्वका प्रभाव जम जाता है, तब हमारे अंतःकरणमें ज्ञान उत्पन्न होता है, सत्यका परिचय होने लगता है, और चित्तवृत्ति शांत हो जाती है। यह नहीं समझना चाहिये, कि उस समय हमारे शरीरमें रजोगुण और तमोगुण बिलकुलही नहीं होते; बल्कि वे सत्त्वगुणके प्रभावसे दब जाते हैं, इसलिये उनका कुछ अधिकार चलने नहीं पाता (गीता १४. १०)। यदि सत्त्वके बदले रजोगुण प्रबल हो जाय, तो हमारे अंतःकरणमें लोभ जागृत हो जाता है, लालच बढ़ने लगता है, और वह हमें अनेक बुरे कामोंमें प्रवृत्त करता है। इसी प्रकार जब सत्त्व और रजकी अपेक्षा तमोगुण प्रबल हो जाता है, तब निद्रा, आलस्य, स्मृतिभ्रंश, इत्यादि दोष शरीरमें उत्पन्न हो जाते हैं। तात्पर्य यह है, कि इस जगत्के पदार्थोंमें सोना, लोहा, पारा इत्यादि जो अनेकता या भिन्नता दीख पड़ती है, वह प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंकीही परस्पर-न्यूनाधिकता या संघर्षका फल है। मूल प्रकृति यद्यपि एकही है, तोभी यह अनेकता या भिन्नता कैसे उत्पन्न हो जाती है - बस, इसीके विचारको 'विज्ञान' कहते हैं। इसीमें सब आधिभौतिक शास्त्रोंकाभी समावेश हो जाता है। उदाहरणार्थ, रसायनशास्त्र, विद्युच्छास्त्र, पदार्थ विज्ञानशास्त्र, ये सब विविध ज्ञान विज्ञानही हैं। साम्यावस्थामें रहनेवाली प्रकृतिको सांख्यशास्त्रमें 'अव्यक्त' अर्थात् इंद्रियोंको गोचर न होनेवाली कहा है। इस प्रकृतिके सत्त्व, रज और तम इन तीनों गुणोंकी पर- स्पर-न्यूनाधिकतासे उत्पन्न जो अनेक पदार्थ हमारी इंद्रियोंको गोचर होते हैं, अर्थात् जिन्हें हम देखते हैं, चखते हैं, सूंघते हैं, या स्पर्श करते हैं, उन्हें सांख्यशास्त्रमें 'व्यक्त' कहा है। स्मरण रहे, कि जो पदार्थ हमारी इंद्रियोंको स्पष्ट रीतिसे गोचर हो सकते हैं, वे सब 'व्यक्त' कहलाते हैं। चाहे फिर वे पदार्थ अपनी आकृतिके कारण, रूपके