श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
१६० गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र कारण, गंधके कारण, या किसी अन्य गुणके कारण व्यक्त होते हों। व्यक्त पदार्थ अनेक हैं और उनमेंसे कुछ, जैसे पत्थर, पेड़, पशु इत्यादि स्थूल कहलाते हैं; और कुछ, जैसे मन, बुद्धि, आकाश इत्यादि - यद्यपि ये इंद्रिय-गोचर अर्थात् व्यक्त हैं, तथापि - सूक्ष्म कहलाते हैं। यहाँ 'सूक्ष्म' से छोटेका मतलब नहीं है। क्योंकि आकाश यद्यपि सूक्ष्म है, तथापि वह सारे जगतमें सर्वत्र व्याप्त है। इसलिये, सूक्ष्म शब्दसे 'स्थूलके विरुद्ध' या वायुसेभी अधिक महीन, यही अर्थ लेना चाहिये। 'स्थूल' और 'सूक्ष्म' शब्दोंसे किसी वस्तुकी शरीररचनाका ज्ञान होता है; और 'व्यक्त' एवं 'अव्यक्त' शब्दोंसे हमें यह बोध होता है, कि उस वस्तुका प्रत्यक्ष ज्ञान हमें हो सकता है या नहीं। अतएव भिन्न भिन्न पदार्थोंमेंसे (चाहे वे दोनों सूक्ष्म हों तोभी) एक व्यक्त और दूसरा अव्यक्त हो सकता है। उदाहरणार्थ, यद्यपि हवा सूक्ष्म है, तथापि हमारी स्पर्शेंद्रियको उसका ज्ञान होता है, इसलिये उसे व्यक्त कहते हैं। और सब पदार्थोंकी मूल प्रकृति (या मूल द्रव्य) वायुसेभी अत्यंत सूक्ष्म है और उसका ज्ञान हमारी किसी इंद्रियको नहीं होता; इसलिये अव्यक्त कहते हैं। अब यहाँ प्रश्न हो सकता है, कि यदि इस प्रकृतिका ज्ञान किसीभी इंद्रियको नहीं होता, तो उसका अस्तित्व सिद्ध करनेके लिये प्रमाण है? इस प्रश्नका उत्तर सांख्यवादी इस प्रकार देते हैं, कि अनेक व्यक्त पदार्थोंके क्या अवलोकनसे सत्कार्यवादके अनुसार यही अनुमान सिद्ध होता है, कि इन सब पदार्थोंका मूलरूप (प्रकृति) यद्यपि इंद्रियोंको प्रत्यक्ष गोचर न हो, तथापि उसका अस्तित्व सूक्ष्म रूपसे अवश्य होनाही चाहिये (सां. का. ८)। वेदान्तियोंनेभी ब्रह्मका अस्तित्व सिद्ध करनेके लिये इसी युक्तिवादका स्वीकार किया है (कठ. ६. १२, १३ पर शांकरभाष्य देखो)। यदि हम प्रकृतिको इस प्रकार अत्यंत सूक्ष्म और अव्यक्त मान लें, तो नैयायिकोंके परमाणुकी जड़ही उखड़ जाती है। क्योंकि परमाणु यद्यपि अव्यक्त और असंख्य हो सकते हैं, तथापि प्रत्येक परमाणुके स्वतंत्र व्यक्ति या अवयव हो जानेके कारण यह प्रश्नभी शेष रह जाता है, कि दो परमाणुओंके बीचमें कौनसा पदार्थ है? इसी कारण सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त है, कि प्रकृतिमें परमाणुरूप अवयव- भेद नहीं है?। किंतु वह सदैव एकसे एक लगीं हुई - बीचमें थोड़ाभी अंतर न छोड़ती हुई - एकही समान है; अथवा यों कहिये कि वह अव्यक्त (अर्थात् इंद्रियोंको गोचर न होनेवाले) और निरवयवरूपसे निरंतर और सर्वत्र है। परब्रह्मका वर्णन करते हुए दासबोध (दा. २०.२.३) में श्रीसमर्थ रामदासस्वामी कहते हैं, "जिधर देखिये, उधरही वह अपार है, उसका किसी ओर पार नहीं है। वह एकही प्रकारका और स्वतंत्र है, उसमें द्वैत (या और कुछ) नहीं है।"* सांख्यवादियोंके 'प्रकृति' विषयमेंभी यही वर्णन उपयुक्त है। त्रिगुणात्मक प्रकृति अव्यक्त, स्वयंभू और एकही प्रकारकी है; और चारों ओर निरंतर व्याप्त है। आकाश, वायु, आदि भेद पीछेसे
- हिंदी दासबोध, पृष्ठ ४८१ (चित्रशाला, पूना)।
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हुए; और यद्यपि वे सूक्ष्म हैं, तथापि व्यक्त हैं, और इन सबकी मूल प्रकृति एकही-सी तथा सर्वव्यापी और अव्यक्त है। स्मरण रहे, कि वेदान्तियोंके 'परब्रह्म' में और सांख्य- वादियोंकी 'प्रकृति'में आकाश-पातालका अंतर है। उसका कारण यह है, कि परब्रह्म चैतन्यरूप और निर्गुण है; परंतु प्रकृति जडरूप और सत्त्वरजतमोमयी अर्थात् सगुण है। इस विषयपर अधिक विचार आगे किया जायगा। यहाँ सिर्फ़ यही विचार करना है कि, सांख्यवादियोंका मत क्या है। जब हम इस प्रकार 'सूक्ष्म' और 'स्थूल', 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' शब्दोंका अर्थ समझने लगे, तब कहना पड़ेगा कि सृष्टिके आरंभमें प्रत्येक पदार्थ सूक्ष्म और अव्यक्त प्रकृतिके रूपमें रहता है। फिर वह (चाहे सूक्ष्म हो या स्थूल हो) व्यक्त अर्थात् इंद्रियगोचर होता है, और जब प्रलय- कालमें इस व्यक्त स्वरूपका नाश होता है, तब फिर वह पदार्थ अव्यक्त प्रकृतिमें मिलकर अव्यक्त हो जाता है। गीतामेंभी यही मत दीख पड़ता है (गीता २. २८ और ८. १८)। सांख्यशास्त्रमें इस अव्यक्त प्रकृतिहीको 'अक्षर'भी कहते हैं; और प्रकृतिसे होनेवाले सब पदार्थोंको 'क्षर' कहते हैं। यहाँ 'क्षर' शब्दका अर्थ, संपूर्ण नाश नहीं है; किंतु सिर्फ़ व्यक्त स्वरूपका नाशही अपेक्षित है। प्रकृतिके औरभी अनेक नाम हैं - जैसे प्रधान, गुण-क्षोभिणी, बहुधानक, प्रसवधर्मिणी इत्यादि। सृष्टिके सब पदार्थोंका मुख्य मूल होनेके कारण उसे (प्रकृतिको) प्रधान कहते हैं। तीनों गुणोंकी साम्यावस्थाका भंग स्वयं आपही करती है, इसलिये उसे गुण-क्षोभिणी कहते हैं। गुणत्रयीरूपी पदार्थभेदके बीज प्रकृतिमें हैं; इसलिये उसे बहुधानक कहते हैं। और प्रकृतिसेही सब पदार्थ उत्पन्न होते हैं, इसलिये उसे प्रसवधर्मिणीभी कहते हैं। इस प्रकृतिहीको वेदान्तशास्त्रमें 'माया' अर्थात् मायावी दिखावा कहते हैं। सृष्टिके सब पदार्थोंको 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' या 'क्षर' और 'अक्षर' इन दो विभागोंमें बाँटनेके बाद अब यह सोचना चाहिये कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विचारमें बतलाये गये आत्मा, मन, बुद्धि, अहंकार और इंद्रियोंको सांख्यमतके अनुसार, किस विभाग या वर्गमें रखना चाहिये। क्षेत्र और इंद्रियाँ तो जड़ही हैं; इस कारण उनका समावेश व्यक्त पदार्थोंमें हो सकता है। परंतु मन, अहंकार, बुद्धि और विशेष करके आत्माके विषयमें क्या कहा जा सकता है? यूरोपके वर्तमान समयके प्रसिद्ध सृष्टि- शास्त्रज्ञ हेकेलने अपने ग्रंथमें लिखा है कि मन, बुद्धि, और आत्मा ये सब शरीरकेही धर्म हैं। उदाहरणार्थ, हम देखते हैं, कि जब मनुष्यका मस्तिष्क बिगड़ जाता है, तब उसकी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है; और वह पागलभी हो जाता है। इसी प्रकार सिरमें चोट लगनेसे जब मस्तिष्कका कोई भाग संज्ञारहित हो जाता है, तबभी उस भागकी मानसिक शक्ति नष्ट हो जाती है। सारांश यह है कि मनोधर्मभी जड़ मस्तिष्ककेही गुण हैं; अतएव ये जड़ वस्तुसे कभी अलग नहीं किये जा सकते; और इसीलिये मस्तिष्कके साथ साथ मनोधर्म और आत्माको 'व्यक्त' पदार्थोंके वर्गमें शामिल करना चाहिये। यदि यह जड़वाद मान लिया जाय, तो
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१६२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र अंतमें केवल अव्यक्त और जड़ प्रकृतिही शेष रह जाती है। क्योंकि सब व्यक्त पदार्थ इस मूल अव्यक्त-प्रकृतिसेही बने हैं। ऐसी अवस्थामें प्रकृतिके सिवा जगतका कर्ता या उत्पादक दूसरा कोईभी नहीं हो सकता। तब तो यही कहना होगा, कि मूल प्रकृतिकी शक्ति धीरे धीरे बढ़ती गई और अंतमें उसीको चैतन्य या आत्माका स्वरूप प्राप्त हो गया। सत्कार्यवादके समान, इस मूलप्रकृतिके कुछ कायदे या नियम बने हुए हैं। और उन्हीं नियमोंके अनुसार सब जगत् और साथही साथ मनुष्यभी कैदीके समान बर्ताव किया करते है। जड़ प्रकृतिके सिवा आत्मा कोई भिन्न वस्तु हैही नहीं; तब कहना नहीं होगा, कि आत्मा न तो अविनाशी है; और न स्वतंत्र। तब मोक्ष या मुक्तिकी आवश्यकताही क्या है ? प्रत्येक मनुष्य सोचता है, कि मैं अपनी इच्छाके अनुसार अमुक काम कर लूंगा; परंतु वह सब केवल भ्रम है। प्रकृति जिस ओर खींचेगी, उसी ओर मनुष्यको झुकना पड़ेगा। अथवा कै. शंकर मोरो रानडेके अनुसार कहना चाहिये, कि "यह सारा विश्व एक बहुत बड़ा कारागार है, प्राणिमात्र कैदी हैं; और पदार्थोंके गुण-धर्म बेड़ियां हैं! इन बेड़ियोंको कोई तोड़ नहीं सकता।" इस प्रकार सारी सजीव और निर्जीव