भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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विश्वकी रचना और संहार १७७ निरिंद्रिय पदार्थोंकी अपेक्षा इंद्रियशक्ति श्रेष्ठ है। इसलिये इंद्रिय सृष्टिको सात्त्विक (अर्थात् सत्त्वगुणके उत्कर्षसे होनेवाली) कहते हैं; और निरिंद्रिय सृष्टिको तामस (अर्थात् तमोगुणके उत्कर्षसे होनेवाली) कहते हैं। सारांश यह है, कि जब अहंकार अपनी शक्तिसे भिन्न भिन्न पदार्थ उत्पन्न करने लगता है, तब उसीमें एक बार सत्त्वगुणका उत्कर्ष होकर एक ओर पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और मन मिलकर इंद्रिय सृष्टिकी मूलभूत ग्यारह इंद्रियाँ उत्पन्न होती हैं; और दूसरी ओर, तमोगुणका उत्कर्ष होकर उससे निरिंद्रिय सृष्टिके मूलभूत पाँच तन्मात्रद्रव्य उत्पन्न होते हैं। परंतु प्रकृतिकी सूक्ष्मता अबतक कायम रही है; इसलिये अहंकारसे उत्पन्न होनेवाले ये सोलह तत्त्वभी सूक्ष्मही रहते हैं।* शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंधकी तन्मात्राएँ - अर्थात् बिना मिश्रण हुए प्रत्येक गुणके भिन्न भिन्न अति सूक्ष्म मूल स्वरूप - निरिंद्रिय - सृष्टिके मूलतत्त्व हैं; और मनसहित ग्यारह इंद्रियाँ-सृष्टिकी बीज हैं। इस विषयकी सांख्यशास्त्रकी उपपत्ति विचार करनेयोग्य है, कि निरिंद्रिय सृष्टिके मूल तत्त्व (तन्मात्र) पाँचही क्यों और सेंद्रिय सृष्टिके मूल तत्त्व ग्यारहही क्यों माने जाते हैं। अर्वाचीन सृष्टिशास्त्रज्ञोंने सृष्टिके पदार्थोंके तीन भेद - घन, द्रव और वायुरूपी - किये हैं; परंतु सांख्य- शास्त्रकारोंका पदार्थोंका वर्गीकरण इससे भिन्न है। उनका कथन है कि मनुष्यको सृष्टिके सब पदार्थोंका ज्ञान केवल पाँच ज्ञानेंद्रियोंसे हुआ करता है; और इन ज्ञानेंद्रियोंकी रचना कुछ ऐसी विलक्षण है, कि एक इंद्रियको सिर्फ़ एकही गुणका ज्ञान हुआ करता है। आँखोंसे सुगंध नहीं मालूम होती और न कानसे दीखता है; त्वचासे मीठा-कडुवा नहीं समझ पड़ता और न जिव्हासे शब्दज्ञान होता है; नाकसे सफ़ेद और काले रंगका भेदभी नहीं मालूम होता। जब इस प्रकार पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और उनके पाँच विषय - शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध - निश्चित हैं; तब यह प्रकट है, कि सृष्टिके सब गुणभी पाँचसे अधिक नहीं माने जा सकते। क्योंकि यदि हम कल्पनासे यह मानभी लें कि गुण पाँचसे अधिक हैं; तो कहना नहीं होगा, कि उनको जाननेके लिये हमारे पास कोई साधन या उपाय नहीं है। इन पाँच गुणोंमेंसे प्रत्येकके अनेक भेद हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, यद्यपि 'शब्द' - एकही गुण है, तथापि * संक्षेपमें यही अंग्रेजी भाषामें इस प्रकार कहा जा सकता है :- The Primeval matter (Prakriti) was at first homogeneous. It resolved (Buddhi) to unfold itself, and by the principle of differentiation (Ahamkara) became hetrogeneous. It then branched off into Two Sections - one organic (Sendriya) and the other inorganic (Nirindriya). There are eleven elements of the organic and five of the inorganic creation. Purusha or the observer is different from all these and falls under none of the above categories. गी. र. १२