श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अंतमें केवल अव्यक्त और जड़ प्रकृतिही शेष रह जाती है। क्योंकि सब व्यक्त पदार्थ इस मूल अव्यक्त-प्रकृतिसेही बने हैं। ऐसी अवस्थामें प्रकृतिके सिवा जगतका कर्ता या उत्पादक दूसरा कोईभी नहीं हो सकता। तब तो यही कहना होगा, कि मूल प्रकृतिकी शक्ति धीरे धीरे बढ़ती गई और अंतमें उसीको चैतन्य या आत्माका स्वरूप प्राप्त हो गया। सत्कार्यवादके समान, इस मूलप्रकृतिके कुछ कायदे या नियम बने हुए हैं। और उन्हीं नियमोंके अनुसार सब जगत् और साथही साथ मनुष्यभी कैदीके समान बर्ताव किया करते है। जड़ प्रकृतिके सिवा आत्मा कोई भिन्न वस्तु हैही नहीं; तब कहना नहीं होगा, कि आत्मा न तो अविनाशी है; और न स्वतंत्र। तब मोक्ष या मुक्तिकी आवश्यकताही क्या है ? प्रत्येक मनुष्य सोचता है, कि मैं अपनी इच्छाके अनुसार अमुक काम कर लूंगा; परंतु वह सब केवल भ्रम है। प्रकृति जिस ओर खींचेगी, उसी ओर मनुष्यको झुकना पड़ेगा। अथवा कै. शंकर मोरो रानडेके अनुसार कहना चाहिये, कि "यह सारा विश्व एक बहुत बड़ा कारागार है, प्राणिमात्र कैदी हैं; और पदार्थोंके गुण-धर्म बेड़ियां हैं! इन बेड़ियोंको कोई तोड़ नहीं सकता।" इस प्रकार सारी सजीव और निर्जीव सृष्टिका व्यवहार चल रहा है-बस यही हेकेलके मतका सारांश है। उसके मतानुसार सारी सृष्टिका मूलकारण एक जड़ और अव्यक्त प्रकृतिही है। इसलिये उसने अपने सिद्धान्तको सिर्फ़ * 'अद्वैत' कहा है। परंतु यह अद्वैत जड़मूलक है, अर्थात् अकेली जड़ प्रकृतिमेंही सब बातोंका समावेश करता है; इस कारण हम इसे जड़ाद्वैत या आधिभौतिक- शास्त्राद्वैत कहेंगे। हमारे सांख्यशास्त्रकार इस जड़ाद्वैतको नहीं मानते। वे यह मानते हैं, कि मन, बुद्धि और अहंकार पंचमहाभूतात्मक जड़ प्रकृतिहीके धर्म हैं; और सांख्य- शास्त्रमेंभी यही लिखा है, कि अव्यक्त प्रकृतिसे ही बुद्धि, अहंकार इत्यादि गुण क्रमसे उत्पन्न होते जाते हैं। परंतु उनका कथन है, कि जड़ प्रकृतिसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इतनाही नहीं; वरन् जिस प्रकार कोई मनुष्य अपनेही कंधोंपर बैठ नहीं सकता, उसी प्रकार प्रकृतिको जाननेवाला या देखनेवाला जब- तक प्रकृतिसे भिन्न न हो, तबतक वह "मैं यह जानता हूँ-वह जानता हूँ" इत्यादि व्यवहारका उपयोग करही नहीं सकता। और इस जगत्के व्यवहारोंकी ओर देखनेसे तो सब लोगोंका यही अनुभव जान पड़ता है, कि "मैं जो कुछ देखता हूँ, या जानता हूँ, वह मुझसे भिन्न है।" इसलिये सांख्यशास्त्रवालोंने कहा है, कि ज्ञाता और ज्ञेय, देखनेवाला और देखनेकी वस्तु या प्रकृतिको देखनेवाला और जड़ प्रकृति, इन दोनोंको मूलताही पृथक् पृथक् मानना चाहिये (सां. का. १७)।
- हेकेलका मूल शब्द monism है। और इस विषयपर उसने स्वतंत्र ग्रंथभी लिखा है।