सृष्टिका व्यवहार चल रहा है-बस यही हेकेलके मतका सारांश है। उसके मतानुसार सारी सृष्टिका मूलकारण एक जड़ और अव्यक्त प्रकृतिही है। इसलिये उसने अपने सिद्धान्तको सिर्फ़ * 'अद्वैत' कहा है। परंतु यह अद्वैत जड़मूलक है, अर्थात् अकेली जड़ प्रकृतिमेंही सब बातोंका समावेश करता है; इस कारण हम इसे जड़ाद्वैत या आधिभौतिक- शास्त्राद्वैत कहेंगे। हमारे सांख्यशास्त्रकार इस जड़ाद्वैतको नहीं मानते। वे यह मानते हैं, कि मन, बुद्धि और अहंकार पंचमहाभूतात्मक जड़ प्रकृतिहीके धर्म हैं; और सांख्य- शास्त्रमेंभी यही लिखा है, कि अव्यक्त प्रकृतिसे ही बुद्धि, अहंकार इत्यादि गुण क्रमसे उत्पन्न होते जाते हैं। परंतु उनका कथन है, कि जड़ प्रकृतिसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। इतनाही नहीं; वरन् जिस प्रकार कोई मनुष्य अपनेही कंधोंपर बैठ नहीं सकता, उसी प्रकार प्रकृतिको जाननेवाला या देखनेवाला जब- तक प्रकृतिसे भिन्न न हो, तबतक वह "मैं यह जानता हूँ-वह जानता हूँ" इत्यादि व्यवहारका उपयोग करही नहीं सकता। और इस जगत्के व्यवहारोंकी ओर देखनेसे तो सब लोगोंका यही अनुभव जान पड़ता है, कि "मैं जो कुछ देखता हूँ, या जानता हूँ, वह मुझसे भिन्न है।" इसलिये सांख्यशास्त्रवालोंने कहा है, कि ज्ञाता और ज्ञेय, देखनेवाला और देखनेकी वस्तु या प्रकृतिको देखनेवाला और जड़ प्रकृति, इन दोनोंको मूलताही पृथक् पृथक् मानना चाहिये (सां. का. १७)।
- हेकेलका मूल शब्द monism है। और इस विषयपर उसने स्वतंत्र ग्रंथभी लिखा है।
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६३ पिछले प्रकरणमें जिसे क्षेत्रज्ञ या आत्मा कहा है, वही यह देखनेवाला, ज्ञाता या उपभोग करनेवाला है; और इसे ही सांख्यशास्त्रमें 'पुरुष' या 'ज्ञ' (ज्ञाता) कहा गया हैं। यह ज्ञाता प्रकृतिसे भिन्न है। इस कारण निसर्गसेही प्रकृतिके तीनों ( सत्त्व, रज और तम ) गुणोंके परे रहता है। अर्थात् यह निर्विकार और निर्गुण है; और जानने या देखनेके सिवा कुछभी नहीं करता। इससे यहभी मालूम हो जाता है, कि जगत्में जो घटनाएँ होती रहती हैं, वे सब प्रकृतिकेही खेल हैं। सारांश यह है, कि प्रकृति अचेतन या जड़ है; तो पुरुष सचेतन है। प्रकृति सब काम किया करती है; तो पुरुष उदासीन और अकर्ता है। प्रकृति त्रिगुणात्मक है; तो पुरुष निर्गुण है। प्रकृति अंधी है; तो पुरुष साक्षी है। इस प्रकार इस सृष्टिमें ये दो भिन्न भिन्न तत्त्व अनादिसिद्ध, स्वतंत्र और स्वयंभू हैं - यही सांख्यशास्त्रका सिद्धान्त है। इस बातको ध्यानमें रक्खेही भगवद्गीतामें पहले कहा गया है, कि “प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादि उभावपि” – प्रकृति और पुरुष दोनों अनादि हैं (गीता १३. १९)। इसके बाद उनका वर्णन इस प्रकार किया है। “कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ” अर्थात् देह और इंद्रियोंका व्यापार प्रकृति करती है; और “पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते” – अर्थात् पुरुष सुखदुःखोंका उपभोग करनेके लिये, कारण है। यद्यपि गीतामेंभी प्रकृति और पुरुष अनादि माने गये हैं, तथापि यह बात ध्यानमें रखनी चाहिये, कि सांख्यवादियोंके समान, गीतामें ये दोनों तत्त्व स्वतंत्र या स्वयंभू नहीं माने गये हैं। कारण यह है, कि गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने प्रकृतिको अपनी 'माया' कहा है (गीता ७. १४; १४. ३), और पुरुषके विषयमेंभी यही कहा है, कि “ममैवांशो जीवलोके” (गीता १५. ७) अर्थात् वह मेराही अंश है। इससे मालूम हो जाता है, कि गीता सांख्यशास्त्रसेभी बढ़ गई है। परंतु अभी इस बातकी ओर ध्यान न दे कर हम देखेंगे कि सांख्यशास्त्र आगे क्या कहता है। सांख्यशास्त्रके अनुसार सृष्टिके सब पदार्थोंके तीन वर्ग होते हैं। पहला अव्यक्त (मूल प्रकृति), दूसरा व्यक्त (प्रकृतिके विकार) और तीसरा पुरुष अर्थात् (ज्ञ)। परंतु इनमेंसे प्रलयकालके समय व्यक्त पदार्थोंका स्वरूप नष्ट हो जाता है, इसलिये अब मूलमें केवल प्रकृति और पुरुष ये दोही तत्त्व शेष रह जाते हैं। ये दोनों मूलतत्त्व, सांख्यवादियोंके मतानुसार अनादि और स्वयंभू हैं। वे लोग इसलिये सांख्योंको द्वैतवादी (दो मूल तत्त्व माननेवाले) कहते हैं। वे लोग प्रकृति और पुरुषके परे ईश्वर, काल, स्वभाव या अन्य किसीभी मूल तत्त्वको नहीं मानते।* इसका कारण यह है कि सगुण ईश्वर, काल या स्वभाव, ये सब व्यक्त होनेके कारण अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाले व्यक्त पदार्थोंमेंही शामिल हैं।
- ईश्वरकृष्ण कट्टर निरीश्वरवादी था। उसने अपनी सांख्यकारिका की अंतिम उपसंहारात्मक तीन आर्याओंमें कहा है, कि मूल विषयपर ७० आर्याएँ थीं।
प्रकरण ४-६: सुख-दुःख विवेक, ज्ञान-कर्म समुच्चय व क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ
१६४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र और, यदि ईश्वरको निर्गुण मानें, तो सत्कार्यवादानुसार निर्गुण मूलतत्त्वसे त्रिगुणा- त्मक प्रकृति कभी उत्पन्न नहीं हो सकती। इसलिये, उन्होंने यह निश्चित सिद्धान्त किया है, कि प्रकृति और पुरुषको छोड़ कर इस सृष्टिका और कोई तीसरा मूल कारण नहीं है। इस प्रकार जब उन लोगोंने दोही मूल तत्त्व निश्चित कर लिये, तब उन्होंने अपने मतके अनुसार इस बातकोभी सिद्ध कर दिया है, कि इन दोनों मूलतत्त्वोंसे सृष्टि कैसे उत्पन्न हुई है। वे कहते हैं, कि यद्यपि निर्गुण पुरुष स्वयं कुछभी कर नहीं सकता, तथापि जब प्रकृतिके साथ उसका संयोग होता है, तब जिस प्रकार गाय अपने बछड़ेके लिये दूध देती है, या लोहचुंबकके पास होनेसे लोहमें आकर्षण शक्ति उत्पन्न हो जाती है, उसी प्रकार मूल अव्यक्त प्रकृति अपने गुणों ( सूक्ष्म और स्थूल ) का व्यक्त फैलाव पुरुषके सामने फैलाने लगती है ( सां. का. ५७)। यद्यपि पुरुष सचेतन और ज्ञाता है, तथापि केवल अर्थात् निर्गुण होनेके कारण स्वयं कर्म करनेके कोई साधन उसके पास नहीं हैं; और प्रकृति यद्यपि काम करने- वाली है, तथापि जड़ या अचेतन होनेके कारण वह नही जानती, कि क्या करना परंतु कोलब्रुक और विल्सनके अनुवादके साथ बंबईमें श्रीयुत तुकाराम तात्याने जो पुस्तक मुद्रित की है, उसमें मूल विषयपर केवल ६९ आर्याएँ हैं। इसलिये विल्सन साहबने अपने अनुवादमें यह संदेह प्रकट किया है, कि ७० वीं आर्या कौनसी है। परंतु वह आर्या उनको नहीं मिली; और उनकी शंकाका समाधान नहीं हुआ। हमारा मत है, कि वह वर्तमान ६१ वीं आर्याके आगे होगी। कारण यह है, कि ६१ वीं आर्यापर गौडपादाचार्यका जो भाष्य है, वह कुछ एकही आर्यापर नहीं है; किंतु दो आर्याओपर है और यदि इस भाष्यके प्रतीक पदोंको लेकर आर्या बनाई जाय तो वह इस प्रकार होगी :- कारणमीश्वरमेके ब्रुवते कालं परे स्वभावं वा । प्रजाः कथं निर्गुणतो व्यक्तः कालः स्वभावश्च ॥ यह आर्या पिछले और अगले संदर्भ ( अर्थ या भाव ) के अनुसारभी है। इस आर्यामें निरीश्वरमतका प्रतिपादन है, इसलिये जान पड़ता है, कि किसीने इसे पीछेसे निकाल डाला होगा। परंतु इस आर्याका शोधन करनेवाला मनुष्य इसका भाष्यभी निकाल डालना भूल गया। इसलिये अब हम इस आर्याका ठीक ठीक पता लगा सकते हैं; और इसीसे उस मनुष्यको धन्यवादही देना चाहिये। श्वेताश्वेत- रोपनिषद्के छठे अध्यायके पहले मंत्रमें प्रकट होता है, कि प्राचीन समयमें कुछ लोग स्वभाव और कालको - और वेदान्ती तो उसकेभी आगे बढ़कर ईश्वरको - जगत्का मूलकारण मानते थे। वह मंत्र यह है :- स्वभावमेके कवयो वदन्ति कालं तथान्ये परिमुह्यमानाः । देवस्यैषः महिमा तु लोके येनेदं भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम् ॥ परंतु ईश्वरकृष्णने उपर्युक्त आर्याको वर्तमान ६१ वीं आर्याके बाद सिर्फ़ यह बतलानेके लिये रखा है, कि तीनों मूलकारण (अर्थात् स्वभाव, काल और ईश्वर) सांख्यवादियोंको मान्य नहीं हैं!
