श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
पृष्ठ 219, कुल 956 में से
संदर्भ में पढ़ें१७२ गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र नहीं है, कि वेदान्तियोंने अथवा पौराणिकोंने यह ज्ञान कपिलसे प्राप्त किया है; किंतु यहाँ पर केवल इतनाही अर्थ अभिप्रेत है, कि सृष्टिके उत्पत्तिक्रमका ज्ञान सर्वत्र एक-सा दीख पड़ता है। इतनाही नहीं; किंतु यहभी कहा जा सकता है, कि यहाँ पर 'सांख्य' शब्द प्रयोग 'ज्ञान'के व्यापक अर्थहीमें किया गया है। तथापि कपिलाचार्यने सृष्टिके उत्पत्तिक्रमका वर्णन शास्त्रीय दृष्टिसे विशेष पद्धतिपूर्वक किया है; और भगवद्गीतामेंभी विशेष करके इसी सांख्यक्रमका स्वीकार किया गया है, इस कारण उसीका विवेचन इस प्रकरणमें किया जायगा। सांख्योंका सिद्धान्त है, कि इंद्रियोंको अगोचर अर्थात् अव्यक्त, सूक्ष्म और चारों ओर अखंडित भरे हुए एकही निरवयव मूलद्रव्यसे सारी व्यक्त सृष्टि उत्पन्न हुई है। यह सिद्धान्त पश्चिमी देशोंके अर्वाचीन आधिभौतिक शास्त्रज्ञोंको ग्राह्य है। ग्राह्यही क्यों, अब तो उन्होंने यहभी निश्चित किया है, कि इसी मूलद्रव्य की शक्तिका क्रमशः विकास होता आया है; और इस पूर्वापार क्रमको छोड़ बीचमें अचानक या निरर्थक कुछभी निर्माण नहीं हुआ है। इसी मतको उत्क्रांतिवाद या विकास सिद्धान्त कहते हैं। जब यह सिद्धान्त पश्चिमी राष्ट्रोंमें, गतशताब्दीमें, पहले पहल ढूंढ निकाला गया, तब वहाँ बड़ी खलबली मच गई थी। ईसाई धर्म-पुस्तकोंमें यह वर्णन है, कि ईश्वरने पंचमहाभूतोंको और जंगमवर्गके प्रत्येक प्राणीकी जातिको भिन्न भिन्न समयपर पृथक् पृथक् और स्वतंत्र निर्माण किया है; और उत्क्रांतिवादके पहले इसी मतको सब ईसाई लोक सत्य मानते थे। अतएव, जब ईसाई धर्मका उक्त सिद्धान्त उत्क्रांतिवादसे असत्य ठहराया जाने लगा, तब उत्क्रांति- वादियोंपर खूब जोरसे आक्रमण और कटाक्ष होने लगे। ये कटाक्ष आजकलभी न्यूनाधिक होतेही रहते हैं। तथापि, शास्त्रीय सत्यमें अधिक शक्ति होनेके कारण सृष्ट्युत्पत्तिके संबंधमें सब विद्वानोंको उत्क्रांतिमतही आजकल अधिक ग्राह्य होने लगा है। इस मतका सारांश यह है – सूर्यमालामें पहले एक सूक्ष्म द्रव्यही भरा हुआ था। उसकी मूल गति अथवा उष्णताका परिमाण घटता गया। तब उस द्रव्यका अधिकाधिक संकोच होने लगा; और पृथ्वी समवेत सब ग्रह क्रमशः उत्पन्न हुए। अंतमें जो शेष अंश बचा, वही सूर्य है। पृथ्वीभी सूर्यके सदृश पहले एक उष्ण गोला थी। परंतु ज्यों ज्यों उसकी उष्णता कम होती गई, त्यों त्यों मूलद्रव्योंमेंसे कुछ द्रव्य पतले और कुछ घने हो गये। इस प्रकार पृथ्वीके ऊपरकी हवा और पानी तथा उसके नीचेका पृथ्वीका जड़ गोला, ये तीन पदार्थ बने; और इसके बाद, इन तीनोंके मिश्रण अथवा संयोगसे सब सजीव तथा निर्जीव सृष्टि उत्पन्न हुई है। डार्विन प्रभृति पंडितोंने तो यह प्रतिपादन किया है, कि इसी तरह मनुष्यभी छोटे कीड़ेसे बढ़ते बढ़ते अपनी वर्तमान अवस्थामें आ पहुँचा है। परंतु अबतक आधिभौतिकवादियोंमें और अध्यात्मवादियोंमें इस बातपर बहुत मतभेद है, कि सारी सृष्टिके मूलमें आत्मा जैसे किसी भिन्न और स्वतंत्र तत्त्वको मानना चाहिये