श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकी रचना और संहार १७३ या नही। हेकेलके सदृश कुछ पंडित यह मानकर, कि जड़ पदार्थोंसेही बढ़ते बढ़ते आत्मा और चैतन्यकी उत्पत्ति हुई, जड़ाद्वैतका प्रतिपादन करते हैं, और इसके विरुद्ध कांटसरीखे अध्यात्मज्ञानियोंका यह कथन है, कि हमें सृष्टिका जो ज्ञान होता है, वह हमारे आत्माके एकीकरण - व्यापारका फल है, इसलिये आत्माको एक स्वतंत्र तत्त्व माननाही पड़ता है। क्योंकि यह कहना - कि जो आत्मा बाह्य- सृष्टिका ज्ञाता है, वह उसी गोचर सृष्टिका एक भाग है अथवा उस सृष्टिहीसे वह उत्पन्न हुआ है - तर्कदृष्टिसे ठीक वैसेही असमंजस या भ्रामक प्रतीत होगा, जैसे यह उक्ति कि हम स्वयं अपनेही कंधेपर बैठ सकते हैं। यही कारण है, कि सांख्यशास्त्रमें प्रकृति और पुरुष, ये दो स्वतंत्र तत्त्व माने गये हैं। सारांश यह है, कि आधिभौतिक सृष्टिज्ञान चाहे जितनी उन्नति करे; तथापि अबतक पश्चिमी देशोंमें बहुतेरे बड़े बड़े पंडित यही प्रतिपादन किया करते हैं, कि सृष्टिके मूल तत्त्वके स्वरूपका विवेचन हमेशा भिन्न पद्धतिसे किया जाना चाहिये । परंतु, यदि केवल इतनाही विचार किया जाय, कि एक जड़ प्रकृतिसे आगे सब व्यक्त पदार्थ किस क्रमसे बने हैं, तो पाठकोंको मालूम हो जायगा, कि पश्चिमी उत्क्रांतिमतमें और सांख्यशास्त्रमें वर्णित प्रकृतिके कार्यसंबंधी तत्त्वोंमें कोई विशेष अंतर नहीं है। क्योंकि इस मुख्य सिद्धान्तसे दोनों सहमत हैं, कि अव्यक्त, सूक्ष्म और एक मूल रूप प्रकृतिहीसे क्रमशः ( सूक्ष्म और स्थूल ) विविध रूप व्यक्त सृष्टि निर्मित हुई है। परंतु अब आधिभौतिक शास्त्रोंके ज्ञानकी खूब वृद्धि हो जानेके कारण, सांख्य- वादियोंके “सत्त्व, रज, तम इन तीन गुणोंके बदले, आधुनिक सृष्टिशास्त्रज्ञोंने गति, उष्णता और आकर्षणशक्ति को प्रधानगुण मान रखा है। यह बात सच है, कि “सत्त्व, रज, तम ” गुणोंकी न्यूनाधिकताके परिमाणोंकी अपेक्षा, उष्णता अथवा आकर्षणशक्तिकी न्यूनाधिकताकी बात आधिभौतिकशास्त्रकी दृष्टिसे सरलतापूर्वक समझमें आ जाती है। तथापि गुणोंके विकास अथवा गुणोत्कर्षका जो यह तत्त्व है, कि “गुणा गुणेषु वर्तन्ते” (गीता ३. २८), वह दोनों ओर समानही है। सांख्यशास्त्रज्ञोंका कथन है, कि जिस तरह मोड़दार पंखेको धीरे धीरे खोलते हैं उसी तरह सत्त्व, रज, तमकी साम्यावस्थामें रहनेवाली प्रकृतिकी तह जब धीरे धीरे खुलने लगती है, तब सब व्यक्त सृष्टि निर्मित होती है - और इस कथनमें और उत्क्रांतिवादमें वस्तुतः कुछ भेद नहीं है। तथापि, यह भेद तात्त्विक धर्मदृष्टिसे ध्यानमें रखनेयोग्य है, कि ईसाई धर्मके समान गुणोत्कर्षतत्त्वका अनादर न करते हुए, गीतामें और अंशतः उपनिषद् आदि वैदिक ग्रंथोंमेंभी, अद्वैत वेदान्तके साथही साथ बिना किसी विरोधके गुणोत्कर्षवाद स्वीकार किया गया है। अब देखना चाहिये कि प्रकृतिके विकासक्रमके विषयमें सांख्यशास्त्रकारोंका क्या कथन है। इस क्रमहीको गुणोत्कर्ष अथवा गुणपरिणामवाद कहते हैं। यह बतलानेकी आवश्यकता नही, कि कोई काम आरंभ करनेके पहले मनुष्य उसे अपनी