चाहिये। इस प्रकार लँगड़े और अंधेकी वह जोड़ी है और जैसे अंधेके कंधेपर लँगड़ा बैठे; और वे दोनों एक दूसरेकी सहायतासे मार्ग चलने लगें; वैसेही अचेतन प्रकृति और सचेतन पुरुषका संयोग हो जानेपर सृष्टिके सब कार्य आरंभ हो जाते हैं (सां. का. २१)। और जिस प्रकार नाटककी रंगभूमिपर प्रेक्षकोंके मनोरंजनार्थ एकही नटी कभी एक तो कभी दूसराही स्वाँग बनाकर नाचती रहती है, उसी प्रकार पुरुषके लाभके लिये (पुरुषार्थके लिये), यद्यपि पुरुष कुछभी पारितोषिक नहीं देता; तोभी यह प्रकृति सत्त्व-रज-तम गुणोंकी न्यूनाधिकतासे अनेक रूप धारण करके उसके सामने लगातार नाचती रहती है (सां. का. ५९)। प्रकृतिके इस नाचको देखकर - मोहसे भूल जानेके कारण, या वृथाभिमानके कारण - जबतक पुरुष इस प्रकृतिके कर्तृत्वको स्वयं अपनाही कर्तृत्व मानता रहता है; और जबतक वह सुखदुःखके पाशमें स्वयं अपनेको फँसा रखता है, तबतक उसे मोक्ष या मुक्तिकी प्राप्ति कभी नहीं हो सकती (गीता ३. २७)। परंतु जिस समय पुरुषको यह ज्ञान हो जाय, कि त्रिगुणात्मक प्रकृति भिन्न है और मैं भिन्न हूँ; उस समय वह मुक्तही है (गीता १३. २९, ३०; १४. २०)। क्योंकि, यथार्थमें पुरुष न तो कर्ता है और न बँधाही है। वह स्वतंत्र है और निसर्गतः केवल अर्थात् अकर्ता है। जो कुछ होता है वह सब प्रकृतिहीका खेल है। यहाँतक कि मन और बुद्धिभी प्रकृतिहीकेही विकार हैं। इसलिये बुद्धिको जो ज्ञान होता है, वहभी प्रकृतिके कार्यकाही फल है। यह ज्ञान तीन प्रकारका होता है; जैसे: सात्त्विक, राजस और तामस (गीता १८. २०-२२)। जब बुद्धिको सात्त्विक ज्ञान प्राप्त होता है, तब पुरुषको यह मालूम होने लगता है, कि मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ। सत्त्व-रज-तमोगुण प्रकृतिहीकेही धर्म हैं; पुरुषके नहीं। पुरुष निर्गुण है; और त्रिगुणात्मक प्रकृति उसका दर्पण है (मभा. शां. २०४. ८) जब यह दर्पण स्वच्छ या निर्मल हो जाता है अर्थात् जब बुद्धि - जो प्रकृतिका विकार है - सात्त्विक हो जाती है, तब इस निर्मल दर्पणमें पुरुषको अपना सात्त्विक या सच्चा स्वरूप दीखने लगता है; और उसे यह बोध हो जाता है, कि मैं प्रकृतिसे भिन्न हूँ। उस समय यह प्रकृति लज्जित हो कर उस पुरुषके सामने नाचना, खेलना या जाल फैलाना बंद कर देती है। जब यह अवस्था प्राप्त हो जाती है, तब पुरुष सब पाशों या जालोंसे मुक्त हो कर अपने स्वाभाविक कैवल्यपदको पहुँच जाता है। 'कैवल्य' शब्दका अर्थ है केवलता, अकेलापन, या प्रकृतिके साथ संयोग न होना। पुरुषकी इस नैसर्गिक या स्वाभाविक स्थितिकोही सांख्यशास्त्रमें मोक्ष (मुक्ति या छुटकारा) कहते हैं। इस अवस्थाके विषयमें सांख्यवादियोंने एक बहुतही नाजुक प्रश्नका विचार उपस्थित किया है। उनका प्रश्न है, कि पुरुष प्रकृतिको छोड़ देता है, या प्रकृति पुरुषको छोड़ देती है? कुछ लोगोंकी समझमें यह प्रश्न वैसेही निरर्थक प्रतीत होगा, जैसे यह प्रश्न कि दुल्हेके लिये दुल्हन लंबी है या दुल्हनके लिये दुल्हा ठिंगना है। क्योंकि जब दो वस्तु-
१६६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र ओंका एक दूसरेसे वियोग होता है, तब हम देखते हैं कि दोनो एक दूसरेको छोड़ देती हैं। इसलिये ऐसे प्रश्नका विचार करनेसे कुछ लाभ नहीं है, कि किसने किसको छोड़ दिया। परंतु कुछ अधिक सोचनेपर मालूम हो जायगा, कि सांख्य- वादियोंका उक्त प्रश्न उनकी दृष्टिसे अयोग्य नहीं है। सांख्यशास्त्रके अनुसार 'पुरुष' निर्गुण, अकर्ता और उदासीन है। इसलिये तत्त्वदृष्टिसे 'छोड़ना' या 'पकड़ना' क्रियाओंका कर्ता पुरुष नहीं हो सकता (गीता १३. ३१, ३२)। इसलिये सांख्य- वादी कहते हैं, कि प्रकृतिही 'पुरुष'को छोड़ दिया करती है। अर्थात् वही 'पुरुष'से अपना छुटकारा या मुक्ति कर लेती है। क्योंकि कर्तृत्व 'प्रकृति'हीका धर्म है। (सां. का. ६२ और गीता १३. १४) सारांश यह है, कि मुक्ति नामकी ऐसी कोई निराली अवस्था नहीं है, जो 'पुरुष'को कहीं बाहरसे प्राप्त हो जाती हो। अथवा यह कहिये, कि वह 'पुरुष'की मूल और स्वाभाविक स्थितिसे कोई भिन्न स्थितिभी नहीं है। प्रकृति और पुरुषमें वैसाही संबंध है, जैसा कि घासके बाहरी छिलके और अंदरके गूदेमें रहता है; या जैसा पानी और उसमें रहनेवाली मछलीमें। सामान्य पुरुष प्रकृतिके गुणोंसे मोहित हो जाते हैं; और यह स्वाभाविक भिन्नता पहचान नहीं सकते। इसी कारण वे संसार-चक्रमें फँसे रहते हैं। परंतु जो इस भिन्नताको पहचान लेता है, वह मुक्तही है। महाभारत (मभा. शां. १९४. ५८; २४८. ११; और ३०६-३०८) में लिखा है, कि ऐसेही पुरुषको 'ज्ञाता' या 'बुद्ध' और 'कृतकृत्य' कहते हैं। गीताके वचन "एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात्" (गीता १५. २०) में बुद्धिमान् शब्दकाभी यही अर्थ है। अध्यात्मशास्त्रकी दृष्टिसे मोक्षका सच्चा स्वरूपभी यही है (वे. सू. शां. भा. १. १. ४)। परंतु सांख्यवादियोंकी अपेक्षा अद्वैत वेदान्तियोंका विशेष कथन यह है, कि आत्माहीमें परब्रह्मस्वरूप है; और जब वह अपने मूलस्वरूपको अर्थात् परब्रह्मको पहचान लेता है, तब वही उसकी मुक्ति है। वे लोग यह कारण नहीं बतलाते, कि पुरुष निसर्गतः 'केवल' है। सांख्य और वेदान्तका यह भेद अगले प्रकरणमें स्पष्ट करके बतलाया जायगा। यद्यपि अद्वैत वेदान्तियोंको सांख्यवादियोंका यह मत मान्य है, कि पुरुष (आत्मा) निर्गुण, उदासीन और अकर्ता है; तथापि वे लोग सांख्यशास्त्रकी 'पुरुष' संबंधी इस दूसरी कल्पनाको नहीं मानते, कि एकही प्रकृतिको देखनेवाले (साक्षी) स्वतंत्र पुरुष मूलमेंही असंख्य हैं (गीता ८. ४; १३. २०-२२; मभा. शां. ३५१; और वे. सू. शां. भा. २, १. १)। वेदान्तियोंका कहना है, कि उपाधिभेदके कारण सब जीव भिन्न भिन्न मालूम होते हैं, परंतु वस्तुतः सब ब्रह्मही है। सांख्यवादियों- का मत है, कि जब हम देखते हैं, कि प्रत्येक मनुष्यका जन्म, मृत्यु और जीवन अलग अलग हैं; और जब इस जगत्में हम यह भेद पाते हैं कि कोई सुखी है तो कोई दुःखी है; तब मानना पड़ता है, कि प्रत्येक आत्मा या पुरुष मूलसेही भिन्न है, और उनकी संख्याभी अनंत है। (सां. का. १८) केवल प्रकृति और पुरुषही
कापिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६७
