श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकी रचना और संहार १७५
प्रथम उत्पन्न होनेवाले इन गुणोंको यदि आप चाहें, तो अचेतन अथवा अस्वयंवेद्य अर्थात् अपने आपको ज्ञात न होनेवाली बुद्धि कह सकते हैं। परंतु, उसे चाहे जो कहें; इसमें संदेह नहीं, कि मनुष्यको होनेवाली बुद्धि और प्रकृतिको होनेवाली बुद्धि दोनों मूलमें एकही श्रेणीकी हैं; और इसी कारण दोनों स्थानोंपर उनकी व्याख्याएँभी एकही-सी की गई हैं। उस बुद्धिकेही "महत्, ज्ञान, मति, आसुरी, प्रजा, ख्याति" आदि अन्य नाम हैं। मालूम होता है, कि इसमेंसे 'महत्' (पुँल्लिङ्ग कर्ताका एकवचन महानबड़ा) नाम इस गुणकी श्रेष्ठताके कारण दिया गया होगा; अथवा इसलिये दिया गया होगा, कि अब प्रकृति बढ़ने लगती है। प्रकृतिमें पहले उत्पन्न होनेवाला महान् अथवा बुद्धि-गुण 'सत्त्व-रज-तम'के मिश्रणहीका परिणाम है। इसलिये प्रकृतिकी यह बुद्धि यद्यपि देखनेमें एकही प्रतीत होती हो, तथापि यह आगे कई प्रकारकी हो सकती है। क्योंकि ये गुण - सत्त्व, रज और तम - प्रथम दृष्टिसे यद्यपि तीन हैं, तथापि विचार-दृष्टिसे प्रकट हो जाता है, कि इनके मिश्रणमें प्रत्येक गुणका परिमाण अनंत रीतिसे भिन्न भिन्न हुआ करता है, और इसी लिये इन तीनोंमेंसे प्रत्येक गुणके अनंत भिन्न परिमाणसे उत्पन्न होनेवाली बुद्धिके प्रकारभी त्रिघात अनंत हो सकते हैं। अव्यक्त प्रकृतिसे निर्मित होनेवाली यह बुद्धिभी प्रकृतिकेही सदृश सूक्ष्म होती है। परंतु पिछले प्रकरणमें 'व्यक्त' और 'अव्यक्त' तथा 'सूक्ष्म' और 'स्थूल'का जो अर्थ बतलाया गया है, उसके अनुसार यह बुद्धि प्रकृतिके समान सूक्ष्म होनेपरभी उसके समान अव्यक्त नहीं है - मनुष्यको इसका ज्ञान हो सकता है। अतएव, अब यह सिद्ध हो चुका, कि इस बुद्धिका समावेश व्यक्तमें (अर्थात् मनुष्यको गोचर होनेवाले पदार्थोंमें) होता है; और सांख्यशास्त्रमें न केवल बुद्धि किंतु बुद्धिके आगे प्रकृतिके बादके सब विकारभी व्यक्तही माने जाते हैं। एक मूल प्रकृतिके सिवा कोईभी अन्य तत्त्व अव्यक्त नहीं है। इस प्रकार, यद्यपि अव्यक्त प्रकृतिमें व्यक्त व्यवसायात्मिका - बुद्धि उत्पन्न हो जाती है, तथापि प्रकृति अबतक एकही बनी रहती है। इस एकरूपताका भंग होना और अनेकरूपता या विविधत्वका उत्पन्न होनाही पृथकत्व कहलाता है। उदाहरणार्थ, पारेका जमीनपर गिरना और उसकी अलग अलग छोटी छोटी गोलियाँ बन जाना। बुद्धिके बाद जब तक यह पृथकत्व या विविधरूपता उत्पन्न न हो, तब तक एकही प्रकृतिके अनेक पदार्थ हो जाना संभव नहीं। बुद्धिसे बादमें उत्पन्न होनेवाली पृथकताके गुणकोही 'अहंकार' कहते हैं। क्योंकि पृथकता, 'मैं-तू' शब्दोंसेही, प्रथम व्यक्त की जाती है; और 'मैं-तू'का अर्थही अहंकार, अथवा अहं-अहं (मैं-मैं) करना है। प्रकृतिमें उत्पन्न होनेवाले अहंकारके इस गुणको यदि आप चाहें, तो अस्वयंवेद्य अर्थात् अपने आपको ज्ञात न होनेवाला अहंकार कह सकते हैं। परंतु स्मरण रहे, कि मनुष्यमें प्रकट होनेवाला अहंकार, और वह अहंकार कि जिसके कारण पेड़, पत्थर, पानी अथवा भिन्न भिन्न मूल