श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 207, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें१६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण, गंधके कारण, या किसी अन्य गुणके कारण व्यक्त होते हों। व्यक्त पदार्थ अनेक हैं और उनमेंसे कुछ, जैसे पत्थर, पेड़, पशु इत्यादि स्थूल कहलाते हैं; और कुछ, जैसे मन, बुद्धि, आकाश इत्यादि - यद्यपि ये इंद्रिय-गोचर अर्थात् व्यक्त हैं, तथापि - सूक्ष्म कहलाते हैं। यहाँ 'सूक्ष्म' से छोटेका मतलब नहीं है। क्योंकि आकाश यद्यपि सूक्ष्म है, तथापि वह सारे जगतमें सर्वत्र व्याप्त है। इसलिये, सूक्ष्म शब्दसे 'स्थूलके विरुद्ध' या वायुसेभी अधिक महीन, यही अर्थ लेना चाहिये। 'स्थूल' और 'सूक्ष्म' शब्दोंसे किसी वस्तुकी शरीररचनाका ज्ञान होता है; और 'व्यक्त' एवं 'अव्यक्त' शब्दोंसे हमें यह बोध होता है, कि उस वस्तुका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें हो सकता है या नहीं। अतएव भिन्न भिन्न पदार्थोंमेंसे (चाहे वे दोनों सूक्ष्म हों तोभी) एक व्यक्त और दूसरा अव्यक्त हो सकता है। उदाहरणार्थ, यद्यपि हवा सूक्ष्म है, तथापि हमारी स्पर्शेंद्रियको उसका ज्ञान होता है, इसलिये उसे व्यक्त कहते हैं। और सब पदार्थोंकी मूल प्रकृति (या मूल द्रव्य) वायुसेभी अत्यंत सूक्ष्म है और उसका ज्ञान हमारी किसी इंद्रियको नहीं होता; इसलिये अव्यक्त कहते हैं। अब यहाँ प्रश्न हो सकता है, कि यदि इस प्रकृतिका ज्ञान किसीभी इंद्रियको नहीं होता, तो उसका अस्तित्व सिद्ध करनेके लिये प्रमाण है? इस प्रश्नका उत्तर सांख्यवादी इस प्रकार देते हैं, कि अनेक व्यक्त पदार्थोंके क्या अवलोकनसे सत्कार्यवादके अनुसार यही अनुमान सिद्ध होता है, कि इन सब पदार्थोंका मूलरूप (प्रकृति) यद्यपि इंद्रियोंको प्रत्यक्ष गोचर न हो, तथापि उसका अस्तित्व सूक्ष्म रूपसे अवश्य होनाही चाहिये (सां. का. ८)। वेदान्तियोंनेभी ब्रह्मका अस्तित्व सिद्ध करनेके लिये इसी युक्तिवादका स्वीकार किया है (कठ. ६. १२, १३ पर शांकरभाष्य देखो)। यदि हम प्रकृतिको इस प्रकार अत्यंत सूक्ष्म और अव्यक्त मान लें, तो नैयायिकोंके परमाणुकी जड़ही उखड़ जाती है। क्योंकि परमाणु यद्यपि अव्यक्त और असंख्य हो सकते हैं, तथापि प्रत्येक परमाणुके स्वतंत्र व्यक्ति या अवयव हो जानेके कारण यह प्रश्नभी शेष रह जाता है, कि दो परमाणुओंके बीचमें कौनसा पदार्थ है? इसी कारण सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त है, कि प्रकृतिमें परमाणुरूप अवयव- भेद नहीं है?। किंतु वह सदैव एकसे एक लगीं हुई - बीचमें थोड़ाभी अंतर न छोड़ती हुई - एकही समान है; अथवा यों कहिये कि वह अव्यक्त (अर्थात् इंद्रियोंको गोचर न होनेवाले) और निरवयवरूपसे निरंतर और सर्वत्र है। परब्रह्मका वर्णन करते हुए दासबोध (दा. २०.२.३) में श्रीसमर्थ रामदासस्वामी कहते हैं, "जिधर देखिये, उधरही वह अपार है, उसका किसी ओर पार नहीं है। वह एकही प्रकारका और स्वतंत्र है, उसमें द्वैत (या और कुछ) नहीं है।"* सांख्यवादियोंके 'प्रकृति' विषयमेंभी यही वर्णन उपयुक्त है। त्रिगुणात्मक प्रकृति अव्यक्त, स्वयंभू और एकही प्रकारकी है; और चारों ओर निरंतर व्याप्त है। आकाश, वायु, आदि भेद पीछेसे
- हिंदी दासबोध, पृष्ठ ४८१ (चित्रशाला, पूना)।