श्रीमद्भगवद्गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र (लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक)
Srimad Bhagavad Gita Rahasya by Bal Gangadhar Tilak
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वकी रचना और संहार १७१
१३.३०) है; और इसमें न केवल क्षर-अक्षर-विचारहीका समावेश होता है, किंतु क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-ज्ञान और अध्यात्म विषयोंकाभी समावेश हो जाता है। भगवद्गीताके मतानुसार प्रकृति अपना संसारशकट चलाने या सृष्टिका कार्य चलानेके लिये स्वतंत्र नहीं है; किंतु उसे यह काम ईश्वरकी इच्छा के अनुसार करना पड़ता है (गीता ९.१०)। परंतु, पहले बतलाया जा चुका है, कि कपिलाचार्यने प्रकृतिको स्वतंत्र माना है। सांख्यशास्त्रके अनुसार, प्रकृतिके संसारका आरंभ होनेके लिये 'पुरुषका संयोग' इतनाही निमित्त कारण बस हो जाता है। इस विषयमें प्रकृति और किसीकी अपेक्षा नहीं करती। सांख्योंका यह कथन है, कि ज्योंही पुरुष और प्रकृतिका संयोग होता है, त्योंही उसकी टकसाल जारी हो जाती है और जिस प्रकार वसंत ऋतुमें वृक्षोंमें नये पत्ते दीख पड़ते हैं; और क्रमशः फूल और फल लगते हैं (मभा. शां. २३१.७३; मनु. १.३०), उसी प्रकार प्रकृतिकी मूल साम्यावस्था नष्ट हो जाती है; और उसके गुणोंका विस्तार होने लगता है। इसके विरुद्ध वेदसंहिता, उपनिषद् और स्मृतिग्रंथोंमें प्रकृतिको मूल न मान कर परब्रह्मको मूल माना है; और परब्रह्मसे सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके विषयमें भिन्न भिन्न वर्णन किये गये हैं—"हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्" —पहले हिरण्यगर्भ (ऋ. १०.१२१.१) और इस हिरण्यगर्भसे अथवा सत्यसे सब सृष्टि उत्पन्न हुई (ऋ. १०.७२; १०.१९०); अथवा पहले पानी उत्पन्न हुआ (ऋ. १०.८२.६; तै. ब्रा. १.१.३.७; ऐ. उ. १.१.२) और फिर उससे सृष्टि उत्पन्न हुई। अथवा इस पानीमें एक अंडा उत्पन्न हुआ और उससे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ; ब्रह्मासे अथवा उस मूल अंडेसेही सारा जगत् उत्पन्न हुआ; (मनु. १.८-१३; छां. ३.१९) अथवा वही ब्रह्मा (पुरुष) आधे हिस्सेसे स्त्री हो गया (बृ. १.४, ३; मनु १.३२); अथवा पानी उत्पन्न होनेके पहलेही पुरुष था (कठ. ४.६) अथवा परब्रह्मसे पहले तेज, पानी और पृथिवी (अन्न) येही तीन तत्त्व उत्पन्न हुए और पश्चात् उनके मिश्रणसे सब पदार्थ बने (छां. ६.२-६)। यद्यपि उक्त वर्णनोंमें बहुत भिन्नता है; तथापि वेदान्तसूत्रोंमें (वे. सू. २.३.१-१५) अन्तिम निर्णय यह किया गया है, कि आत्मरूपी मूलब्रह्मसे ही आकाश आदि पंच- महाभूत क्रमशः उत्पन्न हुए हैं (तै. उ. २.१)। प्रकृति, महत् आदि तत्त्वोंकाभी उल्लेख (कठ. ३.११), मैत्रायणी (६.१०), श्वेताश्वतर (४.१०; ६.१६), आदि उपनिषदोंमें स्पष्ट रीतिसे किया गया है। इससे दीख पड़ेगा, कि यद्यपि वेदान्तमतवाले प्रकृतिको स्वतंत्र न मानते हों, तथापि जब एक बार शुद्ध ब्रह्महीमें मायात्मक प्रकृतिरूप विकार दृग्गोचर होने लगता है, तब आगे सृष्टिके उत्पत्तिक्रमके संबंधमें उनका और सांख्यमतवालोंका अंतमें मेल हो गया था; और इसी कारण महाभारतमें कहा है, कि "इतिहास, पुराण, अर्थशास्त्र आदिमें जो कुछ ज्ञान भरा है, वह सब सांख्योंसे प्राप्त हुआ है" (शां. ३०१.१०८, १०९)। उसका यह मतलब