भारतकोश
श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)

Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा

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१७४ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र बुद्धिसे निश्चित कर लेता है, अथवा पहले वह काम करनेकी बुद्धि या इच्छा उसमें उत्पन्न हुआ करती है। उपनिषदोंमेंभी इस प्रकारका वर्णन है, कि आरंभमें मूल परमात्माको यह बुद्धि या इच्छा हुई, कि हमें अनेक होना चाहिये- “बहु स्यां प्रजायेय”- और इसके बाद सृष्टि उत्पन्न हुई (छां. ६. २. ३; तै. २. ६)। इसी न्यायके अनुसार अव्यक्त प्रकृतिभी अपनी साम्यावस्थाका भंग करके व्यक्त सृष्टिके निर्माण करनेका निश्चय पहले करलिया करती है। निश्चय-अर्थात् व्यवसाय-करना बुद्धिका लक्षण है। अतएव, सांख्योंने यह निश्चित किया है, प्रकृतिमें 'व्यवसाया- त्मिक बुद्धि'का गुण पहले उत्पन्न हुआ करता है। सारांश यह है, कि जिस प्रकार मनुष्यको पहले कुछ काम करनेकी इच्छा या बुद्धि हुआ करती है, उसी प्रकार प्रकृतिकोभी अपना विस्तार करने या पसारा पसारनेकी बुद्धि पहले हुआ करती है। परंतु इन दोनोंमें बड़ा भारी अंतर यह है, कि मनुष्यप्राणी सचेतन होनेके कारण -अर्थात् उसमें प्रकृतिकी बुद्धिके साथ सचेतन पुरुषका (आत्माका) संयोग होनेके कारण-वह स्वयं अपनी व्यवसायात्मिका बुद्धिको जान सकता है; और प्रकृति स्वयं अचेतन या जड़ है; इसलिये उसको अपनी बुद्धिका कुछ ज्ञान नहीं रहता। यह अंतर पुरुषके संयोगसे प्रकृतिमें उत्पन्न होनेवाले चैतन्यके कारण हुआ करता है; यह केवल जड़ या अचेतन प्रकृतिका गुण नहीं है। अर्वाचीन आधिभौतिक सृष्टि- शास्त्रज्ञभी अब कहने लगे हैं, कि इस बातको बिना माने कि मानवी इच्छाकी बराबरी करनेवाली किंतु अस्वयंवेद्य शक्ति जड़ पदार्थोंमेंभी रहती है, गुरुत्वाकर्षण अथवा रसायन-क्रियाका और लोहचुंबकका आकर्षण तथा अपसारण प्रभृति केवल जड़ सृष्टि- मेंही दृग्गोचर होनेवाले गुणोंका मूल कारण ठीक ठीक बतलाया नहीं जा सकता।* आधुनिक सृष्टिशास्त्रज्ञोंके उक्त मतपर ध्यान देनेसे सांख्योंका यह सिद्धान्त आश्चर्य- कारक नहीं प्रतीत होता, कि प्रकृतिमें पहले बुद्धि-गुणका प्रादुर्भाव होता है। प्रकृतिमें

  • "Without the assumption of an atomic soul the commonest and the most general phenomena of Chemistry are inexplicable. Pleasure and pain, desire and aversion, attraction and repulsion must be common to all atoms of an aggregate; for the movements of atoms which must take place in the formation and dissolution of a chemical compound can be explained only by attributing to them Sensation and Will." - Haeckel in the Perigenesis of the Plastidule - cited in Martineau's Types of Ethical Theory, Vol. II, p. 399, 3rd Ed. Haeckel himself explains this statement as follows :- "I explicitly stated that I conceived the elementary psychic qualities of Sensation and will which may be attributed to atoms, to be unconscious - just as unconscious as the elementary memory, which I, in common with the distinguished psychologist Ewald Hering, consider to be a common function of all organised matter, or more correctly the living substances." - The Riddle of the Universe, Chap. IX, p. 63 (R. P. A. Cheap Ed.).