सब सृष्टिके मूलतत्त्व हैं सही; परंतु उनमेंसे पुरुष शब्दमें सांख्यवादियोंके मता- नुसार "असंख्य पुरुषोंके समुदाय" का समावेश होता है। इन असंख्य पुरुषोंके और त्रिगुणात्मक प्रकृतिके संयोगसे सृष्टिका सब व्यवहार हो रहा है। प्रत्येक पुरुष और प्रकृतिका जब संयोग होता है, तब प्रकृति अपने गुणोंका जाला उस पुरुषके सामने फैलाती है; और पुरुष उसका उपभोग करता रहता है। ऐसा होते होते जिस पुरुषके चारों ओरकी प्रकृतिके खेल सात्त्विक हो जाते हैं, उस पुरुषकोही (सब पुरुषोंको नहीं) सच्चा ज्ञान प्राप्त होता है; और उस पुरुषके लिये ही प्रकृतिके सब खेल बंद हो जाते हैं; एवं वह अपने मूल कैवल्यपदको पहुँच जाता है। परंतु यद्यपि उस पुरुषको मोक्ष मिल गया, तोभी शेष सब पुरुषोंको संसारमें फँसेही रहना पड़ता है। कदाचित् कोई यह समझे, कि ज्योंहि पुरुष इस प्रकार कैवल्यपदको पहुँच जाता है, त्योंही वह एकदम प्रकृतिके जालेसे छूट जाता होगा। परंतु सांख्यमतके अनुसार यह समझ गलत है। देह और इंद्रियरूपी प्रकृतिके विचार उस मनुष्यकी मृत्युतक उसे नहीं छोड़ते। सांख्यवादी इसका यह कारण बतलाते हैं, कि "जिस प्रकार कुम्हारका पहिया - ऊपरका घड़ा बन कर निकाल लिया जानेपरभी - पूर्वसंस्कारके कारण कुछ देर तक घूमताही रहता है, उसी प्रकार कैवल्यपदकी प्राप्ति हो जाने परभी इस मनुष्यका शरीर कुछ समयतक शेष रहता है" (सां. का. ६७)। तथापि उस शरीरसे, कैवल्यपदपर आरूढ़ होनेवाले पुरुषको कुछभी अडचन या सुखदुःखकी बाधा नहीं होती। क्योंकि, यह शरीर जड़ प्रकृतिका विकार होनेके कारण स्वयं जड़ही है। इसलिये इसे सुखदुःख दोनों समानही हैं; और यदि कहा जाय, कि पुरुषको सुखदुःखकी बाधा होती हो, तो यहभी ठीक नहीं। क्योंकि उसे मालूम है, कि मैं प्रकृतिके व्यवहारमें भिन्न हूँ, सब कर्तृत्व प्रकृतिका है, मेरा नहीं। ऐसी अवस्थामें प्रकृतिके मनमाने खेल हुआ करते हैं, परंतु उसे सुखदुःख नहीं होता; और वह सदा उदासीनही रहता है। जो पुरुष प्रकृतिके तीनों गुणोंसे छूट कर यह ज्ञान प्राप्त नहीं कर लेता, वह जन्म- मरणसे छुट्टी नहीं पा सकता। फिर चाहे वह सत्त्वगुणके उत्कर्षके कारण देवयोनिमें जन्म ले, या रजोगुणके कारण मानवयोनिमें जन्म ले, या तमोगुणकी प्रबलताके कारण पशु-कोटिमें जन्म ले। (सां. का. ४४. ५४) जन्ममरणरूपी चक्रके ये फल प्रत्येक मनुष्यको उसके चारों ओरकी प्रकृति अर्थात् उसकी बुद्धिके सत्त्व-रज-तम गुणोंके उत्कर्षापकर्षके कारण प्राप्त हुआ करते हैं। गीतामेंभी कहा है, कि "ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्थाः" - सात्त्विक वृत्तिके पुरुष स्वर्ग जाते हैं; और तामस पुरुषोंको अधोगति प्राप्त होती है (गीता १४. १८)। परंतु ये स्वर्गादि फल अनित्य हैं। जिसे जन्म-मरणसे छुट्टी पाना है, या सांख्योंकी परिभाषाके अनुसार जिसे प्रकृतिसे अपनी भिन्नता अर्थात् कैवल्य चिरस्थायी रखना है, उसे त्रिगुणातीत हो कर विरक्त (संन्यस्त) होनेके सिवा दूसरा मार्ग नहीं है। कपिलाचार्यको यह
१६८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र वैराग्य और ज्ञान जन्मसेही प्राप्त हुआ था; परंतु यह स्थिति सब लोगोंको जन्महीसे प्राप्त नहीं हो सकती । इसलिये तत्त्व-विवेकरूप साधनसे प्रकृति और पुरुषकी भिन्नताको पहचान कर प्रत्येक पुरुषको अपनी बुद्धि शुद्ध कर लेनेका यत्न करना चाहिये । ऐसे प्रयत्नोंसे जब बुद्धि सात्त्विकही जाती है, तो फिर उसीमें ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य आदि गुण उत्पन्न होते हैं; और मनुष्यको अंतमें कैवल्यपद प्राप्त हो जाता है । जिस वस्तुको पानेकी मनुष्य इच्छा करता है, उसे प्राप्त कर लेनेके योग्य सामर्थ्यकोही यहाँ ऐश्वर्य कहा है । सांख्यमतके अनुसार धर्मकी गणना सात्त्विक गुणमेंही की जाती है। परंतु कपिलाचार्यने अंतमें यह भेद किया है, कि केवल धर्मसे स्वर्गही प्राप्त होता है; और ज्ञान तथा वैराग्य (संन्यास) से मोक्ष या कैवल्यपद प्राप्त होता है; तथा पुरुषके दुःखोंकी आत्यंतिक निवृत्ति हो जाती है । जब देहेंद्रियों और बुद्धिमें पहले सत्त्वगुणका उत्कर्ष होता है; और जब धीरे धीरे उन्नति होते होते अंतमें पुरुषको यह ज्ञान हो जाता है, कि मैं त्रिगुणात्मक प्रकृतिसे भिन्न हूँ तब उसे सांख्यवादी 'त्रिगुणातीत' अर्थात् सत्त्व-रज-तम गुणोंके परे पहुँचा हुआ कहते हैं । इस त्रिगुणातीत अवस्थामें सत्त्व-रज-तममेंसे कोईभी गुण शेष नहीं रहता । इसलिये कुछ सूक्ष्म विचार करनेसे मानना पड़ता हैं, कि यह त्रिगुणातीत अवस्था सात्त्विक, राजस और तामस इन तीनों अवस्थाओंसे भिन्न है । इसी अभिप्रायसे भागवतमें भक्तिके तामस, राजस और सात्त्विक भेद करनेके पश्चात् एक और चौथा भेद किया गया है। इन तीनों गुणोंके पार हो जानेवाला पुरुष, निर्हेतुक और अभेदभावने जो भक्ति करता है उसे 'निर्गुण भक्ति' कहते हैं' (भाग. ३. २९. ७-१४) । परंतु सात्त्विक, गजस और तामस इन तीन वर्गोंकी अपेक्षा वर्गीकरणके तत्त्वोंको व्यर्थ अधिक बढ़ाना उचित नहीं है। इसलिये सांख्य वादी कहते हैं, कि सत्त्वगुणके अत्यंत उत्कर्षसेही अंतमें त्रिगुणातीत अवस्था प्राप्त हुआ करती है; और इसलिये वे इस अवस्थाकी गणना सात्त्विक वर्गमेंही करते हैं। गीतामेंभी यह मत स्वीकार किया गया है। उदाहरणार्थ गीतामें कहा है, कि “जिस अभेदात्मक ज्ञानसे यह मालूम हो, कि सब कुछ एकही हैं उमीको सात्त्विक ज्ञान कहते हैं” (गीता १८. २०) । इसके सिवा मत्त्वगुणके वर्णनके बाद गीतामें १४ वें अध्यायके अंतमें, त्रिगुणातीत अवस्थाका वर्णन है। परंतु भगवद्- गीताको यह प्रकृति और पुरुषवाला द्वैत मान्य नहीं है। इसलिये ध्यान रखना चाहिये, कि गीतामें 'प्रकृति', 'पुरुष', 'त्रिगुणातीत' इत्यादि सांख्यवादियोंके पारि- भाषिक शब्दोंका उपयोग कुछ भिन्न अर्थमें किया गया है; अथवा यह कहिये, कि गीतामें सांख्यवादियोंके द्वैतपर अद्वैत परब्रह्मकी 'छाप' सर्वत्र लगी हुई है। उदा- हरणार्थ, सांख्यवादियोंके प्रकृति-पुरुष भेदकाही गीताके १३ वें अध्यायमें वर्णन है। (गीता १३. १९-३४) परंतु वहाँ 'प्रकृति' और 'पुरुष' शब्दोंका उपयोग क्षेत्र और क्षेत्रज्ञके अर्थमें हुआ है। इसी प्रकार १४ वें अध्यायमें त्रिगुणातीत अवस्थाका
कपिलसांख्यशास्त्र अथवा क्षराक्षरविचार १६९ वर्णन (गीता १४. २२-२७) भी उस सिद्ध पुरुषके विषयमें किया गया है; जो त्रिगुणात्मक मायाके फंदेसे छूटकर उस परमात्माको पहचानता है, जो कि प्रकृति और पुरुषकेभी परे है। यह वर्णन सांख्यवादियोंके उस सिद्धान्तके अनुसार नहीं है; जिसके द्वारा वे यह प्रतिपादन करते हैं, कि 'प्रकृति' और 'पुरुष', दोनों पृथक् पृथक् तत्त्व हैं; और पुरुषका 'कैवल्य' ही त्रिगुणातीत अवस्था है। यह भेद आगे अध्यात्म-प्रकरणमें अच्छी तरह समझा दिया गया है। परंतु गीतामें यद्यपि अध्यात्म पक्षहो प्रतिपादित किया गया है, तथापि आध्यात्मिक तत्त्वोंका वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्णने सांख्यपरिभाषाका और युक्तिवादका हर जगह उपयोग किया है। इसलिये संभव है, कि गीता पढ़ते समय कोई यह समझ बैठे, कि गीताको सांख्यवादियोंकेही सिद्धान्त ग्राह्य हैं। इस भ्रमको हटानेके लियेही सांख्यशास्त्र और गीताके तत्सदृश सिद्धान्तोंका भेद फिरसे यहाँ बतलाया गया है। वेदान्तसूत्रोंके भाष्यमें श्रीशंकराचार्यने कहा है, कि उपनिषदोंके इस अद्वैत सिद्धान्तको न छोड़- कर-कि "प्रकृति और पुरुषके परे इस जगत्का परब्रह्मरूपी एकही मूलभूत तत्त्व है; और उसीसे प्रकृति, पुरुष आदि सब सृष्टिकी उत्पत्ति हुई है" - सांख्य- शास्त्रके शेष सिद्धान्त हमें अग्राह्य नहीं हैं। (वे. सू. शां. भा. २. १. ३) यही बात गीताके उपपादनके विषयमेंभी चरितार्थ होती है।
आठवाँ प्रकरण विश्वकी रचना और संहार गुणा गुणेषु जायन्ते तत्रैव निविशन्ति च । *
