भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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पृष्ठ 208

[Page-header] कपिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६१ [/Page-header]

हुए; और यद्यपि वे सूक्ष्म हैं, तथापि व्यक्त हैं, और इन सबकी मूल प्रकृति एकही-सी तथा सर्वव्यापी और अव्यक्त है। स्मरण रहे, कि वेदान्तियोंके 'परब्रह्म' में और सांख्य- वादियोंकी 'प्रकृति'में आकाश-पातालका अंतर है। उसका कारण यह है, कि परब्रह्म चैतन्यरूप और निर्गुण है; परंतु प्रकृति जडरूप और सत्त्वरजतमोमयी अर्थात् सगुण है। इस विषयपर अधिक विचार आगे किया जायगा। यहाँ सिर्फ़ यही विचार करना है कि, सांख्यवादियोंका मत क्या है। जब हम इस प्रकार 'सूक्ष्म' और 'स्थूल', 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' शब्दोंका अर्थ समझने लगे, तब कहना पड़ेगा कि सृष्टिके आरंभमें प्रत्येक पदार्थ सूक्ष्म और अव्यक्त प्रकृतिके रूपमें रहता है। फिर वह (चाहे सूक्ष्म हो या स्थूल हो) व्यक्त अर्थात् इंद्रियगोचर होता है, और जब प्रलय- कालमें इस व्यक्त स्वरूपका नाश होता है, तब फिर वह पदार्थ अव्यक्त प्रकृतिमें मिलकर अव्यक्त हो जाता है। गीतामेंभी यही मत दीख पड़ता है (गीता २. २८ और ८. १८)। सांख्यशास्त्रमें इस अव्यक्त प्रकृतिहीको 'अक्षर'भी कहते हैं; और प्रकृतिसे होनेवाले सब पदार्थोंको 'क्षर' कहते हैं। यहाँ 'क्षर' शब्दका अर्थ, संपूर्ण नाश नहीं है; किंतु सिर्फ़ व्यक्त स्वरूपका नाशही अपेक्षित है। प्रकृतिके औरभी अनेक नाम हैं - जैसे प्रधान, गुण-क्षोभिणी, बहुधानक, प्रसवधर्मिणी इत्यादि। सृष्टिके सब पदार्थोंका मुख्य मूल होनेके कारण उसे (प्रकृतिको) प्रधान कहते हैं। तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग स्वयं आपही करती है, इसलिये उसे गुण-क्षोभिणी कहते हैं। गुणत्रयीरूपी पदार्थभेदके बीज प्रकृतिमें हैं; इसलिये उसे बहुधानक कहते हैं। और प्रकृतिसेही सब पदार्थ उत्पन्न होते हैं, इसलिये उसे प्रसवधर्मिणीभी कहते हैं। इस प्रकृतिहीको वेदान्तशास्त्रमें 'माया' अर्थात् मायावी दिखावा कहते हैं। सृष्टिके सब पदार्थोंको 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' या 'क्षर' और 'अक्षर' इन दो विभागोंमें बाँटनेके बाद अब यह सोचना चाहिये कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें बतलाये गये आत्मा, मन, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियोंको सांख्यमतके अनुसार, किस विभाग या वर्गमें रखना चाहिये। क्षेत्र और इंद्रियाँ तो जड़ही हैं; इस कारण उनका समावेश व्यक्त पदार्थोंमें हो सकता है। परंतु मन, अहंकार, बुद्धि और विशेष करके आत्माके विषयमें क्या कहा जा सकता है? यूरोपके वर्तमान समयके प्रसिद्ध सृष्टि- शास्त्रज्ञ हेकेलने अपने ग्रंथमें लिखा है कि मन, बुद्धि, और आत्मा ये सब शरीरकेही धर्म हैं। उदाहरणार्थ, हम देखते हैं, कि जब मनुष्यका मस्तिष्क बिगड़ जाता है, तब उसकी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है; और वह पागलभी हो जाता है। इसी प्रकार सिरमें चोट लगनेसे जब मस्तिष्कका कोई भाग संज्ञारहित हो जाता है, तबभी उस भागकी मानसिक शक्ति नष्ट हो जाती है। सारांश यह है कि मनोधर्मभी जड़ मस्तिष्ककेही गुण हैं; अतएव ये जड़ वस्तुसे कभी अलग नहीं किये जा सकते; और इसीलिये मस्तिष्कके साथ साथ मनोधर्म और आत्माको 'व्यक्त' पदार्थोंके वर्गमें शामिल करना चाहिये। यदि यह जड़वाद मान लिया जाय, तो

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