भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

DevanagariHindipublished956 पृष्ठ

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पृष्ठ 223

१७६ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र परमाणु एकरूप प्रकृतिसे उत्पन्न होते हैं, ये दोनों एकही जातिके हैं। भेद केवल इतनाही है, कि पत्थरमें चैतन्य न होनेके कारण उसे 'अहं'का ज्ञान नहीं होता, और मुंह न होनेके कारण 'मैं-तू' कहकर स्वाभिमानपूर्वक अपनी किसीपर वह प्रकट नहीं कर सकता। सारांश यह है, कि दूसरोंसे पृथक् रहनेका - अर्थात् अभिमान या अहंकारका - तत्त्व सब जगह समानही है। इस अहंकारहीको तैजस, अभि- मान, भूतादि और धातुभी कहते हैं। अहंकार बुद्धिका एक भाग है। इसलिये पहले जबतक बुद्धि न होगी, तबतक अहंकार उत्पन्न होही नहीं सकता। अतएव सांख्योंने यह निश्चित किया है, कि 'अहंकार' यह दूसरा - अर्थात् बुद्धिके बादका - गुण है। अब यह बतलानेकी आवश्यकता नहीं, कि सात्त्विक, राजस और तामस भेदोंसे बुद्धिके समान अहंकारकेभी अनंत प्रकार हो जाते हैं। इसी तरह उनके बादके गुणोंकेभी प्रत्येकके त्रिघात अनंत भेद हैं। अथवा यह कहिये, कि व्यक्त सृष्टिमें प्रत्येक वस्तुके इसी प्रकार अनंत, सात्त्विक, राजस और तामस भेद हुआ करते हैं; और इसी सिद्धान्तको लक्ष्य करके गीतामें गुणत्रय-विभाग और श्रद्धात्रय- विभाग बतलाये गये हैं (गीता अ. १४ और १७)। व्यवसायात्मिका बुद्धि और अहंकार, ये दोनों व्यक्त गुण जब मूल साम्या- वस्थाकी प्रकृतिमें उत्पन्न हो जाते हैं, तब प्रकृतिकी एकरूपता भंग हो जाती है और उससे अनेक पदार्थ बनने लगते हैं। तथापि उसकी सूक्ष्मता अबतक कायम रहती है। अर्थात् यह कहना अयुक्त न होगा, कि अब नैयायिकोंके सूक्ष्म परमाणुओंका आरंभ होता है। क्योंकि अहंकार उत्पन्न होनेके पहले प्रकृति अखंडित और निरवयव थी। वस्तुतः देखनेसे तो प्रतीत होता है, कि निरी बुद्धि और निरा अहंकार केवल गुण हैं ! अतएव, उपर्युक्त सिद्धान्तोंसे यह मतलब नहीं लेना चाहिये, कि वे (बुद्धि और अहं- कार) प्रकृतिके द्रव्यसे पृथक् रहते हैं। वास्तवमें बात यह है, कि जब मूल एक और अवयवरहितही प्रकृतिमें इन गुणरूपोंका प्रादुर्भाव हो जाता है, तब उसीको विविध- रूप और अवयवसहित द्रव्यात्मक व्यक्त रूप प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार जब अहंकारसे मूलप्रकृतिमें भिन्न भिन्न पदार्थ बननेकी शक्ति आ जाती है, तब आगे उसकी वृद्धिकी दो शाखाएँ हो जाती हैं। एक - पेड़, मनुष्य आदि सेंद्रिय प्राणियोंकी सृष्टि और दूसरी, निरिंद्रिय पदार्थोंकी सृष्टि। यहाँ इंद्रिय शब्दसे केवल "इंद्रियवान् प्राणियोंकी इंद्रियोंकी शक्ति" इतनाही अर्थ लेना चाहिये। इसका कारण यह है, कि सेंद्रिय प्राणियोंकी जड़ देहका समावेश जड़ यानी निरिंद्रिय सृष्टिमें होता है; और इन प्राणियोंकी आत्मा 'पुरुष' नामक अन्य वर्गमें शामिल किया जाता है। इसीलिये सांख्यशास्त्रमें सेंद्रिय सृष्टिका विचार करते समय, देह और आत्माको छोड़ केवल इंद्रियोंकाही विचार किया गया है। इस जगत्में सेंद्रिय अथवा निरिंद्रिय पदार्थोंके अतिरिक्त किसी तीसरे पदार्थका होना संभव नहीं। इसलिये कहनेकी आवश्य- कता नहीं, कि अहंकारसे दोसे अधिक शाखाएँ निकलही नहीं सकतीं। इनमें