- महाभारत, शांति. ३०५.२३ इस बातका विवेचन हो चुका, कि कापिलसांख्यके अनुसार संसारमें जो दो स्वतंत्र मूलतत्त्व - प्रकृति और पुरुष - हैं, उनका स्वरूप क्या है, और जब इन दोनोंका संयोगही निमित्त कारण हो जाता है; तब पुरुषके सामने प्रकृति अपने गुणोंका जाला कैसे फैलाया करती है; और उस जालेसे हमको अपना छुटकारा किस प्रकार कर लेना चाहिये । परंतु अबतक इसका स्पष्टीकरण नहीं किया गया, कि प्रकृति अपने इस जालेको ( अथवा खेल, संसार या ज्ञानेश्वर महाराजके शब्दोंमें 'प्रकृतिकी टकसाल 'को ) किस क्रमसे पुरुषके सामने फैलाया करती है; और उसका लय किस प्रकार हुआ करता है। प्रकृतिके इस व्यापारहीको “विश्वकी रचना और संहार” कहते हैं; और इसी विषयका विवेचन प्रस्तुत प्रकरणमें किया जायगा। सांख्यमतके अनुसार प्रकृतिने इस जगत् या सृष्टिको असंख्य पुरुषोंके लाभके लियेही निर्माण किया है। 'दासबोध'में श्रीसमर्थ रामदासस्वामीनेभी प्रकृतिसे सारे ब्रह्मांडके निर्माण होनेका बहुत अच्छा वर्णन किया है। उसी वर्णनसे “विश्वकी रचना और संहार” शब्द इस प्रकरणमें लिये गये हैं। इसी प्रकार, भगवद्गीताके सातवें और आठवें अध्यायोंमें मुख्यतः इसी विषयका प्रतिपादन किया गया है। और, ग्यारहवें अध्यायके आरंभमें अर्जुनने श्रीकृष्णसे यह जो प्रार्थना की है, कि "भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया” (गीता ११.२) - भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलय (जो आपने) विस्तारपूर्वक (बतलाया, उसको) मैंने सुना। अब मुझे अपना विश्वरूप प्रत्यक्ष दिखलाकर कृतार्थ कीजिये - उससे यह बात स्पष्ट हो जाती है, कि विश्वकी रचना और संहार, क्षर-अक्षर-विचारहीका एक मुख्य भाग है। 'ज्ञान' वह है, जिससे यह बात मालूम हो जाती है, कि सृष्टिके अनेक (नाना) व्यक्त पदार्थोंमें एकही अव्यक्त मूलद्रव्य है (गीता १८.२०); और 'विज्ञान' उसे कहते हैं, जिससे यह मालूम हो, कि एकही मूलभूत अव्यक्त द्रव्यसे अनेक भिन्न भिन्न पदार्थ किस प्रकार अलग अलग निर्मित हुए (गीता
- “गुणोंसेही गुणोंकी उत्पत्ति होती है और उन्हींमें उनका लय हो जाता है।”
विश्वकी रचना और संहार १७१
१३.३०) है; और इसमें न केवल क्षर-अक्षर-विचारहीका समावेश होता है, किंतु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञान और अध्यात्म विषयोंकाभी समावेश हो जाता है। भगवद्गीताके मतानुसार प्रकृति अपना संसारशकट चलाने या सृष्टिका कार्य चलानेके लिये स्वतंत्र नहीं है; किंतु उसे यह काम ईश्वरकी इच्छा के अनुसार करना पड़ता है (गीता ९.१०)। परंतु, पहले बतलाया जा चुका है, कि कपिलाचार्यने प्रकृतिको स्वतंत्र माना है। सांख्यशास्त्रके अनुसार, प्रकृतिके संसारका आरंभ होनेके लिये 'पुरुषका संयोग' इतनाही निमित्त कारण बस हो जाता है। इस विषयमें प्रकृति और किसीकी अपेक्षा नहीं करती। सांख्योंका यह कथन है, कि ज्योंही पुरुष और प्रकृतिका संयोग होता है, त्योंही उसकी टकसाल जारी हो जाती है और जिस प्रकार वसंत ऋतुमें वृक्षोंमें नये पत्ते दीख पड़ते हैं; और क्रमशः फूल और फल लगते हैं (मभा. शां. २३१.७३; मनु. १.३०), उसी प्रकार प्रकृतिकी मूल साम्यावस्था नष्ट हो जाती है; और उसके गुणोंका विस्तार होने लगता है। इसके विरुद्ध वेदसंहिता, उपनिषद् और स्मृतिग्रंथोंमें प्रकृतिको मूल न मान कर परब्रह्मको मूल माना है; और परब्रह्मसे सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें भिन्न भिन्न वर्णन किये गये हैं—"हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्" —पहले हिरण्यगर्भ (ऋ. १०.१२१.१) और इस हिरण्यगर्भसे अथवा सत्यसे सब सृष्टि उत्पन्न हुई (ऋ. १०.७२; १०.१९०); अथवा पहले पानी उत्पन्न हुआ (ऋ. १०.८२.६; तै. ब्रा. १.१.३.७; ऐ. उ. १.१.२) और फिर उससे सृष्टि उत्पन्न हुई। अथवा इस पानीमें एक अंडा उत्पन्न हुआ और उससे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ; ब्रह्मासे अथवा उस मूल अंडेसेही सारा जगत् उत्पन्न हुआ; (मनु. १.८-१३; छां. ३.१९) अथवा वही ब्रह्मा (पुरुष) आधे हिस्सेसे स्त्री हो गया (बृ. १.४, ३; मनु १.३२); अथवा पानी उत्पन्न होनेके पहलेही पुरुष था (कठ. ४.६) अथवा परब्रह्मसे पहले तेज, पानी और पृथिवी (अन्न) येही तीन तत्त्व उत्पन्न हुए और पश्चात् उनके मिश्रणसे सब पदार्थ बने (छां. ६.२-६)। यद्यपि उक्त वर्णनोंमें बहुत भिन्नता है; तथापि वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २.३.१-१५) अन्तिम निर्णय यह किया गया है, कि आत्मरूपी मूलब्रह्मसे ही आकाश आदि पंच- महाभूत क्रमशः उत्पन्न हुए हैं (तै. उ. २.१)। प्रकृति, महत् आदि तत्त्वोंकाभी उल्लेख (कठ. ३.११), मैत्रायणी (६.१०), श्वेताश्वतर (४.१०; ६.१६), आदि उपनिषदोंमें स्पष्ट रीतिसे किया गया है। इससे दीख पड़ेगा, कि यद्यपि वेदान्तमतवाले प्रकृतिको स्वतंत्र न मानते हों, तथापि जब एक बार शुद्ध ब्रह्महीमें मायात्मक प्रकृतिरूप विकार दृग्गोचर होने लगता है, तब आगे सृष्टिके उत्पत्तिक्रमके संबंधमें उनका और सांख्यमतवालोंका अंतमें मेल हो गया था; और इसी कारण महाभारतमें कहा है, कि "इतिहास, पुराण, अर्थशास्त्र आदिमें जो कुछ ज्ञान भरा है, वह सब सांख्योंसे प्राप्त हुआ है" (शां. ३०१.१०८, १०९)। उसका यह मतलब
१७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं है, कि वेदान्तियोंने अथवा पौराणिकोंने यह ज्ञान कपिलसे प्राप्त किया है; किंतु यहाँ पर केवल इतनाही अर्थ अभिप्रेत है, कि सृष्टिके उत्पत्तिक्रमका ज्ञान सर्वत्र एक-सा दीख पड़ता है। इतनाही नहीं; किंतु यहभी कहा जा सकता है, कि यहाँ पर 'सांख्य' शब्द प्रयोग 'ज्ञान'के व्यापक अर्थहीमें किया गया है। तथापि कपिलाचार्यने सृष्टिके उत्पत्तिक्रमका वर्णन शास्त्रीय दृष्टिसे विशेष पद्धतिपूर्वक किया है; और भगवद्गीतामेंभी विशेष करके इसी सांख्यक्रमका स्वीकार किया गया है, इस कारण उसीका विवेचन इस प्रकरणमें किया जायगा। सांख्योंका सिद्धान्त है, कि इंद्रियोंको अगोचर अर्थात् अव्यक्त, सूक्ष्म और चारों ओर अखंडित भरे हुए एकही निरवयव मूलद्रव्यसे सारी व्यक्त सृष्टि उत्पन्न हुई है। यह सिद्धान्त पश्चिमी देशोंके अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंको ग्राह्य है। ग्राह्यही क्यों, अब तो उन्होंने यहभी निश्चित किया है, कि इसी मूलद्रव्य की शक्तिका क्रमशः विकास होता आया है; और इस पूर्वापार क्रमको छोड़ बीचमें अचानक या निरर्थक कुछभी निर्माण नहीं हुआ है। इसी मतको उत्क्रांतिवाद या विकास सिद्धान्त कहते हैं। जब यह सिद्धान्त पश्चिमी राष्ट्रोंमें, गतशताब्दीमें, पहले पहल ढूंढ निकाला गया, तब वहाँ बड़ी खलबली मच गई थी। ईसाई धर्म-पुस्तकोंमें यह वर्णन है, कि ईश्वरने पंचमहाभूतोंको और जंगमवर्गके प्रत्येक प्राणीकी जातिको भिन्न भिन्न समयपर पृथक् पृथक् और स्वतंत्र निर्माण किया है; और उत्क्रांतिवादके पहले इसी मतको सब ईसाई लोक सत्य मानते थे। अतएव, जब ईसाई धर्मका उक्त सिद्धान्त उत्क्रांतिवादसे असत्य ठहराया जाने लगा, तब उत्क्रांति- वादियोंपर खूब जोरसे आक्रमण और कटाक्ष होने लगे। ये कटाक्ष आजकलभी न्यूनाधिक होतेही रहते हैं। तथापि, शास्त्रीय सत्यमें अधिक शक्ति होनेके कारण सृष्ट्युत्पत्तिके संबंधमें सब विद्वानोंको उत्क्रांतिमतही आजकल अधिक ग्राह्य होने लगा है। इस मतका सारांश यह है – सूर्यमालामें पहले एक सूक्ष्म द्रव्यही भरा हुआ था। उसकी मूल गति अथवा उष्णताका परिमाण घटता गया। तब उस द्रव्यका अधिकाधिक संकोच होने लगा; और पृथ्वी समवेत सब ग्रह क्रमशः उत्पन्न हुए। अंतमें जो शेष अंश बचा, वही सूर्य है। पृथ्वीभी सूर्यके सदृश पहले एक उष्ण गोला थी। परंतु ज्यों ज्यों उसकी उष्णता कम होती गई, त्यों त्यों मूलद्रव्योंमेंसे कुछ द्रव्य पतले और कुछ घने हो गये। इस प्रकार पृथ्वीके ऊपरकी हवा और पानी तथा उसके नीचेका पृथ्वीका जड़ गोला, ये तीन पदार्थ बने; और इसके बाद, इन तीनोंके मिश्रण अथवा संयोगसे सब सजीव तथा निर्जीव सृष्टि उत्पन्न हुई है। डार्विन प्रभृति पंडितोंने तो यह प्रतिपादन किया है, कि इसी तरह मनुष्यभी छोटे कीड़ेसे बढ़ते बढ़ते अपनी वर्तमान अवस्थामें आ पहुँचा है। परंतु अबतक आधिभौतिकवादियोंमें और अध्यात्मवादियोंमें इस बातपर बहुत मतभेद है, कि सारी सृष्टिके मूलमें आत्मा जैसे किसी भिन्न और स्वतंत्र तत्त्वको मानना चाहिये
विश्वकी रचना और संहार १७३ या नही। हेकेलके सदृश कुछ पंडित यह मानकर, कि जड़ पदार्थोंसेही बढ़ते बढ़ते आत्मा और चैतन्यकी उत्पत्ति हुई, जड़ाद्वैतका प्रतिपादन करते हैं, और इसके विरुद्ध कांटसरीखे अध्यात्मज्ञानियोंका यह कथन है, कि हमें सृष्टिका जो ज्ञान होता है, वह हमारे आत्माके एकीकरण - व्यापारका फल है, इसलिये आत्माको एक स्वतंत्र तत्त्व माननाही पड़ता है। क्योंकि यह कहना - कि जो आत्मा बाह्य- सृष्टिका ज्ञाता है, वह उसी गोचर सृष्टिका एक भाग है अथवा उस सृष्टिहीसे वह उत्पन्न हुआ है - तर्कदृष्टिसे ठीक वैसेही असमंजस या भ्रामक प्रतीत होगा, जैसे यह उक्ति कि हम स्वयं अपनेही कंधेपर बैठ सकते हैं। यही कारण है, कि सांख्यशास्त्रमें प्रकृति और पुरुष, ये दो स्वतंत्र तत्त्व माने गये हैं। सारांश यह है, कि आधिभौतिक सृष्टिज्ञान चाहे जितनी उन्नति करे; तथापि अबतक पश्चिमी देशोंमें बहुतेरे बड़े बड़े पंडित यही प्रतिपादन किया करते हैं, कि सृष्टिके मूल तत्त्वके स्वरूपका विवेचन हमेशा भिन्न पद्धतिसे किया जाना चाहिये । परंतु, यदि केवल इतनाही विचार किया जाय, कि एक जड़ प्रकृतिसे आगे सब व्यक्त पदार्थ किस क्रमसे बने हैं, तो पाठकोंको मालूम हो जायगा, कि पश्चिमी उत्क्रांतिमतमें और सांख्यशास्त्रमें वर्णित प्रकृतिके कार्यसंबंधी तत्त्वोंमें कोई विशेष अंतर नहीं है। क्योंकि इस मुख्य सिद्धान्तसे दोनों सहमत हैं, कि अव्यक्त, सूक्ष्म और एक मूल रूप प्रकृतिहीसे क्रमशः ( सूक्ष्म और स्थूल ) विविध रूप व्यक्त सृष्टि निर्मित हुई है। परंतु अब आधिभौतिक शास्त्रोंके ज्ञानकी खूब वृद्धि हो जानेके कारण, सांख्य- वादियोंके “सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणोंके बदले, आधुनिक सृष्टिशास्त्रज्ञोंने गति, उष्णता और आकर्षणशक्ति को प्रधानगुण मान रखा है। यह बात सच है, कि “सत्त्व, रज, तम ” गुणोंकी न्यूनाधिकताके परिमाणोंकी अपेक्षा, उष्णता अथवा आकर्षणशक्तिकी न्यूनाधिकताकी बात आधिभौतिकशास्त्रकी दृष्टिसे सरलतापूर्वक समझमें आ जाती है। तथापि गुणोंके विकास अथवा गुणोत्कर्षका जो यह तत्त्व है, कि “गुणा गुणेषु वर्तन्ते” (गीता ३. २८), वह दोनों ओर समानही है। सांख्यशास्त्रज्ञोंका कथन है, कि जिस तरह मोड़दार पंखेको धीरे धीरे खोलते हैं उसी तरह सत्त्व, रज, तमकी साम्यावस्थामें रहनेवाली प्रकृतिकी तह जब धीरे धीरे खुलने लगती है, तब सब व्यक्त सृष्टि निर्मित होती है - और इस कथनमें और उत्क्रांतिवादमें वस्तुतः कुछ भेद नहीं है। तथापि, यह भेद तात्त्विक धर्मदृष्टिसे ध्यानमें रखनेयोग्य है, कि ईसाई धर्मके समान गुणोत्कर्षतत्त्वका अनादर न करते हुए, गीतामें और अंशतः उपनिषद् आदि वैदिक ग्रंथोंमेंभी, अद्वैत वेदान्तके साथही साथ बिना किसी विरोधके गुणोत्कर्षवाद स्वीकार किया गया है। अब देखना चाहिये कि प्रकृतिके विकासक्रमके विषयमें सांख्यशास्त्रकारोंका क्या कथन है। इस क्रमहीको गुणोत्कर्ष अथवा गुणपरिणामवाद कहते हैं। यह बतलानेकी आवश्यकता नही, कि कोई काम आरंभ करनेके पहले मनुष्य उसे अपनी
१७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बुद्धिसे निश्चित कर लेता है, अथवा पहले वह काम करनेकी बुद्धि या इच्छा उसमें उत्पन्न हुआ करती है। उपनिषदोंमेंभी इस प्रकारका वर्णन है, कि आरंभमें मूल परमात्माको यह बुद्धि या इच्छा हुई, कि हमें अनेक होना चाहिये- “बहु स्यां प्रजायेय”- और इसके बाद सृष्टि उत्पन्न हुई (छां. ६. २. ३; तै. २. ६)। इसी न्यायके अनुसार अव्यक्त प्रकृतिभी अपनी साम्यावस्थाका भंग करके व्यक्त सृष्टिके निर्माण करनेका निश्चय पहले करलिया करती है। निश्चय-अर्थात् व्यवसाय-करना बुद्धिका लक्षण है। अतएव, सांख्योंने यह निश्चित किया है, प्रकृतिमें 'व्यवसाया- त्मिक बुद्धि'का गुण पहले उत्पन्न हुआ करता है। सारांश यह है, कि जिस प्रकार मनुष्यको पहले कुछ काम करनेकी इच्छा या बुद्धि हुआ करती है, उसी प्रकार प्रकृतिकोभी अपना विस्तार करने या पसारा पसारनेकी बुद्धि पहले हुआ करती है। परंतु इन दोनोंमें बड़ा भारी अंतर यह है, कि मनुष्यप्राणी सचेतन होनेके कारण -अर्थात् उसमें प्रकृतिकी बुद्धिके साथ सचेतन पुरुषका (आत्माका) संयोग होनेके कारण-वह स्वयं अपनी व्यवसायात्मिका बुद्धिको जान सकता है; और प्रकृति स्वयं अचेतन या जड़ है; इसलिये उसको अपनी बुद्धिका कुछ ज्ञान नहीं रहता। यह अंतर पुरुषके संयोगसे प्रकृतिमें उत्पन्न होनेवाले चैतन्यके कारण हुआ करता है; यह केवल जड़ या अचेतन प्रकृतिका गुण नहीं है। अर्वाचीन आधिभौतिक सृष्टि- शास्त्रज्ञभी अब कहने लगे हैं, कि इस बातको बिना माने कि मानवी इच्छाकी बराबरी करनेवाली किंतु अस्वयंवेद्य शक्ति जड़ पदार्थोंमेंभी रहती है, गुरुत्वाकर्षण अथवा रसायन-क्रियाका और लोहचुंबकका आकर्षण तथा अपसारण प्रभृति केवल जड़ सृष्टि- मेंही दृग्गोचर होनेवाले गुणोंका मूल कारण ठीक ठीक बतलाया नहीं जा सकता।* आधुनिक सृष्टिशास्त्रज्ञोंके उक्त मतपर ध्यान देनेसे सांख्योंका यह सिद्धान्त आश्चर्य- कारक नहीं प्रतीत होता, कि प्रकृतिमें पहले बुद्धि-गुणका प्रादुर्भाव होता है। प्रकृतिमें
- "Without the assumption of an atomic soul the commonest and the most general phenomena of Chemistry are inexplicable. Pleasure and pain, desire and aversion, attraction and repulsion must be common to all atoms of an aggregate; for the movements of atoms which must take place in the formation and dissolution of a chemical compound can be explained only by attributing to them Sensation and Will." - Haeckel in the Perigenesis of the Plastidule - cited in Martineau's Types of Ethical Theory, Vol. II, p. 399, 3rd Ed. Haeckel himself explains this statement as follows :- "I explicitly stated that I conceived the elementary psychic qualities of Sensation and will which may be attributed to atoms, to be unconscious - just as unconscious as the elementary memory, which I, in common with the distinguished psychologist Ewald Hering, consider to be a common function of all organised matter, or more correctly the living substances." - The Riddle of the Universe, Chap. IX, p. 63 (R. P. A. Cheap Ed.).
विश्वकी रचना और संहार १७५
प्रथम उत्पन्न होनेवाले इन गुणोंको यदि आप चाहें, तो अचेतन अथवा अस्वयंवेद्य अर्थात् अपने आपको ज्ञात न होनेवाली बुद्धि कह सकते हैं। परंतु, उसे चाहे जो कहें; इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्यको होनेवाली बुद्धि और प्रकृतिको होनेवाली बुद्धि दोनों मूलमें एकही श्रेणीकी हैं; और इसी कारण दोनों स्थानोंपर उनकी व्याख्याएँभी एकही-सी की गई हैं। उस बुद्धिकेही "महत्, ज्ञान, मति, आसुरी, प्रजा, ख्याति" आदि अन्य नाम हैं। मालूम होता है, कि इसमेंसे 'महत्' (पुँल्लिङ्ग कर्ताका एकवचन महानबड़ा) नाम इस गुणकी श्रेष्ठताके कारण दिया गया होगा; अथवा इसलिये दिया गया होगा, कि अब प्रकृति बढ़ने लगती है। प्रकृतिमें पहले उत्पन्न होनेवाला महान् अथवा बुद्धि-गुण 'सत्त्व-रज-तम'के मिश्रणहीका परिणाम है। इसलिये प्रकृतिकी यह बुद्धि यद्यपि देखनेमें एकही प्रतीत होती हो, तथापि यह आगे कई प्रकारकी हो सकती है। क्योंकि ये गुण - सत्त्व, रज और तम - प्रथम दृष्टिसे यद्यपि तीन हैं, तथापि विचार-दृष्टिसे प्रकट हो जाता है, कि इनके मिश्रणमें प्रत्येक गुणका परिमाण अनंत रीतिसे भिन्न भिन्न हुआ करता है, और इसी लिये इन तीनोंमेंसे प्रत्येक गुणके अनंत भिन्न परिमाणसे उत्पन्न होनेवाली बुद्धिके प्रकारभी त्रिघात अनंत हो सकते हैं। अव्यक्त प्रकृतिसे निर्मित होनेवाली यह बुद्धिभी प्रकृतिकेही सदृश सूक्ष्म होती है। परंतु पिछले प्रकरणमें 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' तथा 'सूक्ष्म' और 'स्थूल'का जो अर्थ बतलाया गया है, उसके अनुसार यह बुद्धि प्रकृतिके समान सूक्ष्म होनेपरभी उसके समान अव्यक्त नहीं है - मनुष्यको इसका ज्ञान हो सकता है। अतएव, अब यह सिद्ध हो चुका, कि इस बुद्धिका समावेश व्यक्तमें (अर्थात् मनुष्यको गोचर होनेवाले पदार्थोंमें) होता है; और सांख्यशास्त्रमें न केवल बुद्धि किंतु बुद्धिके आगे प्रकृतिके बादके सब विकारभी व्यक्तही माने जाते हैं। एक मूल प्रकृतिके सिवा कोईभी अन्य तत्त्व अव्यक्त नहीं है। इस प्रकार, यद्यपि अव्यक्त प्रकृतिमें व्यक्त व्यवसायात्मिका - बुद्धि उत्पन्न हो जाती है, तथापि प्रकृति अबतक एकही बनी रहती है। इस एकरूपताका भंग होना और अनेकरूपता या विविधत्वका उत्पन्न होनाही पृथकत्व कहलाता है। उदाहरणार्थ, पारेका जमीनपर गिरना और उसकी अलग अलग छोटी छोटी गोलियाँ बन जाना। बुद्धिके बाद जब तक यह पृथकत्व या विविधरूपता उत्पन्न न हो, तब तक एकही प्रकृतिके अनेक पदार्थ हो जाना संभव नहीं। बुद्धिसे बादमें उत्पन्न होनेवाली पृथकताके गुणकोही 'अहंकार' कहते हैं। क्योंकि पृथकता, 'मैं-तू' शब्दोंसेही, प्रथम व्यक्त की जाती है; और 'मैं-तू'का अर्थही अहंकार, अथवा अहं-अहं (मैं-मैं) करना है। प्रकृतिमें उत्पन्न होनेवाले अहंकारके इस गुणको यदि आप चाहें, तो अस्वयंवेद्य अर्थात् अपने आपको ज्ञात न होनेवाला अहंकार कह सकते हैं। परंतु स्मरण रहे, कि मनुष्यमें प्रकट होनेवाला अहंकार, और वह अहंकार कि जिसके कारण पेड़, पत्थर, पानी अथवा भिन्न भिन्न मूल
१७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमाणु एकरूप प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं, ये दोनों एकही जातिके हैं। भेद केवल इतनाही है, कि पत्थरमें चैतन्य न होनेके कारण उसे 'अहं'का ज्ञान नहीं होता, और मुंह न होनेके कारण 'मैं-तू' कहकर स्वाभिमानपूर्वक अपनी किसीपर वह प्रकट नहीं कर सकता। सारांश यह है, कि दूसरोंसे पृथक् रहनेका - अर्थात् अभिमान या अहंकारका - तत्त्व सब जगह समानही है। इस अहंकारहीको तैजस, अभि- मान, भूतादि और धातुभी कहते हैं। अहंकार बुद्धिका एक भाग है। इसलिये पहले जबतक बुद्धि न होगी, तबतक अहंकार उत्पन्न होही नहीं सकता। अतएव सांख्योंने यह निश्चित किया है, कि 'अहंकार' यह दूसरा - अर्थात् बुद्धिके बादका - गुण है। अब यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि सात्त्विक, राजस और तामस भेदोंसे बुद्धिके समान अहंकारकेभी अनंत प्रकार हो जाते हैं। इसी तरह उनके बादके गुणोंकेभी प्रत्येकके त्रिघात अनंत भेद हैं। अथवा यह कहिये, कि व्यक्त सृष्टिमें प्रत्येक वस्तुके इसी प्रकार अनंत, सात्त्विक, राजस और तामस भेद हुआ करते हैं; और इसी सिद्धान्तको लक्ष्य करके गीतामें गुणत्रय-विभाग और श्रद्धात्रय- विभाग बतलाये गये हैं (गीता अ. १४ और १७)। व्यवसायात्मिका बुद्धि और अहंकार, ये दोनों व्यक्त गुण जब मूल साम्या- वस्थाकी प्रकृतिमें उत्पन्न हो जाते हैं, तब प्रकृतिकी एकरूपता भंग हो जाती है और उससे अनेक पदार्थ बनने लगते हैं। तथापि उसकी सूक्ष्मता अबतक कायम रहती है। अर्थात् यह कहना अयुक्त न होगा, कि अब नैयायिकोंके सूक्ष्म परमाणुओंका आरंभ होता है। क्योंकि अहंकार उत्पन्न होनेके पहले प्रकृति अखंडित और निरवयव थी। वस्तुतः देखनेसे तो प्रतीत होता है, कि निरी बुद्धि और निरा अहंकार केवल गुण हैं ! अतएव, उपर्युक्त सिद्धान्तोंसे यह मतलब नहीं लेना चाहिये, कि वे (बुद्धि और अहं- कार) प्रकृतिके द्रव्यसे पृथक् रहते हैं। वास्तवमें बात यह है, कि जब मूल एक और अवयवरहितही प्रकृतिमें इन गुणरूपोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, तब उसीको विविध- रूप और अवयवसहित द्रव्यात्मक व्यक्त रूप प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार जब अहंकारसे मूलप्रकृतिमें भिन्न भिन्न पदार्थ बननेकी शक्ति आ जाती है, तब आगे उसकी वृद्धिकी दो शाखाएँ हो जाती हैं। एक - पेड़, मनुष्य आदि सेंद्रिय प्राणियोंकी सृष्टि और दूसरी, निरिंद्रिय पदार्थोंकी सृष्टि। यहाँ इंद्रिय शब्दसे केवल "इंद्रियवान् प्राणियोंकी इंद्रियोंकी शक्ति" इतनाही अर्थ लेना चाहिये। इसका कारण यह है, कि सेंद्रिय प्राणियोंकी जड़ देहका समावेश जड़ यानी निरिंद्रिय सृष्टिमें होता है; और इन प्राणियोंकी आत्मा 'पुरुष' नामक अन्य वर्गमें शामिल किया जाता है। इसीलिये सांख्यशास्त्रमें सेंद्रिय सृष्टिका विचार करते समय, देह और आत्माको छोड़ केवल इंद्रियोंकाही विचार किया गया है। इस जगत्में सेंद्रिय अथवा निरिंद्रिय पदार्थोंके अतिरिक्त किसी तीसरे पदार्थका होना संभव नहीं। इसलिये कहनेकी आवश्य- कता नहीं, कि अहंकारसे दोसे अधिक शाखाएँ निकलही नहीं सकतीं। इनमें
विश्वकी रचना और संहार १७७ निरिंद्रिय पदार्थोंकी अपेक्षा इंद्रियशक्ति श्रेष्ठ है। इसलिये इंद्रिय सृष्टिको सात्त्विक (अर्थात् सत्त्वगुणके उत्कर्षसे होनेवाली) कहते हैं; और निरिंद्रिय सृष्टिको तामस (अर्थात् तमोगुणके उत्कर्षसे होनेवाली) कहते हैं। सारांश यह है, कि जब अहंकार अपनी शक्तिसे भिन्न भिन्न पदार्थ उत्पन्न करने लगता है, तब उसीमें एक बार सत्त्वगुणका उत्कर्ष होकर एक ओर पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और मन मिलकर इंद्रिय सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह इंद्रियाँ उत्पन्न होती हैं; और दूसरी ओर, तमोगुणका उत्कर्ष होकर उससे निरिंद्रिय सृष्टिके मूलभूत पाँच तन्मात्रद्रव्य उत्पन्न होते हैं। परंतु प्रकृतिकी सूक्ष्मता अबतक कायम रही है; इसलिये अहंकारसे उत्पन्न होनेवाले ये सोलह तत्त्वभी सूक्ष्मही रहते हैं।* शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधकी तन्मात्राएँ - अर्थात् बिना मिश्रण हुए प्रत्येक गुणके भिन्न भिन्न अति सूक्ष्म मूल स्वरूप - निरिंद्रिय - सृष्टिके मूलतत्त्व हैं; और मनसहित ग्यारह इंद्रियाँ-सृष्टिकी बीज हैं। इस विषयकी सांख्यशास्त्रकी उपपत्ति विचार करनेयोग्य है, कि निरिंद्रिय सृष्टिके मूल तत्त्व (तन्मात्र) पाँचही क्यों और सेंद्रिय सृष्टिके मूल तत्त्व ग्यारहही क्यों माने जाते हैं। अर्वाचीन सृष्टिशास्त्रज्ञोंने सृष्टिके पदार्थोंके तीन भेद - घन, द्रव और वायुरूपी - किये हैं; परंतु सांख्य- शास्त्रकारोंका पदार्थोंका वर्गीकरण इससे भिन्न है। उनका कथन है कि मनुष्यको सृष्टिके सब पदार्थोंका ज्ञान केवल पाँच ज्ञानेंद्रियोंसे हुआ करता है; और इन ज्ञानेंद्रियोंकी रचना कुछ ऐसी विलक्षण है, कि एक इंद्रियको सिर्फ़ एकही गुणका ज्ञान हुआ करता है। आँखोंसे सुगंध नहीं मालूम होती और न कानसे दीखता है; त्वचासे मीठा-कडुवा नहीं समझ पड़ता और न जिव्हासे शब्दज्ञान होता है; नाकसे सफ़ेद और काले रंगका भेदभी नहीं मालूम होता। जब इस प्रकार पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और उनके पाँच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - निश्चित हैं; तब यह प्रकट है, कि सृष्टिके सब गुणभी पाँचसे अधिक नहीं माने जा सकते। क्योंकि यदि हम कल्पनासे यह मानभी लें कि गुण पाँचसे अधिक हैं; तो कहना नहीं होगा, कि उनको जाननेके लिये हमारे पास कोई साधन या उपाय नहीं है। इन पाँच गुणोंमेंसे प्रत्येकके अनेक भेद हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, यद्यपि 'शब्द' - एकही गुण है, तथापि * संक्षेपमें यही अंग्रेजी भाषामें इस प्रकार कहा जा सकता है :- The Primeval matter (Prakriti) was at first homogeneous. It resolved (Buddhi) to unfold itself, and by the principle of differentiation (Ahamkara) became hetrogeneous. It then branched off into Two Sections - one organic (Sendriya) and the other inorganic (Nirindriya). There are eleven elements of the organic and five of the inorganic creation. Purusha or the observer is different from all these and falls under none of the above categories. गी. र. १२
१७८ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र उसके छोटा, बड़ा, कर्कश, भद्दा, फटा हुआ, कोमल अथवा गायनशास्त्रके अनुसार निषाद, गांधार, षड्ज आदि; और व्याकरणशास्त्रके अनुसार कण्ठ्य, तालव्य, और औष्ठ्य आदि अनेक भेद हुआ करते हैं। इसी तरह यद्यपि 'रूप' एकही गुण है, तथापि उसकेभी अनेक भेद हुआ करते हैं; जैसे सफ़ेद, काला, नीला, पीला, हरा, लाल, आदि। इसी तरह यद्यपि 'रस' या 'रुचि' एकही गुण है, तथापि उसके खट्टा, मीठा, तीखा, कडुवा, खारा आदि अनेक भेद हो जाते हैं। और, 'मिठास' यद्यपि एक विशिष्ट रुचि है, तथापि हम देखते हैं, कि गन्नेकी मिठास, दूधकी मिठास, गुड़ की मिठास और शक्करकी मिठास भिन्न भिन्न होती है; तथा इस प्रकार उस एकही 'मिठास'के अनेक भेद हो जाते हैं। यदि भिन्न भिन्न गुणोंके भिन्न भिन्न मिश्रणोंपर विचार किया जाय, तो यह गुणवैचित्र्य अनंत प्रकारसे अनंत हो सकता है। परंतु चाहे जो हो; पदार्थोंके मूल गुण पाँचसे कभी अधिक हो नहीं सकते। क्योंकि इंद्रियां केवल पाँच हैं, और प्रत्ये- कको एकही एक गुणका बोध हुआ करता है। इसलिये सांख्योने यह निश्चित किया है, कि यद्यपि केवल शब्दगुणके अथवा केवल स्पर्शगुणके पृथक् पृथक् यानी दूसरे गुणोंके मिश्रणरहित पदार्थ हमें दीख न पड़ते हों, तथापि इसमें संदेह नहीं, कि मूल प्रकृतिमें निरा शब्द, निरा स्पर्श, निरा रूप, निरा रस और निरा गंध है - उस प्रकार शब्दतन्मात्र, स्पर्शतन्मात्र, रूपतन्मात्र, रसतन्मात्र और गंधतन्मात्र ही हैं - अर्थात् मूल प्रकृतिके यही पाँच भिन्न भिन्न सूक्ष्म तन्मात्रविकार अथवा द्रव्य निःसंदेह हैं। आगे इस बातका विचार किया गया है, कि पंचतन्मात्राओं अथवा उनसे उत्पन्न होनेवाले पंचमहाभूतोंके संबंधमें उपनिषत्कारोंका कथन क्या है। निरिंद्रिय सृष्टिका इस प्रकार विचार करके यह निश्चित किया गया है, कि उसमें पाँचही मूलतत्त्व हैं। और जब हम सेंद्रिय सृष्टिपर दृष्टि डालते हैं, तबभी यही प्रतीत होता है, कि पाँच, ज्ञानेंद्रियाँ, पांच कर्मेंद्रियाँ और मन, इन ग्यारह इंद्रि- योंकी अपेक्षा अधिक इंद्रियाँ किसीकेभी नहीं हैं। स्थूल देहमें हाथ और पैर आदि इंद्रियाँ यद्यपि स्थूल प्रतीत होती हैं, तथापि इनमेंसे प्रत्येककी जड़में किसी मूल सूक्ष्म तत्त्वका अस्तित्व माने बिना इंद्रियोंकी भिन्नताका यथोचित कारण मालूम नहीं होता। पाश्चिमात्य आधिभौतिक उत्क्रांतिवादियोंमें इसपर बहुत विवाद हुआ है। अर्वाचीन सृष्टि-शास्त्रज्ञ कहते हैं, कि मूलके अत्यंत छोटे और गोलाकार जंतुओंमें सिर्फ़ 'त्वचा' ही एक इंद्रिय होती है; और इस त्वचासे अन्य इंद्रियाँ क्रमशः उत्पन्न हुई है। उदाहरणार्थ, मूल जंतुकी त्वचासे प्रकाशका संयोग होनेपर आँख उत्पन्न हुई, इत्यादि। आधिभौतिक-वादियोंका यह तत्त्व - कि प्रकाश आदिके संयोगसे स्थूल-इंद्रियोंका प्रादुर्भाव होता है - सांख्योंकोभी ग्राह्य है। महाभारत (महा. शां. २१३. १६) में, सांख्यप्रक्रियाके अनुसार इंद्रियोंके प्रादुर्भावका वर्णन इस प्रकार पाया जाता है :- शब्दरागात् श्रोत्रमस्य जायते भावितात्मनः । रूपरागात् तथा चक्षुः घ्राणं गंधजिघृक्षया ॥
अर्थात् "प्राणियोंके आत्माको जब सुननेकी भावना हुई, तब कान उत्पन्न हुआ; रूप पहचाननेकी इच्छासे आँख; सूंघनेकी इच्छासे नाक उत्पन्न हुई।" परंतु सांख्योंका यह कथन है, कि यद्यपि त्वचाका प्रादुर्भाव पहले होता हो, तथापि मूल प्रकृतिमेंही यदि भिन्न भिन्न इंद्रियोंके उत्पन्न होनेकी शक्तिका न हो, तो सजीव सृष्टिके अत्यंत छोटे कीड़ोंकी त्वचापर सूर्यप्रकाशका चाहे जितना आघात या संयोग होता रहे, तोभी उन्हें आँखें - और वेभी शरीरके एक विशिष्ट भागहीमें - कैसे प्राप्त हो सकती है ? डार्विनका सिद्धान्त सिर्फ यह आशय प्रकट करता है, कि दो प्राणियों - एक चक्षुवाला और दूसरा चक्षुरहितके - निर्मित होनेपर, इस जड़ सृष्टिके कलहमें चक्षुवाला अधिक समयतक टिक सकता है; और दूसरा शीघ्रही नष्ट हो जाता है। परंतु पश्चिमी आधिभौतिक सृष्टिशास्त्रज्ञ इस बातका मूल कारण नहीं बतला सकते, कि नेत्र आदि भिन्न भिन्न इंद्रियोंकी उत्पत्ति पहले हुईही क्यों। सांख्योंका मत यह है, कि ये सब इंद्रियाँ किसी एकही मूल इंद्रियसे क्रमशः उत्पन्न नहीं हुईं, किंतु जब अहंकारके कारण प्रकृतिमें विविधरूपता उत्पन्न होने लगती है, तब पहले उस अहंकारसे पाँच सूक्ष्म कर्मेंद्रियाँ, पाँच सूक्ष्म ज्ञानेंद्रियाँ और मन, इन सबको मिलाकर ग्यारह भिन्न भिन्न गुण (शक्ति) सबके सब एकसाथ (युगपत्) स्वतंत्र होकर मूलप्रकृतिमेंही उत्पन्न होते हैं; और फिर इसके बाद स्थूल सेंद्रिय सृष्टि उत्पन्न हुआ करती है। इन ग्यारह इंद्रियोंमेंसे मनके बारेमें पहलेही छठे प्रकरणमें बतला दिया गया है, कि वह ज्ञानेंद्रियोंके साथ संकल्पविकल्पात्मक होता है; अर्थात् ज्ञानेंद्रियोंसे ग्रहण किये गये संस्कारोंकी व्यवस्था करके वह उन्हें बुद्धिके सामने निर्णयार्थ उपस्थित करता है; और कर्मेंद्रियोंके साथ वह व्याकरणात्मक होता है; अर्थात् उसे बुद्धिके निर्णयको कर्मेंद्रियोंके द्वारा अमलमें लाना पड़ता है। इस प्रकार वह उभयविध, अर्थात् इंद्रियभेदके अनुसार भिन्न भिन्न प्रकारके काम करनेवाला होता है। उपनिषदोंमें इंद्रियोंकोही 'प्राण' कहा है; और सांख्योंके मतानुसार उपनिषत्कारोँकाभी यही मत है, कि ये प्राण पंचमहाभूतात्मक नहीं हैं; किंतु परमात्मासे पृथक् उत्पन्न हुए हैं (मुंड. २. १. ३) इन प्राणोंकी - अर्थात् इंद्रियोंकी - संख्या उपनिषदोंमें कहीं दस, ग्यारह, बारह और कहीं तेरह बतलाई गई है। परंतु वेदान्तसूत्रोंके आधारसे श्रीशंकराचार्यने निश्चित किया है, कि उपनिषदोंके सब वाक्योंकी एकरूपता करनेपर इंद्रियोंकी संख्या ग्यारहही सिद्ध होती है (वे. सू. शां. २. ४. ५. ६)। और गीतामें तो इस बातका स्पष्ट उल्लेख किया गया है, कि "इंद्रियाणि दशकं च" (गीता १३. ५)
- अर्थात् इंद्रियाँ 'दस और एक' अर्थात् ग्यारह हैं। अब इस विषयपर सांख्य और वेदान्त दोनोंमें कोई मतभेद नहीं रहा। सांख्योंके निश्चित किये हुए मतका सारांश यह है - सात्त्विक अहंकारसे सेंद्रिय सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह इंद्रियशक्तियाँ (गुण) उत्पन्न होती हैं; और तामस अहंकारसे निरिंद्रिय सृष्टिके मूलभूत पाँच तन्मात्रद्रव्य निर्मित होते हैं। इसके बाद